chevron_left वन पर्व अध्याय १२२
लोमश उवाच:
भृगोर्महर्षेः पुत्रोऽभूच्च्यवनो नाम भार्गवः |
१ क
लोमश उवाच:
समीपे सरसः सोऽस्य तपस्तेपे महाद्युतिः ||
१ ख
लोमश उवाच:
स्थाणुभूतो महातेजा वीरस्थानेन पाण्डव |
२ क
लोमश उवाच:
अतिष्ठत्सुवहून्कालानेकदेशे विशां पते ||
२ ख
लोमश उवाच:
स वल्मीकोऽभवदृषिर्लताभिरभिसंवृतः |
३ क
लोमश उवाच:
कालेन महता राजन्समाकीर्णः पिपीलिकैः ||
३ ख
लोमश उवाच:
तथा स संवृतो धीमान्मृत्पिण्ड इव सर्वशः |
४ क
लोमश उवाच:
तप्यति स्म तपो राजन्वल्मीकेन समावृतः ||
४ ख
लोमश उवाच:
अथ दीर्घस्य कालस्य शर्यातिर्नाम पार्थिवः |
५ क
लोमश उवाच:
आजगाम सरो रम्यं विहर्तुमिदमुत्तमम् ||
५ ख
लोमश उवाच:
तस्य स्त्रीणां सहस्राणि चत्वार्यासन्परिग्रहः |
६ क
लोमश उवाच:
एकैव च सुता शुभ्रा सुकन्या नाम भारत ||
६ ख
लोमश उवाच:
सा सखीभिः परिवृता सर्वाभरणभूषिता |
७ क
लोमश उवाच:
चङ्क्रम्यमाणा वल्मीकं भार्गवस्य समासदत् ||
७ ख
लोमश उवाच:
सा चैव सुदती तत्र पश्यमाना मनोरमान् |
८ क
लोमश उवाच:
वनस्पतीन्विचिन्वन्ती विजहार सखीवृता ||
८ ख
लोमश उवाच:
रूपेण वय़सा चैव मदनेन मदेन च |
९ क
लोमश उवाच:
वभञ्ज वनवृक्षाणां शाखाः परमपुष्पिताः ||
९ ख
लोमश उवाच:
तां सखीरहितामेकामेकवस्त्रामलङ्कृताम् |
१० क
लोमश उवाच:
ददर्श भार्गवो धीमांश्चरन्तीमिव विद्युतम् ||
१० ख
लोमश उवाच:
तां पश्यमानो विजने स रेमे परमद्युतिः |
११ क
लोमश उवाच:
क्षामकण्ठश्च व्रह्मर्षिस्तपोवलसमन्वितः |
११ ख
लोमश उवाच:
तामावभाषे कल्याणीं सा चास्य न शृणोति वै ||
११ ग
लोमश उवाच:
ततः सुकन्या वल्मीके दृष्ट्वा भार्गवचक्षुषी |
१२ क
लोमश उवाच:
कौतूहलात्कण्टकेन वुद्धिमोहवलात्कृता ||
१२ ख
लोमश उवाच:
किं नु खल्विदमित्युक्त्वा निर्विभेदास्य लोचने |
१३ क
लोमश उवाच:
अक्रुध्यत्स तय़ा विद्धे नेत्रे परममन्युमान् |
१३ ख
लोमश उवाच:
ततः शर्यातिसैन्यस्य शकृन्मूत्रं समावृणोत् ||
१३ ग
लोमश उवाच:
ततो रुद्धे शकृन्मूत्रे सैन्यमानाहदुःखितम् |
१४ क
लोमश उवाच:
तथागतमभिप्रेक्ष्य पर्यपृच्छत्स पार्थिवः ||
१४ ख
लोमश उवाच:
तपोनित्यस्य वृद्धस्य रोषणस्य विशेषतः |
१५ क
लोमश उवाच:
केनापकृतमद्येह भार्गवस्य महात्मनः |
१५ ख
लोमश उवाच:
ज्ञातं वा यदि वाज्ञातं तदृतं व्रूत माचिरम् ||
१५ ग
लोमश उवाच:
तमूचुः सैनिकाः सर्वे न विद्मोऽपकृतं वय़म् |
१६ क
लोमश उवाच:
सर्वोपाय़ैर्यथाकामं भवांस्तदधिगच्छतु ||
१६ ख
लोमश उवाच:
ततः स पृथिवीपालः साम्ना चोग्रेण च स्वय़म् |
१७ क
लोमश उवाच:
पर्यपृच्छत्सुहृद्वर्गं प्रत्यजानन्न चैव ते ||
१७ ख
लोमश उवाच:
आनाहार्तं ततो दृष्ट्वा तत्सैन्यमसुखार्दितम् |
१८ क
लोमश उवाच:
पितरं दुःखितं चापि सुकन्येदमथाव्रवीत् ||
१८ ख
लोमश उवाच:
मय़ाटन्त्येह वल्मीके दृष्टं सत्त्वमभिज्वलत् |
१९ क
लोमश उवाच:
खद्योतवदभिज्ञातं तन्मय़ा विद्धमन्तिकात् ||
१९ ख
लोमश उवाच:
एतच्छ्रुत्वा तु शर्यातिर्वल्मीकं तूर्णमाद्रवत् |
२० क
लोमश उवाच:
तत्रापश्यत्तपोवृद्धं वय़ोवृद्धं च भार्गवम् ||
२० ख
लोमश उवाच:
अय़ाचदथ सैन्यार्थं प्राञ्जलिः पृथिवीपतिः |
२१ क
लोमश उवाच:
अज्ञानाद्वालय़ा यत्ते कृतं तत्क्षन्तुमर्हसि ||
२१ ख
लोमश उवाच:
ततोऽव्रवीन्महीपालं च्यवनो भार्गवस्तदा |
२२ क
लोमश उवाच:
रूपौदार्यसमाय़ुक्तां लोभमोहवलात्कृताम् ||
२२ ख
लोमश उवाच:
तामेव प्रतिगृह्याहं राजन्दुहितरं तव |
२३ क
लोमश उवाच:
क्षमिष्यामि महीपाल सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
२३ ख
लोमश उवाच:
ऋषेर्वचनमाज्ञाय़ शर्यातिरविचारय़न् |
२४ क
लोमश उवाच:
ददौ दुहितरं तस्मै च्यवनाय़ महात्मने ||
२४ ख
लोमश उवाच:
प्रतिगृह्य च तां कन्यां च्यवनः प्रससाद ह |
२५ क
लोमश उवाच:
प्राप्तप्रसादो राजा स ससैन्यः पुनराव्रजत् ||
२५ ख
लोमश उवाच:
सुकन्यापि पतिं लव्ध्वा तपस्विनमनिन्दिता |
२६ क
लोमश उवाच:
नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या तपसा निय़मेन च ||
२६ ख
लोमश उवाच:
अग्नीनामतिथीनां च शुश्रूषुरनसूय़िका |
२७ क
लोमश उवाच:
समाराधय़त क्षिप्रं च्यवनं सा शुभानना ||
२७ ख