धृतराष्ट्र उवाच:
शरीरान्निःसृतस्तस्य प्रह्रादस्य महात्मनः ||
५० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
को भवानिति पृष्टश्च तमाह स महाद्युतिः |
५१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सत्यमस्म्यसुरेन्द्राग्र्य यास्येऽहं धर्ममन्विह ||
५१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मिन्ननुगते धर्मं पुरुषे पुरुषोऽपरः |
५२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
निश्चक्राम ततस्तस्मात्पृष्टश्चाह महात्मना |
५२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वृत्तं प्रह्राद मां विद्धि यतः सत्यं ततो ह्यहम् ||
५२ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मिन्गते महाश्वेतः शरीरात्तस्य निर्ययौ |
५३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पृष्टश्चाह वलं विद्धि यतो वृत्तमहं ततः |
५३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
इत्युक्त्वा च यय़ौ तत्र यतो वृत्तं नराधिप ||
५३ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
ततः प्रभामय़ी देवी शरीरात्तस्य निर्ययौ |
५४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तामपृच्छत्स दैत्येन्द्रः सा श्रीरित्येवमव्रवीत् ||
५४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
उषितास्मि सुखं वीर त्वय़ि सत्यपराक्रमे |
५५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
त्वय़ा त्यक्ता गमिष्यामि वलं यत्र ततो ह्यहम् ||
५५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ततो भय़ं प्रादुरासीत्प्रह्रादस्य महात्मनः |
५६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अपृच्छत च तां भूय़ः क्व यासि कमलालय़े ||
५६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
त्वं हि सत्यव्रता देवी लोकस्य परमेश्वरी |
५७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कश्चासौ व्राह्मणश्रेष्ठस्तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ||
५७ ख
श्रीरु उवाच:
स शक्रो व्रह्मचारी च यस्त्वय़ा चोपशिक्षितः |
५८ क
श्रीरु उवाच:
त्रैलोक्ये ते यदैश्वर्यं तत्तेनापहृतं प्रभो ||
५८ ख
श्रीरु उवाच:
शीलेन हि त्वय़ा लोकाः सर्वे धर्मज्ञ निर्जिताः |
५९ क
श्रीरु उवाच:
तद्विज्ञाय़ महेन्द्रेण तव शीलं हृतं प्रभो ||
५९ ख
श्रीरु उवाच:
धर्मः सत्यं तथा वृत्तं वलं चैव तथा ह्यहम् |
६० क
श्रीरु उवाच:
शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशय़ः ||
६० ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा गता तु श्रीस्ते च सर्वे युधिष्ठिर |
६१ क
भीष्म उवाच:
दुर्योधनस्तु पितरं भूय़ एवाव्रवीदिदम् ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
शीलस्य तत्त्वमिच्छामि वेत्तुं कौरवनन्दन |
६२ क
भीष्म उवाच:
प्राप्यते च यथा शीलं तमुपाय़ं वदस्व मे ||
६२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सोपाय़ं पूर्वमुद्दिष्टं प्रह्रादेन महात्मना |
६३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सङ्क्षेपतस्तु शीलस्य शृणु प्राप्तिं नराधिप ||
६३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा |
६४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते ||
६४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यदन्येषां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुषम् |
६५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अपत्रपेत वा येन न तत्कुर्यात्कथञ्चन ||
६५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तत्तु कर्म तथा कुर्याद्येन श्लाघेत संसदि |
६६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
एतच्छीलं समासेन कथितं कुरुसत्तम ||
६६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यद्यप्यशीला नृपते प्राप्नुवन्ति क्वचिच्छ्रिय़म् |
६७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न भुञ्जते चिरं तात समूलाश्च पतन्ति ते ||
६७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एतद्विदित्वा तत्त्वेन शीलवान्भव पुत्रक |
६८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यदीच्छसि श्रिय़ं तात सुविशिष्टां युधिष्ठिरात् ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
एतत्कथितवान्पुत्रे धृतराष्ट्रो नराधिप |
६९ क
भीष्म उवाच:
एतत्कुरुष्व कौन्तेय़ ततः प्राप्स्यसि तत्फलम् ||
६९ ख