युधिष्ठिर उवाच:
इमे जना नरश्रेष्ठ प्रशंसन्ति सदा भुवि |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
धर्मस्य शीलमेवादौ ततो मे संशय़ो महान् ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
यदि तच्छक्यमस्माभिर्ज्ञातुं धर्मभृतां वर |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं यथैतदुपलभ्यते ||
२ ख
युधिष्ठिर उवाच:
कथं नु प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत |
३ क
युधिष्ठिर उवाच:
किंलक्षणं च तत्प्रोक्तं व्रूहि मे वदतां वर ||
३ ख
भीष्म उवाच:
पुरा दुर्योधनेनेह धृतराष्ट्राय़ मानद |
४ क
भीष्म उवाच:
आख्यातं तप्यमानेन श्रिय़ं दृष्ट्वा तथागताम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
इन्द्रप्रस्थे महाराज तव सभ्रातृकस्य ह |
५ क
भीष्म उवाच:
सभाय़ां चावहसनं तत्सर्वं शृणु भारत ||
५ ख
भीष्म उवाच:
भवतस्तां सभां दृष्ट्वा समृद्धिं चाप्यनुत्तमाम् |
६ क
भीष्म उवाच:
दुर्योधनस्तदासीनः सर्वं पित्रे न्यवेदय़त् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
श्रुत्वा च धृतराष्ट्रोऽपि दुर्योधनवचस्तदा |
७ क
भीष्म उवाच:
अव्रवीत्कर्णसहितं दुर्योधनमिदं वचः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
किमर्थं तप्यसे पुत्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः |
८ क
भीष्म उवाच:
श्रुत्वा त्वामनुनेष्यामि यदि सम्यग्भविष्यसि ||
८ ख
भीष्म उवाच:
यथा त्वं महदैश्वर्यं प्राप्तः परपुरञ्जय़ |
९ क
भीष्म उवाच:
किङ्करा भ्रातरः सर्वे मित्राः सम्वन्धिनस्तथा ||
९ ख
भीष्म उवाच:
आच्छादय़सि प्रावारानश्नासि पिशितोदनम् |
१० क
भीष्म उवाच:
आजानेय़ा वहन्ति त्वां कस्माच्छोचसि पुत्रक ||
१० ख
दुर्योधन उवाच:
दश तानि सहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् |
११ क
दुर्योधन उवाच:
भुञ्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने ||
११ ख
दुर्योधन उवाच:
दृष्ट्वा च तां सभां दिव्यां दिव्यपुष्पफलान्विताम् |
१२ क
दुर्योधन उवाच:
अश्वांस्तित्तिरकल्माषान्रत्नानि विविधानि च ||
१२ ख
दुर्योधन उवाच:
दृष्ट्वा तां पाण्डवेय़ानामृद्धिमिन्द्रोपमां शुभाम् |
१३ क
दुर्योधन उवाच:
अमित्राणां सुमहतीमनुशोचामि मानद ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यदीच्छसि श्रिय़ं तात यादृशीं तां युधिष्ठिरे |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विशिष्टां वा नरव्याघ्र शीलवान्भव पुत्रक ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
शीलेन हि त्रय़ो लोकाः शक्या जेतुं न संशय़ः |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न हि किञ्चिदसाध्यं वै लोके शीलवतां भवेत् ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एकरात्रेण मान्धाता त्र्यहेण जनमेजय़ः |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सप्तरात्रेण नाभागः पृथिवीं प्रतिपेदिवान् ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एते हि पार्थिवाः सर्वे शीलवन्तो दमान्विताः |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अतस्तेषां गुणक्रीता वसुधा स्वय़मागमत् ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
नारदेन पुरा प्रोक्तं शीलमाश्रित्य भारत ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रह्रादेन हृतं राज्यं महेन्द्रस्य महात्मनः |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शीलमाश्रित्य दैत्येन त्रैलोक्यं च वशीकृतम् ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ततो वृहस्पतिं शक्रः प्राञ्जलिः समुपस्थितः |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
उवाच च महाप्राज्ञः श्रेय़ इच्छामि वेदितुम् ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ततो वृहस्पतिस्तस्मै ज्ञानं नैःश्रेय़सं परम् |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथय़ामास भगवान्देवेन्द्राय़ कुरूद्वह ||
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एतावच्छ्रेय़ इत्येव वृहस्पतिरभाषत |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
इन्द्रस्तु भूय़ः पप्रच्छ क्व विशेषो भवेदिति ||
२२ ख
वृहस्पतिरु उवाच:
विशेषोऽस्ति महांस्तात भार्गवस्य महात्मनः |
२३ क
वृहस्पतिरु उवाच:
तत्रागमय़ भद्रं ते भूय़ एव पुरन्दर ||
२३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आत्मनस्तु ततः श्रेय़ो भार्गवात्सुमहाय़शाः |
२४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ज्ञानमागमय़त्प्रीत्या पुनः स परमद्युतिः ||
२४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तेनापि समनुज्ञातो भार्गवेण महात्मना |
२५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
श्रेय़ोऽस्तीति पुनर्भूय़ः शुक्रमाह शतक्रतुः ||
२५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भार्गवस्त्वाह धर्मज्ञः प्रह्रादस्य महात्मनः |
२६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ज्ञानमस्ति विशेषेण ततो हृष्टश्च सोऽभवत् ||
२६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स ततो व्राह्मणो भूत्वा प्रह्रादं पाकशासनः |
२७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सृत्वा प्रोवाच मेधावी श्रेय़ इच्छामि वेदितुम् ||
२७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रह्रादस्त्वव्रवीद्विप्रं क्षणो नास्ति द्विजर्षभ |
२८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
त्रैलोक्यराज्ये सक्तस्य ततो नोपदिशामि ते ||
२८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्राह्मणस्त्वव्रवीद्वाक्यं कस्मिन्काले क्षणो भवेत् |
२९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ततोपदिष्टमिच्छामि यद्यत्कार्यान्तरं भवेत् ||
२९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ततः प्रीतोऽभवद्राजा प्रह्रादो व्रह्मवादिने |
३० क
धृतराष्ट्र उवाच:
तथेत्युक्त्वा शुभे काले ज्ञानतत्त्वं ददौ तदा ||
३० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्राह्मणोऽपि यथान्याय़ं गुरुवृत्तिमनुत्तमाम् |
३१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
चकार सर्वभावेन यद्वत्स मनसेच्छति ||
३१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पृष्टश्च तेन वहुशः प्राप्तं कथमरिन्दम |
३२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
त्रैलोक्यराज्यं धर्मज्ञ कारणं तद्व्रवीहि मे ||
३२ ख
प्रह्राद उवाच:
नासूय़ामि द्विजश्रेष्ठ राजास्मीति कदाचन |
३३ क
प्रह्राद उवाच:
कव्यानि वदतां तात संय़च्छामि वहामि च ||
३३ ख
प्रह्राद उवाच:
ते विस्रव्धाः प्रभाषन्ते संय़च्छन्ति च मां सदा |
३४ क
प्रह्राद उवाच:
ते मा कव्यपदे सक्तं शुश्रूषुमनसूय़कम् ||
३४ ख
प्रह्राद उवाच:
धर्मात्मानं जितक्रोधं संय़तं संय़तेन्द्रिय़म् |
३५ क
प्रह्राद उवाच:
समाचिन्वन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ||
३५ ख
प्रह्राद उवाच:
सोऽहं वागग्रपिष्टानां रसानामवलेहिता |
३६ क
प्रह्राद उवाच:
स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ||
३६ ख
प्रह्राद उवाच:
एतत्पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् |
३७ क
प्रह्राद उवाच:
यद्व्राह्मणमुखे कव्यमेतच्छ्रुत्वा प्रवर्तते ||
३७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एतावच्छ्रेय़ इत्याह प्रह्रादो व्रह्मवादिनम् |
३८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शुश्रूषितस्तेन तदा दैत्येन्द्रो वाक्यमव्रवीत् ||
३८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यथावद्गुरुवृत्त्या ते प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम |
३९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रदातास्मि न संशय़ः ||
३९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कृतमित्येव दैत्येन्द्रमुवाच स च वै द्विजः |
४० क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रह्रादस्त्वव्रवीत्प्रीतो गृह्यतां वर इत्युत ||
४० ख
व्राह्मण उवाच:
यदि राजन्प्रसन्नस्त्वं मम चेच्छसि चेद्धितम् |
४१ क
व्राह्मण उवाच:
भवतः शीलमिच्छामि प्राप्तुमेष वरो मम ||
४१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ततः प्रीतश्च दैत्येन्द्रो भय़ं चास्याभवन्महत् |
४२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वरे प्रदिष्टे विप्रेण नाल्पतेजाय़मित्युत ||
४२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एवमस्त्विति तं प्राह प्रह्रादो विस्मितस्तदा |
४३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उपाकृत्य तु विप्राय़ वरं दुःखान्वितोऽभवत् ||
४३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दत्ते वरे गते विप्रे चिन्तासीन्महती ततः |
४४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रह्रादस्य महाराज निश्चय़ं न च जग्मिवान् ||
४४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्य चिन्तय़तस्तात छाय़ाभूतं महाद्युते |
४५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तेजो विग्रहवत्तात शरीरमजहात्तदा ||
४५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तमपृच्छन्महाकाय़ं प्रह्रादः को भवानिति |
४६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रत्याह ननु शीलोऽस्मि त्यक्तो गच्छाम्यहं त्वय़ा ||
४६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मिन्द्विजवरे राजन्वत्स्याम्यहमनिन्दितम् |
४७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
योऽसौ शिष्यत्वमागम्य त्वय़ि नित्यं समाहितः |
४७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
इत्युक्त्वान्तर्हितं तद्वै शक्रं चान्वविशत्प्रभो ||
४७ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मिंस्तेजसि याते तु तादृग्रूपस्ततोऽपरः |
४८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शरीरान्निःसृतस्तस्य को भवानिति चाव्रवीत् ||
४८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
धर्मं प्रह्राद मां विद्धि यत्रासौ द्विजसत्तमः |
४९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तत्र यास्यामि दैत्येन्द्र यतः शीलं ततो ह्यहम् ||
४९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ततोऽपरो महाराज प्रज्वलन्निव तेजसा |
५० क