chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय १२४
युधिष्ठिर उवाच:
सत्स्त्रीणां समुदाचारं सर्वधर्मभृतां वर |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वत्तस्तं मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
सर्वज्ञां सर्वधर्मज्ञां देवलोके मनस्विनीम् |
२ क
भीष्म उवाच:
कैकेय़ी सुमना नाम शाण्डिलीं पर्यपृच्छत ||
२ ख
भीष्म उवाच:
केन वृत्तेन कल्याणि समाचारेण केन वा |
३ क
भीष्म उवाच:
विधूय़ सर्वपापानि देवलोकं त्वमागता ||
३ ख
भीष्म उवाच:
हुताशनशिखेव त्वं ज्वलमाना स्वतेजसा |
४ क
भीष्म उवाच:
सुता ताराधिपस्येव प्रभय़ा दिवमागता ||
४ ख
भीष्म उवाच:
अरजांसि च वस्त्राणि धारय़न्ती गतक्लमा |
५ क
भीष्म उवाच:
विमानस्था शुभे भासि सहस्रगुणमोजसा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
न त्वमल्पेन तपसा दानेन निय़मेन वा |
६ क
भीष्म उवाच:
इमं लोकमनुप्राप्ता तस्मात्तत्त्वं वदस्व मे ||
६ ख
भीष्म उवाच:
इति पृष्टा सुमनय़ा मधुरं चारुहासिनी |
७ क
भीष्म उवाच:
शाण्डिली निभृतं वाक्यं सुमनामिदमव्रवीत् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
नाहं काषाय़वसना नापि वल्कलधारिणी |
८ क
भीष्म उवाच:
न च मुण्डा न जटिला भूत्वा देवत्वमागता ||
८ ख
भीष्म उवाच:
अहितानि च वाक्यानि सर्वाणि परुषाणि च |
९ क
भीष्म उवाच:
अप्रमत्ता च भर्तारं कदाचिन्नाहमव्रुवम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
देवतानां पितॄणां च व्राह्मणानां च पूजने |
१० क
भीष्म उवाच:
अप्रमत्ता सदाय़ुक्ता श्वश्रूश्वशुरवर्तिनी ||
१० ख
भीष्म उवाच:
पैशुन्ये न प्रवर्तामि न ममैतन्मनोगतम् |
११ क
भीष्म उवाच:
अद्वारे न च तिष्ठामि चिरं न कथय़ामि च ||
११ ख
भीष्म उवाच:
असद्वा हसितं किञ्चिदहितं वापि कर्मणा |
१२ क
भीष्म उवाच:
रहस्यमरहस्यं वा न प्रवर्तामि सर्वथा ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
कार्यार्थे निर्गतं चापि भर्तारं गृहमागतम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
आसनेनोपसंय़ोज्य पूजय़ामि समाहिता ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यद्यच्च नाभिजानाति यद्भोज्यं नाभिनन्दति |
१४ क
भीष्म उवाच:
भक्ष्यं वाप्यथ वा लेह्यं तत्सर्वं वर्जय़ाम्यहम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
कुटुम्वार्थे समानीतं यत्किञ्चित्कार्यमेव तु |
१५ क
भीष्म उवाच:
प्रातरुत्थाय़ तत्सर्वं कारय़ामि करोमि च ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
प्रवासं यदि मे भर्ता याति कार्येण केनचित् |
१६ क
भीष्म उवाच:
मङ्गलैर्वहुभिर्युक्ता भवामि निय़ता सदा ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अञ्जनं रोचनां चैव स्नानं माल्यानुलेपनम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
प्रसाधनं च निष्क्रान्ते नाभिनन्दामि भर्तरि ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
नोत्थापय़ामि भर्तारं सुखसुप्तमहं सदा |
१८ क
भीष्म उवाच:
आतुरेष्वपि कार्येषु तेन तुष्यति मे मनः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
नाय़ासय़ामि भर्तारं कुटुम्वार्थे च सर्वदा |
१९ क
भीष्म उवाच:
गुप्तगुह्या सदा चास्मि सुसंमृष्टनिवेशना ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
इमं धर्मपथं नारी पालय़न्ती समाहिता |
२० क
भीष्म उवाच:
अरुन्धतीव नारीणां स्वर्गलोके महीय़ते ||
२० ख
भीष्म उवाच:
एतदाख्याय़ सा देवी सुमनाय़ै तपस्विनी |
२१ क
भीष्म उवाच:
पतिधर्मं महाभागा जगामादर्शनं तदा ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
यश्चेदं पाण्डवाख्यानं पठेत्पर्वणि पर्वणि |
२२ क
भीष्म उवाच:
स देवलोकं सम्प्राप्य नन्दने सुसुखं वसेत् ||
२२ ख