मार्कण्डेय़ उवाच:
शिवा भार्या त्वङ्गिरसः शीलरूपगुणान्विता |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्याः सा प्रथमं रूपं कृत्वा देवी जनाधिप |
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
जगाम पावकाभ्याशं तं चोवाच वराङ्गना ||
१ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
मामग्ने कामसन्तप्तां त्वं कामय़ितुमर्हसि |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
करिष्यसि न चेदेवं मृतां मामुपधारय़ ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अहमङ्गिरसो भार्या शिवा नाम हुताशन |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सखीभिः सहिता प्राप्ता मन्त्रय़ित्वा विनिश्चय़म् ||
३ ख
अग्निरु उवाच:
कथं मां त्वं विजानीषे कामार्तमितराः कथम् |
४ क
अग्निरु उवाच:
यास्त्वय़ा कीर्तिताः सर्वाः सप्तर्षीणां प्रिय़ाः स्त्रिय़ः ||
४ ख
शिवो उवाच:
अस्माकं त्वं प्रिय़ो नित्यं विभीमस्तु वय़ं तव |
५ क
शिवो उवाच:
त्वच्चित्तमिङ्गितैर्ज्ञात्वा प्रेषितास्मि तवान्तिकम् ||
५ ख
शिवो उवाच:
मैथुनाय़ेह सम्प्राप्ता कामं प्राप्तं द्रुतं चर |
६ क
शिवो उवाच:
मातरो मां प्रतीक्षन्ते गमिष्यामि हुताशन ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽग्निरुपय़ेमे तां शिवां प्रीतिमुदाय़ुतः |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रीत्या देवी च संय़ुक्ता शुक्रं जग्राह पाणिना ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अचिन्तय़न्ममेदं ये रूपं द्रक्ष्यन्ति कानने |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ते व्राह्मणीनामनृतं दोषं वक्ष्यन्ति पावके ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मादेतद्रक्ष्यमाणा गरुडी सम्भवाम्यहम् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वनान्निर्गमनं चैव सुखं मम भविष्यति ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुपर्णी सा तदा भूत्वा निर्जगाम महावनात् |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपश्यत्पर्वतं श्वेतं शरस्तम्वैः सुसंवृतम् ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्टीविषैः सप्तशीर्षैर्गुप्तं भोगिभिरद्भुतैः |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रक्षोभिश्च पिशाचैश्च रौद्रैर्भूतगणैस्तथा |
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
राक्षसीभिश्च सम्पूर्णमनेकैश्च मृगद्विजैः ||
११ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा तत्र सहसा गत्वा शैलपृष्ठं सुदुर्गमम् |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राक्षिपत्काञ्चने कुण्डे शुक्रं सा त्वरिता सती ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शिष्टानामपि सा देवी सप्तर्षीणां महात्मनाम् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पत्नीसरूपतां कृत्वा कामय़ामास पावकम् ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दिव्यरूपमरुन्धत्याः कर्तुं न शकितं तय़ा |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्यास्तपःप्रभावेण भर्तृशुश्रूषणेन च ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
षट्कृत्वस्तत्तु निक्षिप्तमग्ने रेतः कुरूत्तम |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मिन्कुण्डे प्रतिपदि कामिन्या स्वाहय़ा तदा ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्स्कन्नं तेजसा तत्र सम्भृतं जनय़त्सुतम् |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ऋषिभिः पूजितं स्कन्नमनय़त्स्कन्दतां ततः ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
षट्शिरा द्विगुणश्रोत्रो द्वादशाक्षिभुजक्रमः |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
एकग्रीवस्त्वेककाय़ः कुमारः समपद्यत ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्वितीय़ाय़ामभिव्यक्तस्तृतीय़ाय़ां शिशुर्वभौ |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अङ्गप्रत्यङ्गसम्भूतश्चतुर्थ्यामभवद्गुहः ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
लोहिताभ्रेण महता संवृतः सह विद्युता |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
लोहिताभ्रे सुमहति भाति सूर्य इवोदितः ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गृहीतं तु धनुस्तेन विपुलं लोमहर्षणम् |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
न्यस्तं यत्त्रिपुरघ्नेन सुरारिविनिकृन्तनम् ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तद्गृहीत्वा धनुःश्रेष्ठं ननाद वलवांस्तदा |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
संमोहय़न्निवेमान्स त्रीँल्लोकान्सचराचरान् ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य तं निनदं श्रुत्वा महामेघौघनिस्वनम् |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उत्पेततुर्महानागौ चित्रश्चैरावतश्च ह ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तावापतन्तौ सम्प्रेक्ष्य स वालार्कसमद्युतिः |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्वाभ्यां गृहीत्वा पाणिभ्यां शक्तिं चान्येन पाणिना |
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपरेणाग्निदाय़ादस्ताम्रचूडं भुजेन सः ||
२३ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
महाकाय़मुपश्लिष्टं कुक्कुटं वलिनां वरम् |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गृहीत्वा व्यनदद्भीमं चिक्रीड च महावलः ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्वाभ्यां भुजाभ्यां वलवान्गृहीत्वा शङ्खमुत्तमम् |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राध्मापय़त भूतानां त्रासनं वलिनामपि ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्वाभ्यां भुजाभ्यामाकाशं वहुशो निजघान सः |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्रीडन्भाति महासेनस्त्रीँल्लोकान्वदनैः पिवन् |
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पर्वताग्रेऽप्रमेय़ात्मा रश्मिमानुदय़े यथा ||
२६ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तस्य पर्वतस्याग्रे निषण्णोऽद्भुतविक्रमः |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्यलोकय़दमेय़ात्मा मुखैर्नानाविधैर्दिशः |
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स पश्यन्विविधान्भावांश्चकार निनदं पुनः ||
२७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन्वहुधा जनाः |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भीताश्चोद्विग्नमनसस्तमेव शरणं यय़ुः ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ये तु तं संश्रिता देवं नानावर्णास्तदा जनाः |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तानप्याहुः पारिषदान्व्राह्मणाः सुमहावलान् ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तूत्थाय़ महावाहुरुपसान्त्व्य च ताञ्जनान् |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धनुर्विकृष्य व्यसृजद्वाणाञ्श्वेते महागिरौ ||
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विभेद स शरैः शैलं क्रौञ्चं हिमवतः सुतम् |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तेन हंसाश्च गृध्राश्च मेरुं गच्छन्ति पर्वतम् ||
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स विशीर्णोऽपतच्छैलो भृशमार्तस्वरान्रुवन् |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मिन्निपतिते त्वन्ये नेदुः शैला भृशं भय़ात् ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तं नादं भृशार्तानां श्रुत्वापि वलिनां वरः |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
न प्राव्यथदमेय़ात्मा शक्तिमुद्यम्य चानदत् ||
३३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा तदा विपुला शक्तिः क्षिप्ता तेन महात्मना |
३४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विभेद शिखरं घोरं श्वेतस्य तरसा गिरेः ||
३४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तेनाभिहतो दीनो गिरिः श्वेतोऽचलैः सह |
३५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उत्पपात महीं त्यक्त्वा भीतस्तस्मान्महात्मनः ||
३५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः प्रव्यथिता भूमिर्व्यशीर्यत समन्ततः |
३६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आर्ता स्कन्दं समासाद्य पुनर्वलवती वभौ ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पर्वताश्च नमस्कृत्य तमेव पृथिवीं गताः |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथाय़मभजल्लोकः स्कन्दं शुक्लस्य पञ्चमीम् ||
३७ ख