chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय १२७
भीष्म उवाच:
ततो नाराय़णसुहृन्नारदो भगवानृषिः |
१ क
भीष्म उवाच:
शङ्करस्योमय़ा सार्धं संवादं प्रत्यभाषत ||
१ ख
भीष्म उवाच:
तपश्चचार धर्मात्मा वृषभाङ्कः सुरेश्वरः |
२ क
भीष्म उवाच:
पुण्ये गिरौ हिमवति सिद्धचारणसेविते ||
२ ख
भीष्म उवाच:
नानौषधिय़ुते रम्ये नानापुष्पसमाकुले |
३ क
भीष्म उवाच:
अप्सरोगणसङ्कीर्णे भूतसङ्घनिषेविते ||
३ ख
भीष्म उवाच:
तत्र देवो मुदा युक्तो भूतसङ्घशतैर्वृतः |
४ क
भीष्म उवाच:
नानारूपैर्विरूपैश्च दिव्यैरद्भुतदर्शनैः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
सिंहव्याघ्रगजप्रख्यैः सर्वजातिसमन्वितैः |
५ क
भीष्म उवाच:
क्रोष्टुकद्वीपिवदनैरृक्षर्षभमुखैस्तथा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
उलूकवदनैर्भीमैः श्येनभासमुखैस्तथा |
६ क
भीष्म उवाच:
नानावर्णमृगप्रख्यैः सर्वजातिसमन्वय़ैः |
६ ख
भीष्म उवाच:
किंनरैर्देवगन्धर्वैर्यक्षभूतगणैस्तथा ||
६ ग
भीष्म उवाच:
दिव्यपुष्पसमाकीर्णं दिव्यमालाविभूषितम् |
७ क
भीष्म उवाच:
दिव्यचन्दनसंय़ुक्तं दिव्यधूपेन धूपितम् |
७ ख
भीष्म उवाच:
तत्सदो वृषभाङ्कस्य दिव्यवादित्रनादितम् ||
७ ग
भीष्म उवाच:
मृदङ्गपणवोद्घुष्टं शङ्खभेरीनिनादितम् |
८ क
भीष्म उवाच:
नृत्यद्भिर्भूतसङ्घैश्च वर्हिणैश्च समन्ततः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
प्रनृत्ताप्सरसं दिव्यं दिव्यस्त्रीगणसेवितम् |
९ क
भीष्म उवाच:
दृष्टिकान्तमनिर्देश्यं दिव्यमद्भुतदर्शनम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
स गिरिस्तपसा तस्य भूतेशस्य व्यरोचत |
११ क
भीष्म उवाच:
स्वाध्याय़परमैर्विप्रैर्व्रह्मघोषैर्विनादितः |
११ ख
भीष्म उवाच:
षट्पदैरुपगीतैश्च माधवाप्रतिमो गिरिः ||
११ ग
भीष्म उवाच:
तं महोत्सवसङ्काशं भीमरूपधरं पुनः |
१२ क
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा मुनिगणस्यासीत्परा प्रीतिर्जनार्दन ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
मुनय़श्च महाभागाः सिद्धाश्चैवोर्ध्वरेतसः |
१३ क
भीष्म उवाच:
मरुतो वसवः साध्या विश्वेदेवाः सनातनाः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यक्षा नागाः पिशाचाश्च लोकपाला हुताशनाः |
१४ क
भीष्म उवाच:
भावाश्च सर्वे न्यग्भूतास्तत्रैवासन्समागताः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
ऋतवः सर्वपुष्पैश्च व्यकिरन्त महाद्भुतैः |
१५ क
भीष्म उवाच:
ओषध्यो ज्वलमानाश्च द्योतय़न्ति स्म तद्वनम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
विहगाश्च मुदा युक्ताः प्रानृत्यन्व्यनदंश्च ह |
१६ क
भीष्म उवाच:
गिरिपृष्ठेषु रम्येषु व्याहरन्तो जनप्रिय़ाः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
तत्र देवो गिरितटे दिव्यधातुविभूषिते |
१७ क
भीष्म उवाच:
पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो महामनाः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
व्याघ्रचर्माम्वरधरः सिंहचर्मोत्तरच्छदः |
१८ क
भीष्म उवाच:
व्यालय़ज्ञोपवीती च लोहिताङ्गदभूषणः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
हरिश्मश्रुर्जटी भीमो भय़कर्ता सुरद्विषाम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
अभय़ः सर्वभूतानां भक्तानां वृषभध्वजः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा तमृषय़ः सर्वे शिरोभिरवनीं गताः |
२० क
भीष्म उवाच:
विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः क्षान्ता विगतकल्मषाः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
तस्य भूतपतेः स्थानं भीमरूपधरं वभौ |
२१ क
भीष्म उवाच:
अप्रधृष्यतरं चैव महोरगसमाकुलम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
क्षणेनैवाभवत्सर्वमद्भुतं मधुसूदन |
२२ क
भीष्म उवाच:
तत्सदो वृषभाङ्कस्य भीमरूपधरं वभौ ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
तमभ्ययाच्छैलसुता भूतस्त्रीगणसंवृता |
२३ क
भीष्म उवाच:
हरतुल्याम्वरधरा समानव्रतचारिणी ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
विभ्रती कलशं रौक्मं सर्वतीर्थजलोद्भवम् |
२४ क
भीष्म उवाच:
गिरिस्रवाभिः पुण्याभिः सर्वतोऽनुगता शुभा ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
पुष्पवृष्ट्याभिवर्षन्ती गन्धैर्वहुविधैस्तथा |
२५ क
भीष्म उवाच:
सेवन्ती हिमवत्पार्श्वं हरपार्श्वमुपागमत् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
ततः स्मय़न्ती पाणिभ्यां नर्मार्थं चारुदर्शना |
२६ क
भीष्म उवाच:
हरनेत्रे शुभे देवी सहसा सा समावृणोत् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
संवृताभ्यां तु नेत्राभ्यां तमोभूतमचेतनम् |
२७ क
भीष्म उवाच:
निर्होमं निर्वषट्कारं तत्सदः सहसाभवत् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
जनश्च विमनाः सर्वो भय़त्राससमन्वितः |
२८ क
भीष्म उवाच:
निमीलिते भूतपतौ नष्टसूर्य इवाभवत् ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
ततो वितिमिरो लोकः क्षणेन समपद्यत |
२९ क
भीष्म उवाच:
ज्वाला च महती दीप्ता ललाटात्तस्य निःसृता ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
तृतीय़ं चास्य सम्भूतं नेत्रमादित्यसंनिभम् |
३० क
भीष्म उवाच:
युगान्तसदृशं दीप्तं येनासौ मथितो गिरिः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
ततो गिरिसुता दृष्ट्वा दीप्ताग्निसदृशेक्षणम् |
३१ क
भीष्म उवाच:
हरं प्रणम्य शिरसा ददर्शाय़तलोचना ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
दह्यमाने वने तस्मिन्सशालसरलद्रुमे |
३२ क
भीष्म उवाच:
सचन्दनवने रम्ये दिव्यौषधिविदीपिते ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
मृगय़ूथैर्द्रुतैर्भीतैर्हरपार्श्वमुपागतैः |
३३ क
भीष्म उवाच:
शरणं चाप्यविन्दद्भिस्तत्सदः सङ्कुलं वभौ ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
ततो नभःस्पृशज्वालो विद्युल्लोलार्चिरुज्ज्वलः |
३४ क
भीष्म उवाच:
द्वादशादित्यसदृशो युगान्ताग्निरिवापरः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
क्षणेन तेन दग्धः स हिमवानभवन्नगः |
३५ क
भीष्म उवाच:
सधातुशिखराभोगो दीनदग्धवनौषधिः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
तं दृष्ट्वा मथितं शैलं शैलराजसुता ततः |
३६ क
भीष्म उवाच:
भगवन्तं प्रपन्ना सा साञ्जलिप्रग्रहा स्थिता ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
उमां शर्वस्तदा दृष्ट्वा स्त्रीभावागतमार्दवाम् |
३७ क
भीष्म उवाच:
पितुर्दैन्यमनिच्छन्तीं प्रीत्यापश्यत्ततो गिरिम् ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽभवत्पुनः सर्वः प्रकृतिस्थः सुदर्शनः |
३८ क
भीष्म उवाच:
प्रहृष्टविहगश्चैव प्रपुष्पितवनद्रुमः ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
प्रकृतिस्थं गिरिं दृष्ट्वा प्रीता देवी महेश्वरम् |
३९ क
भीष्म उवाच:
उवाच सर्वभूतानां पतिं पतिमनिन्दिता ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
भगवन्सर्वभूतेश शूलपाणे महाव्रत |
४० क
भीष्म उवाच:
संशय़ो मे महाञ्जातस्तं मे व्याख्यातुमर्हसि ||
४० ख
भीष्म उवाच:
किमर्थं ते ललाटे वै तृतीय़ं नेत्रमुत्थितम् |
४१ क
भीष्म उवाच:
किमर्थं च गिरिर्दग्धः सपक्षिगणकाननः ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
किमर्थं च पुनर्देव प्रकृतिस्थः क्षणात्कृतः |
४२ क
भीष्म उवाच:
तथैव द्रुमसञ्छन्नः कृतोऽय़ं ते महेश्वर ||
४२ ख
महेश्वर उवाच:
नेत्रे मे संवृते देवि त्वय़ा वाल्यादनिन्दिते |
४३ क
महेश्वर उवाच:
नष्टालोकस्ततो लोकः क्षणेन समपद्यत ||
४३ ख
महेश्वर उवाच:
नष्टादित्ये तथा लोके तमोभूते नगात्मजे |
४४ क
महेश्वर उवाच:
तृतीय़ं लोचनं दीप्तं सृष्टं ते रक्षता प्रजाः ||
४४ ख
महेश्वर उवाच:
तस्य चाक्ष्णो महत्तेजो येनाय़ं मथितो गिरिः |
४५ क
महेश्वर उवाच:
त्वत्प्रिय़ार्थं च मे देवि प्रकृतिस्थः क्षणात्कृतः ||
४५ ख
उमो उवाच:
भगवन्केन ते वक्त्रं चन्द्रवत्प्रिय़दर्शनम् |
४६ क
उमो उवाच:
पूर्वं तथैव श्रीकान्तमुत्तरं पश्चिमं तथा ||
४६ ख
उमो उवाच:
दक्षिणं च मुखं रौद्रं केनोर्ध्वं कपिला जटाः |
४७ क
उमो उवाच:
केन कण्ठश्च ते नीलो वर्हिवर्हनिभः कृतः ||
४७ ख
उमो उवाच:
हस्ते चैतत्पिनाकं ते सततं केन तिष्ठति |
४८ क
उमो उवाच:
जटिलो व्रह्मचारी च किमर्थमसि नित्यदा ||
४८ ख
उमो उवाच:
एतं मे संशय़ं सर्वं वद भूतपतेऽनघ |
४९ क
उमो उवाच:
सधर्मचारिणी चाहं भक्ता चेति वृषध्वज ||
४९ ख
उमो उवाच:
एवमुक्तः स भगवाञ्शैलपुत्र्या पिनाकधृक् |
५० क