युधिष्ठिर उवाच:
मित्रैः प्रहीय़माणस्य वह्वमित्रस्य का गतिः |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
राज्ञः सङ्क्षीणकोशस्य वलहीनस्य भारत ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
दुष्टामात्यसहाय़स्य स्रुतमन्त्रस्य सर्वतः |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
राज्यात्प्रच्यवमानस्य गतिमन्यामपश्यतः ||
२ ख
युधिष्ठिर उवाच:
परचक्राभिय़ातस्य दुर्वलस्य वलीय़सा |
३ क
युधिष्ठिर उवाच:
असंविहितराष्ट्रस्य देशकालावजानतः ||
३ ख
युधिष्ठिर उवाच:
अप्राप्यं च भवेत्सान्त्वं भेदो वाप्यतिपीडनात् |
४ क
युधिष्ठिर उवाच:
जीवितं चार्थहेतोर्वा तत्र किं सुकृतं भवेत् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
गुह्यं मा धर्ममप्राक्षीरतीव भरतर्षभ |
५ क
भीष्म उवाच:
अपृष्टो नोत्सहे वक्तुं धर्ममेनं युधिष्ठिर ||
५ ख
भीष्म उवाच:
धर्मो ह्यणीय़ान्वचनाद्वुद्धेश्च भरतर्षभ |
६ क
भीष्म उवाच:
श्रुत्वोपास्य सदाचारैः साधुर्भवति स क्वचित् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
कर्मणा वुद्धिपूर्वेण भवत्याढ्यो न वा पुनः |
७ क
भीष्म उवाच:
तादृशोऽय़मनुप्रश्नः स व्यवस्यस्त्वय़ा धिय़ा ||
७ ख
भीष्म उवाच:
उपाय़ं धर्मवहुलं यात्रार्थं शृणु भारत |
८ क
भीष्म उवाच:
नाहमेतादृशं धर्मं वुभूषे धर्मकारणात् |
८ ख
भीष्म उवाच:
दुःखादान इहाढ्येषु स्यात्तु पश्चात्क्षमो मतः ||
८ ग
भीष्म उवाच:
अनुगम्य गतीनां च सर्वासामेव निश्चय़म् |
९ क
भीष्म उवाच:
यथा यथा हि पुरुषो नित्यं शास्त्रमवेक्षते |
९ ख
भीष्म उवाच:
तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते ||
९ ग
भीष्म उवाच:
अविज्ञानादय़ोगश्च पुरुषस्योपजाय़ते |
१० क
भीष्म उवाच:
अविज्ञानादय़ोगो हि योगो भूतिकरः पुनः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
अशङ्कमानो वचनमनसूय़ुरिदं शृणु |
११ क
भीष्म उवाच:
राज्ञः कोशक्षय़ादेव जाय़ते वलसङ्क्षय़ः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
कोशं सञ्जनय़ेद्राजा निर्जलेभ्यो यथा जलम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
कालं प्राप्यानुगृह्णीय़ादेष धर्मोऽत्र साम्प्रतम् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
उपाय़धर्मं प्राप्यैनं पूर्वैराचरितं जनैः |
१३ क
भीष्म उवाच:
अन्यो धर्मः समर्थानामापत्स्वन्यश्च भारत ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
प्राक्कोशः प्रोच्यते धर्मो वुद्धिर्धर्माद्गरीय़सी |
१४ क
भीष्म उवाच:
धर्मं प्राप्य न्याय़वृत्तिमवलीय़ान्न विन्दति ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
यस्माद्धनस्योपपत्तिरेकान्तेन न विद्यते |
१५ क
भीष्म उवाच:
तस्मादापद्यधर्मोऽपि श्रूय़ते धर्मलक्षणः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
अधर्मो जाय़ते यस्मिन्निति वै कवय़ो विदुः |
१६ क
भीष्म उवाच:
अनन्तरः क्षत्रिय़स्य इति वै विचिकित्ससे ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
यथास्य धर्मो न ग्लाय़ेन्नेय़ाच्छत्रुवशं यथा |
१७ क
भीष्म उवाच:
तत्कर्तव्यमिहेत्याहुर्नात्मानमवसादय़ेत् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
सन्नात्मा नैव धर्मस्य न परस्य न चात्मनः |
१८ क
भीष्म उवाच:
सर्वोपाय़ैरुज्जिहीर्षेदात्मानमिति निश्चय़ः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
तत्र धर्मविदां तात निश्चय़ो धर्मनैपुणे |
१९ क
भीष्म उवाच:
उद्यमो जीवनं क्षत्रे वाहुवीर्यादिति श्रुतिः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
क्षत्रिय़ो वृत्तिसंरोधे कस्य नादातुमर्हति |
२० क
भीष्म उवाच:
अन्यत्र तापसस्वाच्च व्राह्मणस्वाच्च भारत ||
२० ख
भीष्म उवाच:
यथा वै व्राह्मणः सीदन्नय़ाज्यमपि याजय़ेत् |
२१ क
भीष्म उवाच:
अभोज्यान्नानि चाश्नीय़ात्तथेदं नात्र संशय़ः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
पीडितस्य किमद्वारमुत्पथो निधृतस्य वा |
२२ क
भीष्म उवाच:
अद्वारतः प्रद्रवति यदा भवति पीडितः ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
तस्य कोशवलज्यान्या सर्वलोकपराभवः |
२३ क
भीष्म उवाच:
भैक्षचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
स्वधर्मानन्तरा वृत्तिर्यान्याननुपजीवतः |
२४ क
भीष्म उवाच:
वहतः प्रथमं कल्पमनुकल्पेन जीवनम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
आपद्गतेन धर्माणामन्याय़ेनोपजीवनम् |
२५ क
भीष्म उवाच:
अपि ह्येतद्व्राह्मणेषु दृष्टं वृत्तिपरिक्षय़े ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
क्षत्रिय़े संशय़ः कः स्यादित्येतन्निश्चितं सदा |
२६ क
भीष्म उवाच:
आददीत विशिष्टेभ्यो नावसीदेत्कथञ्चन ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
हन्तारं रक्षितारं च प्रजानां क्षत्रिय़ं विदुः |
२७ क
भीष्म उवाच:
तस्मात्संरक्षता कार्यमादानं क्षत्रवन्धुना ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
अन्यत्र राजन्हिंसाय़ा वृत्तिर्नेहास्ति कस्यचित् |
२८ क
भीष्म उवाच:
अप्यरण्यसमुत्थस्य एकस्य चरतो मुनेः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
न शङ्खलिखितां वृत्तिं शक्यमास्थाय़ जीवितुम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
विशेषतः कुरुश्रेष्ठ प्रजापालनमीप्सता ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
परस्पराभिसंरक्षा राज्ञा राष्ट्रेण चापदि |
३० क
भीष्म उवाच:
नित्यमेवेह कर्तव्या एष धर्मः सनातनः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
राजा राष्ट्रं यथापत्सु द्रव्यौघैः परिरक्षति |
३१ क
भीष्म उवाच:
राष्ट्रेण राजा व्यसने परिरक्ष्यस्तथा भवेत् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
कोशं दण्डं वलं मित्रं यदन्यदपि सञ्चितम् |
३२ क
भीष्म उवाच:
न कुर्वीतान्तरं राष्ट्रे राजा परिगते क्षुधा ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
वीजं भक्तेन सम्पाद्यमिति धर्मविदो विदुः |
३३ क
भीष्म उवाच:
अत्रैतच्छम्वरस्याहुर्महामाय़स्य दर्शनम् ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
धिक्तस्य जीवितं राज्ञो राष्ट्रे यस्यावसीदति |
३४ क
भीष्म उवाच:
अवृत्त्यान्त्यमनुष्योऽपि यो वै वेद शिवेर्वचः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
राज्ञः कोशवलं मूलं कोशमूलं पुनर्वलम् |
३५ क
भीष्म उवाच:
तन्मूलं सर्वधर्माणां धर्ममूलाः पुनः प्रजाः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
नान्यानपीडय़ित्वेह कोशः शक्यः कुतो वलम् |
३६ क
भीष्म उवाच:
तदर्थं पीडय़ित्वा च दोषं न प्राप्तुमर्हति ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
अकार्यमपि यज्ञार्थं क्रिय़ते यज्ञकर्मसु |
३७ क
भीष्म उवाच:
एतस्मात्कारणाद्राजा न दोषं प्राप्तुमर्हति ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
अर्थार्थमन्यद्भवति विपरीतमथापरम् |
३८ क
भीष्म उवाच:
अनर्थार्थमथाप्यन्यत्तत्सर्वं ह्यर्थलक्षणम् |
३८ ख
भीष्म उवाच:
एवं वुद्ध्या सम्प्रपश्येन्मेधावी कार्यनिश्चय़म् ||
३८ ग
भीष्म उवाच:
यज्ञार्थमन्यद्भवति यज्ञे नार्थस्तथापरः |
३९ क
भीष्म उवाच:
यज्ञस्यार्थार्थमेवान्यत्तत्सर्वं यज्ञसाधनम् ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
उपमामत्र वक्ष्यामि धर्मतत्त्वप्रकाशिनीम् |
४० क
भीष्म उवाच:
यूपं छिन्दन्ति यज्ञार्थं तत्र ये परिपन्थिनः ||
४० ख
भीष्म उवाच:
द्रुमाः केचन सामन्ता ध्रुवं छिन्दन्ति तानपि |
४१ क
भीष्म उवाच:
ते चापि निपतन्तोऽन्यान्निघ्नन्ति च वनस्पतीन् ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
एवं कोशस्य महतो ये नराः परिपन्थिनः |
४२ क
भीष्म उवाच:
तानहत्वा न पश्यामि सिद्धिमत्र परन्तप ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
धनेन जय़ते लोकावुभौ परमिमं तथा |
४३ क
भीष्म उवाच:
सत्यं च धर्मवचनं यथा नास्त्यधनस्तथा ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
सर्वोपाय़ैराददीत धनं यज्ञप्रय़ोजनम् |
४४ क
भीष्म उवाच:
न तुल्यदोषः स्यादेवं कार्याकार्येषु भारत ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
नैतौ सम्भवतो राजन्कथञ्चिदपि भारत |
४५ क
भीष्म उवाच:
न ह्यरण्येषु पश्यामि धनवृद्धानहं क्वचित् ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
यदिदं दृश्यते वित्तं पृथिव्यामिह किञ्चन |
४६ क
भीष्म उवाच:
ममेदं स्यान्ममेदं स्यादित्ययं काङ्क्षते जनः ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
न च राज्यसमो धर्मः कश्चिदस्ति परन्तप |
४७ क
भीष्म उवाच:
धर्मं शंसन्ति ते राज्ञामापदर्थमितोऽन्यथा ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
दानेन कर्मणा चान्ये तपसान्ये तपस्विनः |
४८ क
भीष्म उवाच:
वुद्ध्या दाक्ष्येण चाप्यन्ये चिन्वन्ति धनसञ्चय़ान् ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
अधनं दुर्वलं प्राहुर्धनेन वलवान्भवेत् |
४९ क