लोमश उवाच:
अस्मिन्किल स्वय़ं राजन्निष्टवान्वै प्रजापतिः |
१ क
लोमश उवाच:
सत्रमिष्टीकृतं नाम पुरा वर्षसहस्रिकम् ||
१ ख
लोमश उवाच:
अम्वरीषश्च नाभाग इष्टवान्यमुनामनु |
२ क
लोमश उवाच:
यज्ञैश्च तपसा चैव परां सिद्धिमवाप सः ||
२ ख
लोमश उवाच:
देशो नाहुषय़ज्ञानामय़ं पुण्यतमो नृप |
३ क
लोमश उवाच:
यत्रेष्ट्वा दश पद्मानि सदस्येभ्यो निसृष्टवान् ||
३ ख
लोमश उवाच:
सार्वभौमस्य कौन्तेय़ यय़ातेरमितौजसः |
४ क
लोमश उवाच:
स्पर्धमानस्य शक्रेण पश्येदं यज्ञवास्त्विह ||
४ ख
लोमश उवाच:
पश्य नानाविधाकारैरग्निभिर्निचितां महीम् |
५ क
लोमश उवाच:
मज्जन्तीमिव चाक्रान्तां यय़ातेर्यज्ञकर्मभिः ||
५ ख
लोमश उवाच:
एषा शम्येकपत्रा सा शरकं चैतदुत्तमम् |
६ क
लोमश उवाच:
पश्य रामह्रदानेतान्पश्य नाराय़णाश्रमम् ||
६ ख
लोमश उवाच:
एतदार्चीकपुत्रस्य योगैर्विचरतो महीम् |
७ क
लोमश उवाच:
अपसर्पणं महीपाल रौप्याय़ाममितौजसः ||
७ ख
लोमश उवाच:
अत्रानुवंशं पठतः शृणु मे कुरुनन्दन |
८ क
लोमश उवाच:
उलूखलैराभरणैः पिशाची यदभाषत ||
८ ख
लोमश उवाच:
युगन्धरे दधि प्राश्य उषित्वा चाच्युतस्थले |
९ क
लोमश उवाच:
तद्वद्भूतिलय़े स्नात्वा सपुत्रा वस्तुमिच्छसि ||
९ ख
लोमश उवाच:
एकरात्रमुषित्वेह द्वितीय़ं यदि वत्स्यसि |
१० क
लोमश उवाच:
एतद्वै ते दिवा वृत्तं रात्रौ वृत्तमतोऽन्यथा ||
१० ख
लोमश उवाच:
अत्राद्याहो निवत्स्यामः क्षपां भरतसत्तम |
११ क
लोमश उवाच:
द्वारमेतद्धि कौन्तेय़ कुरुक्षेत्रस्य भारत ||
११ ख
लोमश उवाच:
अत्रैव नाहुषो राजा राजन्क्रतुभिरिष्टवान् |
१२ क
लोमश उवाच:
यय़ातिर्वहुरत्नाढ्यैर्यत्रेन्द्रो मुदमभ्यगात् ||
१२ ख
लोमश उवाच:
एतत्प्लक्षावतरणं यमुनातीर्थमुच्यते |
१३ क
लोमश उवाच:
एतद्वै नाकपृष्ठस्य द्वारमाहुर्मनीषिणः ||
१३ ख
लोमश उवाच:
अत्र सारस्वतैर्यज्ञैरीजानाः परमर्षय़ः |
१४ क
लोमश उवाच:
यूपोलूखलिनस्तात गच्छन्त्यवभृथाप्लवम् ||
१४ ख
लोमश उवाच:
अत्रैव भरतो राजा मेध्यमश्वमवासृजत् |
१५ क
लोमश उवाच:
असकृत्कृष्णसारङ्गं धर्मेणावाप्य मेदिनीम् ||
१५ ख
लोमश उवाच:
अत्रैव पुरुषव्याघ्र मरुत्तः सत्रमुत्तमम् |
१६ क
लोमश उवाच:
आस्ते देवर्षिमुख्येन संवर्तेनाभिपालितः ||
१६ ख
लोमश उवाच:
अत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र सर्वाँल्लोकान्प्रपश्यति |
१७ क
लोमश उवाच:
पूय़ते दुष्कृताच्चैव समुपस्पृश्य भारत ||
१७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तत्र सभ्रातृकः स्नात्वा स्तूय़मानो महर्षिभिः |
१८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
लोमशं पाण्डवश्रेष्ठ इदं वचनमव्रवीत् ||
१८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सर्वाँल्लोकान्प्रपश्यामि तपसा सत्यविक्रम |
१९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
इहस्थः पाण्डवश्रेष्ठं पश्यामि श्वेतवाहनम् ||
१९ ख
लोमश उवाच:
एवमेतन्महावाहो पश्यन्ति परमर्षय़ः |
२० क
लोमश उवाच:
सरस्वतीमिमां पुण्यां पश्यैकशरणावृताम् ||
२० ख
लोमश उवाच:
यत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ धूतपाप्मा भविष्यति |
२१ क
लोमश उवाच:
इह सारस्वतैर्यज्ञैरिष्टवन्तः सुरर्षय़ः |
२१ ख
लोमश उवाच:
ऋषय़श्चैव कौन्तेय़ तथा राजर्षय़ोऽपि च ||
२१ ग
लोमश उवाच:
वेदी प्रजापतेरेषा समन्तात्पञ्चय़ोजना |
२२ क
लोमश उवाच:
कुरोर्वै यज्ञशीलस्य क्षेत्रमेतन्महात्मनः ||
२२ ख