chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १३
सहदेव उवाच:
न वाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत |
१ क
सहदेव उवाच:
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ||
१ ख
सहदेव उवाच:
वाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृध्यतः |
२ क
सहदेव उवाच:
यो धर्मो यत्सुखं वा स्याद्द्विषतां तत्तथास्तु नः ||
२ ख
सहदेव उवाच:
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य पृथिवीमनुशासतः |
३ क
सहदेव उवाच:
यो धर्मो यत्सुखं वा स्यात्सुहृदां तत्तथास्तु नः ||
३ ख
सहदेव उवाच:
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं व्रह्म शाश्वतम् |
४ क
सहदेव उवाच:
ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ||
४ ख
सहदेव उवाच:
व्रह्ममृत्यू च तौ राजन्नात्मन्येव समाश्रितौ |
५ क
सहदेव उवाच:
अदृश्यमानौ भूतानि योधय़ेतामसंशय़म् ||
५ ख
सहदेव उवाच:
अविनाशोऽस्य सत्त्वस्य निय़तो यदि भारत |
६ क
सहदेव उवाच:
भित्त्वा शरीरं भूतानां न हिंसा प्रतिपत्स्यते ||
६ ख
सहदेव उवाच:
अथापि च सहोत्पत्तिः सत्त्वस्य प्रलय़स्तथा |
७ क
सहदेव उवाच:
नष्टे शरीरे नष्टं स्याद्वृथा च स्यात्क्रिय़ापथः ||
७ ख
सहदेव उवाच:
तस्मादेकान्तमुत्सृज्य पूर्वैः पूर्वतरैश्च यः |
८ क
सहदेव उवाच:
पन्था निषेवितः सद्भिः स निषेव्यो विजानता ||
८ ख
सहदेव उवाच:
लव्ध्वापि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजङ्गमाम् |
९ क
सहदेव उवाच:
न भुङ्क्ते यो नृपः सम्यङ्निष्फलं तस्य जीवितम् ||
९ ख
सहदेव उवाच:
अथ वा वसतो राजन्वने वन्येन जीवतः |
१० क
सहदेव उवाच:
द्रव्येषु यस्य ममता मृत्योरास्ये स वर्तते ||
१० ख
सहदेव उवाच:
वाह्याभ्यन्तरभूतानां स्वभावं पश्य भारत |
११ क
सहदेव उवाच:
ये तु पश्यन्ति तद्भावं मुच्यन्ते महतो भय़ात् ||
११ ख
सहदेव उवाच:
भवान्पिता भवान्माता भवान्भ्राता भवान्गुरुः |
१२ क
सहदेव उवाच:
दुःखप्रलापानार्तस्य तस्मान्मे क्षन्तुमर्हसि ||
१२ ख
सहदेव उवाच:
तथ्यं वा यदि वातथ्यं यन्मय़ैतत्प्रभाषितम् |
१३ क
सहदेव उवाच:
तद्विद्धि पृथिवीपाल भक्त्या भरतसत्तम ||
१३ ख