युधिष्ठिर उवाच:
हीने परमके धर्मे सर्वलोकातिलङ्घिनि |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
सर्वस्मिन्दस्युसाद्भूते पृथिव्यामुपजीवने ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
केनास्मिन्व्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
असन्त्यजन्पुत्रपौत्राननुक्रोशात्पितामह ||
२ ख
भीष्म उवाच:
विज्ञानवलमास्थाय़ जीवितव्यं तथागते |
३ क
भीष्म उवाच:
सर्वं साध्वर्थमेवेदमसाध्वर्थं न किञ्चन ||
३ ख
भीष्म उवाच:
असाधुभ्यो निरादाय़ साधुभ्यो यः प्रय़च्छति |
४ क
भीष्म उवाच:
आत्मानं सङ्क्रमं कृत्वा कृत्स्नधर्मविदेव सः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
सुरोषेणात्मनो राजन्राज्ये स्थितिमकोपय़न् |
५ क
भीष्म उवाच:
अदत्तमप्याददीत दातुर्वित्तं ममेति वा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
विज्ञानवलपूतो यो वर्तते निन्दितेष्वपि |
६ क
भीष्म उवाच:
वृत्तविज्ञानवान्धीरः कस्तं किं वक्तुमर्हति ||
६ ख
भीष्म उवाच:
येषां वलकृता वृत्तिर्नैषामन्याभिरोचते |
७ क
भीष्म उवाच:
तेजसाभिप्रवर्धन्ते वलवन्तो युधिष्ठिर ||
७ ख
भीष्म उवाच:
यदेव प्रकृतं शास्त्रमविशेषेण विन्दति |
८ क
भीष्म उवाच:
तदेव मध्याः सेवन्ते मेधावी चाप्यथोत्तरम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान्सत्कृतैरभिपूजितान् |
९ क
भीष्म उवाच:
न व्राह्मणान्यातय़ेत दोषान्प्राप्नोति यातय़न् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
एतत्प्रमाणं लोकस्य चक्षुरेतत्सनातनम् |
१० क
भीष्म उवाच:
तत्प्रमाणोऽवगाहेत तेन तत्साध्वसाधु वा ||
१० ख
भीष्म उवाच:
वहूनि ग्रामवास्तव्या रोषाद्व्रूय़ुः परस्परम् |
११ क
भीष्म उवाच:
न तेषां वचनाद्राजा सत्कुर्याद्यातय़ेत वा ||
११ ख
भीष्म उवाच:
न वाच्यः परिवादो वै न श्रोतव्यः कथञ्चन |
१२ क
भीष्म उवाच:
कर्णावेव पिधातव्यौ प्रस्थेय़ं वा ततोऽन्यतः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
न वै सतां वृत्तमेतत्परिवादो न पैशुनम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
गुणानामेव वक्तारः सन्तः सत्सु युधिष्ठिर ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यथा समधुरौ दम्यौ सुदान्तौ साधुवाहिनौ |
१४ क
भीष्म उवाच:
धुरमुद्यम्य वहतस्तथा वर्तेत वै नृपः |
१४ ख
भीष्म उवाच:
यथा यथास्य वहतः सहाय़ाः स्युस्तथापरे ||
१४ ग
भीष्म उवाच:
आचारमेव मन्यन्ते गरीय़ो धर्मलक्षणम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
अपरे नैवमिच्छन्ति ये शङ्खलिखितप्रिय़ाः |
१५ ख
भीष्म उवाच:
मार्दवादथ लोभाद्वा ते व्रूय़ुर्वाक्यमीदृशम् ||
१५ ग
भीष्म उवाच:
आर्षमप्यत्र पश्यन्ति विकर्मस्थस्य यापनम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
न चार्षात्सदृशं किञ्चित्प्रमाणं विद्यते क्वचित् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
देवा अपि विकर्मस्थं यातय़न्ति नराधमम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
व्याजेन विन्दन्वित्तं हि धर्मात्तु परिहीय़ते ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
सर्वतः सत्कृतः सद्भिर्भूतिप्रभवकारणैः |
१८ क
भीष्म उवाच:
हृदय़ेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं व्यवस्यति ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
यश्चतुर्गुणसम्पन्नं धर्मं वेद स धर्मवित् |
१९ क
भीष्म उवाच:
अहेरिव हि धर्मस्य पदं दुःखं गवेषितुम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
यथा मृगस्य विद्धस्य मृगव्याधः पदं नय़ेत् |
२० क
भीष्म उवाच:
कक्षे रुधिरपातेन तथा धर्मपदं नय़ेत् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
एवं सद्भिर्विनीतेन पथा गन्तव्यमच्युत |
२१ क
भीष्म उवाच:
राजर्षीणां वृत्तमेतदवगच्छ युधिष्ठिर ||
२१ ख