chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय १३१
महेश्वर उवाच:
सर्वोऽय़ं व्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीय़ते |
५० क
महेश्वर उवाच:
वृत्ते स्थितश्च सुश्रोणि व्राह्मणत्वं निगच्छति ||
५० ख
महेश्वर उवाच:
व्राह्मः स्वभावः कल्याणि समः सर्वत्र मे मतिः |
५१ क
महेश्वर उवाच:
निर्गुणं निर्मलं व्रह्म यत्र तिष्ठति स द्विजः ||
५१ ख
महेश्वर उवाच:
एते योनिफला देवि स्थानभागनिदर्शकाः |
५२ क
महेश्वर उवाच:
स्वय़ं च वरदेनोक्ता व्रह्मणा सृजता प्रजाः ||
५२ ख
महेश्वर उवाच:
व्राह्मणो हि महत्क्षेत्रं लोके चरति पादवत् |
५३ क
महेश्वर उवाच:
यत्तत्र वीजं वपति सा कृषिः पारलौकिकी ||
५३ ख
महेश्वर उवाच:
मिताशिना सदा भाव्यं सत्पथालम्विना सदा |
५४ क
महेश्वर उवाच:
व्राह्ममार्गमतिक्रम्य वर्तितव्यं वुभूषता ||
५४ ख
महेश्वर उवाच:
संहिताध्याय़िना भाव्यं गृहे वै गृहमेधिना |
५५ क
महेश्वर उवाच:
नित्यं स्वाध्याय़युक्तेन दानाध्ययनजीविना ||
५५ ख
महेश्वर उवाच:
एवम्भूतो हि यो विप्रः सततं सत्पथे स्थितः |
५६ क
महेश्वर उवाच:
आहिताग्निरधीय़ानो व्रह्मभूय़ाय़ कल्पते ||
५६ ख
महेश्वर उवाच:
व्राह्मण्यमेव सम्प्राप्य रक्षितव्यं यतात्मभिः |
५७ क
महेश्वर उवाच:
योनिप्रतिग्रहादानैः कर्मभिश्च शुचिस्मिते ||
५७ ख
महेश्वर उवाच:
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा शूद्रो भवेद्द्विजः |
५८ क
महेश्वर उवाच:
व्राह्मणो वा च्युतो धर्माद्यथा शूद्रत्वमाप्नुते ||
५८ ख