chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १३१
भीष्म उवाच:
स्वराष्ट्रात्परराष्ट्राच्च कोशं सञ्जनय़ेन्नृपः |
१ क
भीष्म उवाच:
कोशाद्धि धर्मः कौन्तेय़ राज्यमूलः प्रवर्तते ||
१ ख
भीष्म उवाच:
तस्मात्सञ्जनय़ेत्कोशं संहृत्य परिपालय़ेत् |
२ क
भीष्म उवाच:
परिपाल्यानुगृह्णीय़ादेष धर्मः सनातनः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
न कोशः शुद्धशौचेन न नृशंसेन जाय़ते |
३ क
भीष्म उवाच:
पदं मध्यममास्थाय़ कोशसङ्ग्रहणं चरेत् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
अवलस्य कुतः कोशो ह्यकोशस्य कुतो वलम् |
४ क
भीष्म उवाच:
अवलस्य कुतो राज्यमराज्ञः श्रीः कुतो भवेत् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
उच्चैर्वृत्तेः श्रिय़ो हानिर्यथैव मरणं तथा |
५ क
भीष्म उवाच:
तस्मात्कोशं वलं मित्राण्यथ राजा विवर्धय़ेत् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
हीनकोशं हि राजानमवजानन्ति मानवाः |
६ क
भीष्म उवाच:
न चास्याल्पेन तुष्यन्ति कार्यमभ्युत्सहन्ति च ||
६ ख
भीष्म उवाच:
श्रिय़ो हि कारणाद्राजा सत्क्रिय़ां लभते पराम् |
७ क
भीष्म उवाच:
सास्य गूहति पापानि वासो गुह्यमिव स्त्रिय़ाः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ऋद्धिमस्यानुवर्तन्ते पुरा विप्रकृता जनाः |
८ क
भीष्म उवाच:
शालावृका इवाजस्रं जिघांसूनिव विन्दति |
८ ख
भीष्म उवाच:
ईदृशस्य कुतो राज्ञः सुखं भरतसत्तम ||
८ ग
भीष्म उवाच:
उद्यच्छेदेव न ग्लाय़ेदुद्यमो ह्येव पौरुषम् |
९ क
भीष्म उवाच:
अप्यपर्वणि भज्येत न नमेतेह कस्यचित् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
अप्यरण्यं समाश्रित्य चरेद्दस्युगणैः सह |
१० क
भीष्म उवाच:
न त्वेवोद्धृतमर्यादैर्दस्युभिः सहितश्चरेत् |
१० ख
भीष्म उवाच:
दस्यूनां सुलभा सेना रौद्रकर्मसु भारत ||
१० ग
भीष्म उवाच:
एकान्तेन ह्यमर्यादात्सर्वोऽप्युद्विजते जनः |
११ क
भीष्म उवाच:
दस्यवोऽप्युपशङ्कन्ते निरनुक्रोशकारिणः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
स्थापय़ेदेव मर्यादां जनचित्तप्रसादिनीम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
अल्पाप्यथेह मर्यादा लोके भवति पूजिता ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
नाय़ं लोकोऽस्ति न पर इति व्यवसितो जनः |
१३ क
भीष्म उवाच:
नालं गन्तुं च विश्वासं नास्तिके भय़शङ्किनि ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यथा सद्भिः परादानमहिंसा दस्युभिस्तथा |
१४ क
भीष्म उवाच:
अनुरज्यन्ति भूतानि समर्यादेषु दस्युषु ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
अय़ुध्यमानस्य वधो दारामर्शः कृतघ्नता |
१५ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मवित्तस्य चादानं निःशेषकरणं तथा |
१५ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रिय़ा मोषः परिस्थानं दस्युष्वेतद्विगर्हितम् ||
१५ ग
भीष्म उवाच:
स एष एव भवति दस्युरेतानि वर्जय़न् |
१६ क
भीष्म उवाच:
अभिसन्दधते ये न विनाशाय़ास्य भारत |
१६ ख
भीष्म उवाच:
नशेषमेवोपालभ्य न कुर्वन्तीति निश्चय़ः ||
१६ ग
भीष्म उवाच:
तस्मात्सशेषं कर्तव्यं स्वाधीनमपि दस्युभिः |
१७ क
भीष्म उवाच:
न वलस्थोऽहमस्मीति नृशंसानि समाचरेत् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
सशेषकारिणस्तात शेषं पश्यन्ति सर्वतः |
१८ क
भीष्म उवाच:
निःशेषकारिणो नित्यमशेषकरणाद्भय़म् ||
१८ ख