chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय १३२
महेश्वर उवाच:
विपरीतस्तु धर्मात्मा रूपवानभिजाय़ते ||
५० ख
महेश्वर उवाच:
निरय़ं याति हिंसात्मा याति स्वर्गमहिंसकः |
५१ क
महेश्वर उवाच:
यातनां निरय़े रौद्रां स कृच्छ्रां लभते नरः ||
५१ ख
महेश्वर उवाच:
अथ चेन्निरय़ात्तस्मात्समुत्तरति कर्हिचित् |
५२ क
महेश्वर उवाच:
मानुष्यं लभते चापि हीनाय़ुस्तत्र जाय़ते ||
५२ ख
महेश्वर उवाच:
पापेन कर्मणा देवि वद्धो हिंसारतिर्नरः |
५३ क
महेश्वर उवाच:
अप्रिय़ः सर्वभूतानां हीनाय़ुरुपजाय़ते ||
५३ ख
महेश्वर उवाच:
यस्तु शुक्लाभिजातीय़ः प्राणिघातविवर्जकः |
५४ क
महेश्वर उवाच:
निक्षिप्तदण्डो निर्दण्डो न हिनस्ति कदाचन ||
५४ ख
महेश्वर उवाच:
न घातय़ति नो हन्ति घ्नन्तं नैवानुमोदते |
५५ क
महेश्वर उवाच:
सर्वभूतेषु सस्नेहो यथात्मनि तथापरे ||
५५ ख
महेश्वर उवाच:
ईदृशः पुरुषोत्कर्षो देवि देवत्वमश्नुते |
५६ क
महेश्वर उवाच:
उपपन्नान्सुखान्भोगानुपाश्नाति मुदा युतः ||
५६ ख
महेश्वर उवाच:
अथ चेन्मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते |
५७ क
महेश्वर उवाच:
तत्र दीर्घाय़ुरुत्पन्नः स नरः सुखमेधते ||
५७ ख
महेश्वर उवाच:
एवं दीर्घाय़ुषां मार्गः सुवृत्तानां सुकर्मणाम् |
५८ क
महेश्वर उवाच:
प्राणिहिंसाविमोक्षेण व्रह्मणा समुदीरितः ||
५८ ख