chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १३२
भीष्म उवाच:
अत्र कर्मान्तवचनं कीर्तय़न्ति पुराविदः |
१ क
भीष्म उवाच:
प्रत्यक्षावेव धर्मार्थौ क्षत्रिय़स्य विजानतः |
१ ख
भीष्म उवाच:
तत्र न व्यवधातव्यं परोक्षा धर्मय़ापना ||
१ ग
भीष्म उवाच:
अधर्मो धर्म इत्येतद्यथा वृकपदं तथा |
२ क
भीष्म उवाच:
धर्माधर्मफले जातु न ददर्शेह कश्चन ||
२ ख
भीष्म उवाच:
वुभूषेद्वलवानेव सर्वं वलवतो वशे |
३ क
भीष्म उवाच:
श्रिय़ं वलममात्यांश्च वलवानिह विन्दति ||
३ ख
भीष्म उवाच:
यो ह्यनाढ्यः स पतितस्तदुच्छिष्टं यदल्पकम् |
४ क
भीष्म उवाच:
वह्वपथ्यं वलवति न किञ्चित्त्राय़ते भय़ात् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
उभौ सत्याधिकारौ तौ त्राय़ेते महतो भय़ात् |
५ क
भीष्म उवाच:
अति धर्माद्वलं मन्ये वलाद्धर्मः प्रवर्तते ||
५ ख
भीष्म उवाच:
वले प्रतिष्ठितो धर्मो धरण्यामिव जङ्गमः |
६ क
भीष्म उवाच:
धूमो वाय़ोरिव वशं वलं धर्मोऽनुवर्तते ||
६ ख
भीष्म उवाच:
अनीश्वरे वलं धर्मो द्रुमं वल्लीव संश्रिता |
७ क
भीष्म उवाच:
वश्यो वलवतां धर्मः सुखं भोगवतामिव |
७ ख
भीष्म उवाच:
नास्त्यसाध्यं वलवतां सर्वं वलवतां शुचि ||
७ ग
भीष्म उवाच:
दुराचारः क्षीणवलः परिमाणं निय़च्छति |
८ क
भीष्म उवाच:
अथ तस्मादुद्विजते सर्वो लोको वृकादिव ||
८ ख
भीष्म उवाच:
अपध्वस्तो ह्यवमतो दुःखं जीवति जीवितम् |
९ क
भीष्म उवाच:
जीवितं यदवक्षिप्तं यथैव मरणं तथा ||
९ ख
भीष्म उवाच:
यदेनमाहुः पापेन चारित्रेण विनिक्षतम् |
१० क
भीष्म उवाच:
स भृशं तप्यतेऽनेन वाक्षल्येन परिक्षतः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिमोक्षणे |
११ क
भीष्म उवाच:
त्रय़ीं विद्यां निषेवेत तथोपासीत स द्विजान् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
प्रसादय़ेन्मधुरय़ा वाचाप्यथ च कर्मणा |
१२ क
भीष्म उवाच:
महामनाश्चैव भवेद्विवहेच्च महाकुले ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
इत्यस्मीति वदेदेवं परेषां कीर्तय़न्गुणान् |
१३ क
भीष्म उवाच:
जपेदुदकशीलः स्यात्पेशलो नातिजल्पनः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मक्षत्रं सम्प्रविशेद्वहु कृत्वा सुदुष्करम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
उच्यमानोऽपि लोकेन वहु तत्तदचिन्तय़न् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
अपापो ह्येवमाचारः क्षिप्रं वहुमतो भवेत् |
१५ क
भीष्म उवाच:
सुखं वित्तं च भुञ्जीत वृत्तेनैतेन गोपय़ेत् |
१५ ख
भीष्म उवाच:
लोके च लभते पूजां परत्र च महत्फलम् ||
१५ ग