chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय १३४
भीष्म उवाच:
या नारी भर्तृपरमा भवेद्भर्तृव्रता शिवा ||
५० ख
भीष्म उवाच:
पतिर्हि देवो नारीणां पतिर्वन्धुः पतिर्गतिः |
५१ क
भीष्म उवाच:
पत्या समा गतिर्नास्ति दैवतं वा यथा पतिः ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
पतिप्रसादः स्वर्गो वा तुल्यो नार्या न वा भवेत् |
५२ क
भीष्म उवाच:
अहं स्वर्गं न हीच्छेय़ं त्वय़्यप्रीते महेश्वर ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
यद्यकार्यमधर्मं वा यदि वा प्राणनाशनम् |
५३ क
भीष्म उवाच:
पतिर्व्रूय़ाद्दरिद्रो वा व्याधितो वा कथञ्चन ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
आपन्नो रिपुसंस्थो वा व्रह्मशापार्दितोऽपि वा |
५४ क
भीष्म उवाच:
आपद्धर्माननुप्रेक्ष्य तत्कार्यमविशङ्कय़ा ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
एष देव मय़ा प्रोक्तः स्त्रीधर्मो वचनात्तव |
५५ क
भीष्म उवाच:
या त्वेवम्भाविनी नारी सा भवेद्धर्मभागिनी ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तः स तु देवेशः प्रतिपूज्य गिरेः सुताम् |
५६ क
भीष्म उवाच:
लोकान्विसर्जय़ामास सर्वैरनुचरैः सह ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
ततो यय़ुर्भूतगणाः सरितश्च यथागतम् |
५७ क
भीष्म उवाच:
गन्धर्वाप्सरसश्चैव प्रणम्य शिरसा भवम् ||
५७ ख