chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय १३४
महेश्वर उवाच:
परावरज्ञे धर्मज्ञे तपोवननिवासिनि |
१ क
महेश्वर उवाच:
साध्वि सुभ्रु सुकेशान्ते हिमवत्पर्वतात्मजे ||
१ ख
महेश्वर उवाच:
दक्षे शमदमोपेते निर्ममे धर्मचारिणि |
२ क
महेश्वर उवाच:
पृच्छामि त्वां वरारोहे पृष्टा वद ममेप्सितम् ||
२ ख
महेश्वर उवाच:
सावित्री व्रह्मणः साध्वी कौशिकस्य शची सती |
३ क
महेश्वर उवाच:
मार्तण्डजस्य धूमोर्णा ऋद्धिर्वैश्रवणस्य च ||
३ ख
महेश्वर उवाच:
वरुणस्य ततो गौरी सूर्यस्य च सुवर्चला |
४ क
महेश्वर उवाच:
रोहिणी शशिनः साध्वी स्वाहा चैव विभावसोः ||
४ ख
महेश्वर उवाच:
अदितिः कश्यपस्याथ सर्वास्ताः पतिदेवताः |
५ क
महेश्वर उवाच:
पृष्टाश्चोपासिताश्चैव तास्त्वय़ा देवि नित्यशः ||
५ ख
महेश्वर उवाच:
तेन त्वां परिपृच्छामि धर्मज्ञे धर्मवादिनि |
६ क
महेश्वर उवाच:
स्त्रीधर्मं श्रोतुमिच्छामि त्वय़ोदाहृतमादितः ||
६ ख
महेश्वर उवाच:
सहधर्मचरी मे त्वं समशीला समव्रता |
७ क
महेश्वर उवाच:
समानसारवीर्या च तपस्तीव्रं कृतं च ते |
७ ख
महेश्वर उवाच:
त्वय़ा ह्युक्तो विशेषेण प्रमाणत्वमुपैष्यति ||
७ ग
महेश्वर उवाच:
स्त्रिय़श्चैव विशेषेण स्त्रीजनस्य गतिः सदा |
८ क
महेश्वर उवाच:
गौर्गां गच्छति सुश्रोणि लोकेष्वेषा स्थितिः सदा ||
८ ख
महेश्वर उवाच:
मम चार्धं शरीरस्य मम चार्धाद्विनिःसृता |
९ क
महेश्वर उवाच:
सुरकार्यकरी च त्वं लोकसन्तानकारिणी ||
९ ख
महेश्वर उवाच:
तव सर्वः सुविदितः स्त्रीधर्मः शाश्वतः शुभे |
१० क
महेश्वर उवाच:
तस्मादशेषतो व्रूहि स्त्रीधर्मं विस्तरेण मे ||
१० ख
उमो उवाच:
भगवन्सर्वभूतेश भूतभव्यभवोद्भव |
११ क
उमो उवाच:
त्वत्प्रभावादिय़ं देव वाक्चैव प्रतिभाति मे ||
११ ख
उमो उवाच:
इमास्तु नद्यो देवेश सर्वतीर्थोदकैर्युताः |
१२ क
उमो उवाच:
उपस्पर्शनहेतोस्त्वा समीपस्था उपासते ||
१२ ख
उमो उवाच:
एताभिः सह संमन्त्र्य प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः |
१३ क
उमो उवाच:
प्रभवन्योऽनहंवादी स वै पुरुष उच्यते ||
१३ ख
उमो उवाच:
स्त्री च भूतेश सततं स्त्रिय़मेवानुधावति |
१४ क
उमो उवाच:
मय़ा संमानिताश्चैव भविष्यन्ति सरिद्वराः ||
१४ ख
उमो उवाच:
एषा सरस्वती पुण्या नदीनामुत्तमा नदी |
१५ क
उमो उवाच:
प्रथमा सर्वसरितां नदी सागरगामिनी ||
१५ ख
उमो उवाच:
विपाशा च वितस्ता च चन्द्रभागा इरावती |
१६ क
उमो उवाच:
शतद्रुर्देविका सिन्धुः कौशिकी गोमती तथा ||
१६ ख
उमो उवाच:
तथा देवनदी चेय़ं सर्वतीर्थाभिसंवृता |
१७ क
उमो उवाच:
गगनाद्गां गता देवी गङ्गा सर्वसरिद्वरा ||
१७ ख
उमो उवाच:
इत्युक्त्वा देवदेवस्य पत्नी धर्मभृतां वरा |
१८ क
उमो उवाच:
स्मितपूर्वमिवाभाष्य सर्वास्ताः सरितस्तदा ||
१८ ख
उमो उवाच:
अपृच्छद्देवमहिषी स्त्रीधर्मं धर्मवत्सला |
१९ क
उमो उवाच:
स्त्रीधर्मकुशलास्ता वै गङ्गाद्याः सरितां वराः ||
१९ ख
उमो उवाच:
अय़ं भगवता दत्तः प्रश्नः स्त्रीधर्मसंश्रितः |
२० क
उमो उवाच:
तं तु संमन्त्र्य युष्माभिर्वक्तुमिच्छामि शङ्करे ||
२० ख
उमो उवाच:
न चैकसाध्यं पश्यामि विज्ञानं भुवि कस्यचित् |
२१ क
उमो उवाच:
दिवि वा सागरगमास्तेन वो मानय़ाम्यहम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
एवं सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः पृष्टाः पुण्यतमाः शिवाः |
२२ क
भीष्म उवाच:
ततो देवनदी गङ्गा निय़ुक्ता प्रतिपूज्य ताम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
वह्वीभिर्वुद्धिभिः स्फीता स्त्रीधर्मज्ञा शुचिस्मिता |
२३ क
भीष्म उवाच:
शैलराजसुतां देवीं पुण्या पापापहां शिवाम् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
वुद्ध्या विनय़सम्पन्ना सर्वज्ञानविशारदा |
२४ क
भीष्म उवाच:
सस्मितं वहुवुद्ध्याढ्या गङ्गा वचनमव्रवीत् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
धन्याः स्मोऽनुगृहीताः स्मो देवि धर्मपराय़णा |
२५ क
भीष्म उवाच:
या त्वं सर्वजगन्मान्या नदीर्मानय़सेऽनघे ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
प्रभवन्पृच्छते यो हि संमानय़ति वा पुनः |
२६ क
भीष्म उवाच:
नूनं जनमदुष्टात्मा पण्डिताख्यां स गच्छति ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नानूहापोहविशारदान् |
२७ क
भीष्म उवाच:
प्रवक्तॄन्पृच्छते योऽन्यान्स वै ना पदमर्च्छति ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
अन्यथा वहुवुद्ध्याढ्यो वाक्यं वदति संसदि |
२८ क
भीष्म उवाच:
अन्यथैव ह्यहंमानी दुर्वलं वदते वचः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
दिव्यज्ञाने दिवि श्रेष्ठे दिव्यपुण्ये सदोत्थिते |
२९ क
भीष्म उवाच:
त्वमेवार्हसि नो देवि स्त्रीधर्ममनुशासितुम् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
ततः साराधिता देवी गङ्गय़ा वहुभिर्गुणैः |
३० क
भीष्म उवाच:
प्राह सर्वमशेषेण स्त्रीधर्मं सुरसुन्दरी ||
३० ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीधर्मो मां प्रति यथा प्रतिभाति यथाविधि |
३१ क
भीष्म उवाच:
तमहं कीर्तय़िष्यामि तथैव प्रथितो भवेत् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीधर्मः पूर्व एवाय़ं विवाहे वन्धुभिः कृतः |
३२ क
भीष्म उवाच:
सहधर्मचरी भर्तुर्भवत्यग्निसमीपतः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
सुस्वभावा सुवचना सुवृत्ता सुखदर्शना |
३३ क
भीष्म उवाच:
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
सा भवेद्धर्मपरमा सा भवेद्धर्मभागिनी |
३४ क
भीष्म उवाच:
देववत्सततं साध्वी या भर्तारं प्रपश्यति ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
शुश्रूषां परिचारं च देववद्या करोति च |
३५ क
भीष्म उवाच:
नान्यभावा ह्यविमनाः सुव्रता सुखदर्शना ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
पुत्रवक्त्रमिवाभीक्ष्णं भर्तुर्वदनमीक्षते |
३६ क
भीष्म उवाच:
या साध्वी निय़ताचारा सा भवेद्धर्मचारिणी ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
श्रुत्वा दम्पतिधर्मं वै सहधर्मकृतं शुभम् |
३७ क
भीष्म उवाच:
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
परुषाण्यपि चोक्ता या दृष्टा वा क्रूरचक्षुषा |
३८ क
भीष्म उवाच:
सुप्रसन्नमुखी भर्तुर्या नारी सा पतिव्रता ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
न चन्द्रसूर्यौ न तरुं पुंनाम्नो या निरीक्षते |
३९ क
भीष्म उवाच:
भर्तृवर्जं वरारोहा सा भवेद्धर्मचारिणी ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
दरिद्रं व्याधितं दीनमध्वना परिकर्शितम् |
४० क
भीष्म उवाच:
पतिं पुत्रमिवोपास्ते सा नारी धर्मभागिनी ||
४० ख
भीष्म उवाच:
या नारी प्रय़ता दक्षा या नारी पुत्रिणी भवेत् |
४१ क
भीष्म उवाच:
पतिप्रिय़ा पतिप्राणा सा नारी धर्मभागिनी ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
शुश्रूषां परिचर्यां च करोत्यविमनाः सदा |
४२ क
भीष्म उवाच:
सुप्रतीता विनीता च सा नारी धर्मभागिनी ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्ये न सुखे तथा |
४३ क
भीष्म उवाच:
स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्मभागिनी ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
कल्योत्थानरता नित्यं गुरुशुश्रूषणे रता |
४४ क
भीष्म उवाच:
सुसंमृष्टक्षय़ा चैव गोशकृत्कृतलेपना ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
अग्निकार्यपरा नित्यं सदा पुष्पवलिप्रदा |
४५ क
भीष्म उवाच:
देवतातिथिभृत्यानां निरुप्य पतिना सह ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्याय़ं यथाविधि |
४६ क
भीष्म उवाच:
तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
श्वश्रूश्वशुरय़ोः पादौ तोषय़न्ती गुणान्विता |
४७ क
भीष्म उवाच:
मातापितृपरा नित्यं या नारी सा तपोधना ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणान्दुर्वलानाथान्दीनान्धकृपणांस्तथा |
४८ क
भीष्म उवाच:
विभर्त्यन्नेन या नारी सा पतिव्रतभागिनी ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
व्रतं चरति या नित्यं दुश्चरं लघुसत्त्वय़ा |
४९ क
भीष्म उवाच:
पतिचित्ता पतिहिता सा पतिव्रतभागिनी ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
पुण्यमेतत्तपश्चैव स्वर्गश्चैष सनातनः |
५० क