chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय १३५
भीष्म उवाच:
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् |
५१ क
भीष्म उवाच:
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
अतुलः शरभो भीमः समय़ज्ञो हविर्हरिः |
५२ क
भीष्म उवाच:
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्जय़ः ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः |
५३ क
भीष्म उवाच:
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः |
५४ क
भीष्म उवाच:
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
व्यवसाय़ो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः |
५५ क
भीष्म उवाच:
परर्द्धिः परमः स्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
रामो विरामो विरतो मार्गो नेय़ो नय़ोऽनय़ः |
५६ क
भीष्म उवाच:
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः |
५७ क
भीष्म उवाच:
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वाय़ुरधोक्षजः ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः |
५८ क
भीष्म उवाच:
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
विस्तारः स्थावरः स्थाणुः प्रमाणं वीजमव्ययम् |
५९ क
भीष्म उवाच:
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
अनिर्विण्णः स्थविष्ठो भूर्धर्मय़ूपो महामखः |
६० क
भीष्म उवाच:
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ||
६० ख
भीष्म उवाच:
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः |
६१ क
भीष्म उवाच:
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् |
६२ क
भीष्म उवाच:
मनोहरो जितक्रोधो वीरवाहुर्विदारणः ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् |
६३ क
भीष्म उवाच:
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
धर्मगुव्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् |
६४ क
भीष्म उवाच:
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः |
६५ क
भीष्म उवाच:
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः |
६६ क
भीष्म उवाच:
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः |
६७ क
भीष्म उवाच:
विनय़ो जय़ः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतां पतिः ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
जीवो विनय़िता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः |
६८ क
भीष्म उवाच:
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशय़ोऽन्तकः ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः |
६९ क
भीष्म उवाच:
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः |
७० क
भीष्म उवाच:
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ||
७० ख
भीष्म उवाच:
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी |
७१ क
भीष्म उवाच:
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः |
७२ क
भीष्म उवाच:
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
भगवान्भगहा नन्दी वनमाली हलाय़ुधः |
७३ क
भीष्म उवाच:
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ||
७३ ख
भीष्म उवाच:
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः |
७४ क
भीष्म उवाच:
दिवःस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरय़ोनिजः ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् |
७५ क
भीष्म उवाच:
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः पराय़णम् ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशय़ः |
७६ क
भीष्म उवाच:
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रिय़ः ||
७६ ख
भीष्म उवाच:
अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः |
७७ क
भीष्म उवाच:
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ||
७७ ख
भीष्म उवाच:
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः |
७८ क
भीष्म उवाच:
श्रीधरः श्रीकरः श्रेय़ः श्रीमाँल्लोकत्रय़ाश्रय़ः ||
७८ ख
भीष्म उवाच:
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः |
७९ क
भीष्म उवाच:
विजितात्मा विधेय़ात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशय़ः ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतः स्थिरः |
८० क
भीष्म उवाच:
भूशय़ो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ||
८० ख
भीष्म उवाच:
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः |
८१ क
भीष्म उवाच:
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ||
८१ ख
भीष्म उवाच:
कालनेमिनिहा वीरः शूरः शौरिर्जनेश्वरः |
८२ क
भीष्म उवाच:
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः |
८३ क
भीष्म उवाच:
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जय़ः ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मण्यो व्रह्मकृद्व्रह्मा व्रह्म व्रह्मविवर्धनः |
८४ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मविद्व्राह्मणो व्रह्मी व्रह्मज्ञो व्राह्मणप्रिय़ः ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः |
८५ क
भीष्म उवाच:
महाक्रतुर्महाय़ज्वा महाय़ज्ञो महाहविः ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
स्तव्यः स्तवप्रिय़ः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रिय़ः |
८६ क
भीष्म उवाच:
पूर्णः पूरय़िता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामय़ः ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः |
८७ क
भीष्म उवाच:
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्पराय़णः |
८८ क
भीष्म उवाच:
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुय़ामुनः ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
भूतावासो वासुदेवो सर्वासुनिलय़ोऽनलः |
८९ क
भीष्म उवाच:
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ||
८९ ख
भीष्म उवाच:
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् |
९० क
भीष्म उवाच:
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ||
९० ख
भीष्म उवाच:
एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् |
९१ क
भीष्म उवाच:
लोकवन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी |
९२ क
भीष्म उवाच:
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ||
९२ ख
भीष्म उवाच:
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् |
९३ क
भीष्म उवाच:
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ||
९३ ख
भीष्म उवाच:
तेजो वृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः |
९४ क
भीष्म उवाच:
प्रग्रहो निग्रहोऽव्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ||
९४ ख
भीष्म उवाच:
चतुर्मूर्तिश्चतुर्वाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः |
९५ क
भीष्म उवाच:
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ||
९५ ख
भीष्म उवाच:
समावर्तो निवृत्तात्मा दुर्जय़ो दुरतिक्रमः |
९६ क
भीष्म उवाच:
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ||
९६ ख
भीष्म उवाच:
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः |
९७ क
भीष्म उवाच:
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ||
९७ ख
भीष्म उवाच:
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः |
९८ क
भीष्म उवाच:
अर्को वाजसनः शृङ्गी जय़न्तः सर्वविज्जय़ी ||
९८ ख
भीष्म उवाच:
सुवर्णविन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः |
९९ क
भीष्म उवाच:
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ||
९९ ख
भीष्म उवाच:
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पवनोऽनिलः |
१०० क
भीष्म उवाच:
अमृतांशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ||
१०० ख