chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १३५
भीष्म उवाच:
अत्रैव चेदमव्यग्रः शृण्वाख्यानमनुत्तमम् |
१ क
भीष्म उवाच:
दीर्घसूत्रं समाश्रित्य कार्याकार्यविनिश्चय़े ||
१ ख
भीष्म उवाच:
नातिगाधे जलस्थाय़े सुहृदः शकुलास्त्रय़ः |
२ क
भीष्म उवाच:
प्रभूतमत्स्ये कौन्तेय़ वभूवुः सहचारिणः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
अत्रैकः प्राप्तकालज्ञो दीर्घदर्शी तथापरः |
३ क
भीष्म उवाच:
दीर्घसूत्रश्च तत्रैकस्त्रय़ाणां जलचारिणाम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
कदाचित्तज्जलस्थाय़ं मत्स्यवन्धाः समन्ततः |
४ क
भीष्म उवाच:
निःस्रावय़ामासुरथो निम्नेषु विविधैर्मुखैः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
प्रक्षीय़माणं तं वुद्ध्वा जलस्थाय़ं भय़ागमे |
५ क
भीष्म उवाच:
अव्रवीद्दीर्घदर्शी तु तावुभौ सुहृदौ तदा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
इय़मापत्समुत्पन्ना सर्वेषां सलिलौकसाम् |
६ क
भीष्म उवाच:
शीघ्रमन्यत्र गच्छामः पन्था यावन्न दुष्यति ||
६ ख
भीष्म उवाच:
अनागतमनर्थं हि सुनय़ैर्यः प्रवाधते |
७ क
भीष्म उवाच:
न स संशय़माप्नोति रोचतां वां व्रजामहे ||
७ ख
भीष्म उवाच:
दीर्घसूत्रस्तु यस्तत्र सोऽव्रवीत्सम्यगुच्यते |
८ क
भीष्म उवाच:
न तु कार्या त्वरा यावदिति मे निश्चिता मतिः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
अथ सम्प्रतिपत्तिज्ञः प्राव्रवीद्दीर्घदर्शिनम् |
९ क
भीष्म उवाच:
प्राप्ते काले न मे किञ्चिन्न्याय़तः परिहास्यते ||
९ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तो निराक्रामद्दीर्घदर्शी महामतिः |
१० क
भीष्म उवाच:
जगाम स्रोतसैकेन गम्भीरसलिलाशय़म् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ततः प्रस्रुततोय़ं तं समीक्ष्य सलिलाशय़म् |
११ क
भीष्म उवाच:
ववन्धुर्विविधैर्योगैर्मत्स्यान्मत्स्योपजीविनः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
विलोड्यमाने तस्मिंस्तु स्रुततोय़े जलाशय़े |
१२ क
भीष्म उवाच:
अगच्छद्ग्रहणं तत्र दीर्घसूत्रः सहापरैः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
उद्दानं क्रिय़माणं च मत्स्यानां वीक्ष्य रज्जुभिः |
१३ क
भीष्म उवाच:
प्रविश्यान्तरमन्येषामग्रसत्प्रतिपत्तिमान् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
ग्रस्तमेव तदुद्दानं गृहीत्वास्त तथैव सः |
१४ क
भीष्म उवाच:
सर्वानेव तु तांस्तत्र ते विदुर्ग्रथिता इति ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
ततः प्रक्षाल्यमानेषु मत्स्येषु विमले जले |
१५ क
भीष्म उवाच:
त्यक्त्वा रज्जुं विमुक्तोऽभूच्छीघ्रं सम्प्रतिपत्तिमान् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
दीर्घसूत्रस्तु मन्दात्मा हीनवुद्धिरचेतनः |
१६ क
भीष्म उवाच:
मरणं प्राप्तवान्मूढो यथैवोपहतेन्द्रिय़ः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
एवं प्राप्ततमं कालं यो मोहान्नाववुध्यते |
१७ क
भीष्म उवाच:
स विनश्यति वै क्षिप्रं दीर्घसूत्रो यथा झषः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
आदौ न कुरुते श्रेय़ः कुशलोऽस्मीति यः पुमान् |
१८ क
भीष्म उवाच:
स संशय़मवाप्नोति यथा सम्प्रतिपत्तिमान् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
अनागतविधानं तु यो नरः कुरुते क्षमम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
श्रेय़ः प्राप्नोति सोऽत्यर्थं दीर्घदर्शी यथा ह्यसौ ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
कलाः काष्ठा मुहूर्ताश्च दिना नाड्यः क्षणा लवाः |
२० क
भीष्म उवाच:
पक्षा मासाश्च ऋतवस्तुल्याः संवत्सराणि च ||
२० ख
भीष्म उवाच:
पृथिवी देश इत्युक्तः कालः स च न दृश्यते |
२१ क
भीष्म उवाच:
अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं न्याय़तो यच्च तत्तथा ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
एतौ धर्मार्थशास्त्रेषु मोक्षशास्त्रेषु चर्षिभिः |
२२ क
भीष्म उवाच:
प्रधानाविति निर्दिष्टौ कामेशाभिमतौ नृणाम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
परीक्ष्यकारी युक्तस्तु सम्यक्समुपपादय़ेत् |
२३ क
भीष्म उवाच:
देशकालावभिप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुय़ात् ||
२३ ख