भीष्म उवाच:
किं नु तत्कारणं मन्ये येनाहं भवतः प्रिय़ः |
१५० क
भीष्म उवाच:
अन्यत्राभ्यवहारार्थात्तत्रापि च वुधा वय़म् ||
१५० ख
भीष्म उवाच:
कालो हेतुं विकुरुते स्वार्थस्तमनुवर्तते |
१५१ क
भीष्म उवाच:
स्वार्थं प्राज्ञोऽभिजानाति प्राज्ञं लोकोऽनुवर्तते ||
१५१ ख
भीष्म उवाच:
न त्वीदृशं त्वय़ा वाच्यं विदुषि स्वार्थपण्डिते |
१५२ क
भीष्म उवाच:
अकालेऽविषमस्थस्य स्वार्थहेतुरय़ं तव ||
१५२ ख
भीष्म उवाच:
तस्मान्नाहं चले स्वार्थात्सुस्थितः सन्धिविग्रहे |
१५३ क
भीष्म उवाच:
अभ्राणामिव रूपाणि विकुर्वन्ति क्षणे क्षणे ||
१५३ ख
भीष्म उवाच:
अद्यैव हि रिपुर्भूत्वा पुनरद्यैव सौहृदम् |
१५४ क
भीष्म उवाच:
पुनश्च रिपुरद्यैव युक्तीनां पश्य चापलम् ||
१५४ ख
भीष्म उवाच:
आसीत्तावत्तु मैत्री नौ यावद्धेतुरभूत्पुरा |
१५५ क
भीष्म उवाच:
सा गता सह तेनैव कालय़ुक्तेन हेतुना ||
१५५ ख
भीष्म उवाच:
त्वं हि मेऽत्यन्ततः शत्रुः सामर्थ्यान्मित्रतां गतः |
१५६ क
भीष्म उवाच:
तत्कृत्यमभिनिर्वृत्तं प्रकृतिः शत्रुतां गता ||
१५६ ख
भीष्म उवाच:
सोऽहमेवं प्रणीतानि ज्ञात्वा शास्त्राणि तत्त्वतः |
१५७ क
भीष्म उवाच:
प्रविशेय़ं कथं पाशं त्वत्कृतं तद्वदस्व मे ||
१५७ ख
भीष्म उवाच:
त्वद्वीर्येण विमुक्तोऽहं मद्वीर्येण तथा भवान् |
१५८ क
भीष्म उवाच:
अन्योन्यानुग्रहे वृत्ते नास्ति भूय़ः समागमः ||
१५८ ख
भीष्म उवाच:
त्वं हि सौम्य कृतार्थोऽद्य निर्वृत्तार्थास्तथा वय़म् |
१५९ क
भीष्म उवाच:
न तेऽस्त्यन्यन्मय़ा कृत्यं किञ्चिदन्यत्र भक्षणात् ||
१५९ ख
भीष्म उवाच:
अहमन्नं भवान्भोक्ता दुर्वलोऽहं भवान्वली |
१६० क
भीष्म उवाच:
नावय़ोर्विद्यते सन्धिर्निय़ुक्ते विषमे वले ||
१६० ख
भीष्म उवाच:
संमन्येऽहं तव प्रज्ञां यन्मोक्षात्प्रत्यनन्तरम् |
१६१ क
भीष्म उवाच:
भक्ष्यं मृगय़से नूनं सुखोपाय़मसंशय़म् ||
१६१ ख
भीष्म उवाच:
भक्ष्यार्थमेव वद्धस्त्वं स मुक्तः प्रसृतः क्षुधा |
१६२ क
भीष्म उवाच:
शास्त्रज्ञमभिसन्धाय़ नूनं भक्षय़िताद्य माम् ||
१६२ ख
भीष्म उवाच:
जानामि क्षुधितं हि त्वामाहारसमय़श्च ते |
१६३ क
भीष्म उवाच:
स त्वं मामभिसन्धाय़ भक्ष्यं मृगय़से पुनः ||
१६३ ख
भीष्म उवाच:
यच्चापि पुत्रदारं स्वं तत्संनिसृजसे मय़ि |
१६४ क
भीष्म उवाच:
शुश्रूषां नाम मे कर्तुं सखे मम न तत्क्षमम् ||
१६४ ख
भीष्म उवाच:
त्वय़ा मां सहितं दृष्ट्वा प्रिय़ा भार्या सुताश्च ये |
१६५ क
भीष्म उवाच:
कस्मान्मां ते न खादेय़ुर्हृष्टाः प्रणय़िनस्त्वय़ि ||
१६५ ख
भीष्म उवाच:
नाहं त्वय़ा समेष्यामि वृत्तो हेतुः समागमे |
१६६ क
भीष्म उवाच:
शिवं ध्याय़स्व मेऽत्रस्थः सुकृतं स्मर्यते यदि ||
१६६ ख
भीष्म उवाच:
शत्रोरन्नाद्यभूतः सन्क्लिष्टस्य क्षुधितस्य च |
१६७ क
भीष्म उवाच:
भक्ष्यं मृगय़माणस्य कः प्राज्ञो विषय़ं व्रजेत् ||
१६७ ख
भीष्म उवाच:
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि दूरादपि तवोद्विजे |
१६८ क
भीष्म उवाच:
नाहं त्वय़ा समेष्यामि निर्वृतो भव लोमश ||
१६८ ख
भीष्म उवाच:
वलवत्संनिकर्षो हि न कदाचित्प्रशस्यते |
१६९ क
भीष्म उवाच:
प्रशान्तादपि मे प्राज्ञ भेतव्यं वलिनः सदा ||
१६९ ख
भीष्म उवाच:
यदि त्वर्थेन मे कार्यं व्रूहि किं करवाणि ते |
१७० क
भीष्म उवाच:
कामं सर्वं प्रदास्यामि न त्वात्मानं कदाचन ||
१७० ख
भीष्म उवाच:
आत्मार्थे सन्ततिस्त्याज्या राज्यं रत्नं धनं तथा |
१७१ क
भीष्म उवाच:
अपि सर्वस्वमुत्सृज्य रक्षेदात्मानमात्मना ||
१७१ ख
भीष्म उवाच:
ऐश्वर्यधनरत्नानां प्रत्यमित्रेऽपि तिष्ठताम् |
१७२ क
भीष्म उवाच:
दृष्टा हि पुनरावृत्तिर्जीवतामिति नः श्रुतम् ||
१७२ ख
भीष्म उवाच:
न त्वात्मनः सम्प्रदानं धनरत्नवदिष्यते |
१७३ क
भीष्म उवाच:
आत्मा तु सर्वतो रक्ष्यो दारैरपि धनैरपि ||
१७३ ख
भीष्म उवाच:
आत्मरक्षिततन्त्राणां सुपरीक्षितकारिणाम् |
१७४ क
भीष्म उवाच:
आपदो नोपपद्यन्ते पुरुषाणां स्वदोषजाः ||
१७४ ख
भीष्म उवाच:
शत्रून्सम्यग्विजानन्ति दुर्वला ये वलीय़सः |
१७५ क
भीष्म उवाच:
तेषां न चाल्यते वुद्धिरात्मार्थं कृतनिश्चय़ा ||
१७५ ख
भीष्म उवाच:
इत्यभिव्यक्तमेवासौ पलितेनावभर्त्सितः |
१७६ क
भीष्म उवाच:
मार्जारो व्रीडितो भूत्वा मूषकं वाक्यमव्रवीत् ||
१७६ ख
भीष्म उवाच:
संमन्येऽहं तव प्रज्ञां यस्त्वं मम हिते रतः |
१७७ क
भीष्म उवाच:
उक्तवानर्थतत्त्वेन मय़ा सम्भिन्नदर्शनः ||
१७७ ख
भीष्म उवाच:
न तु मामन्यथा साधो त्वं विज्ञातुमिहार्हसि |
१७८ क
भीष्म उवाच:
प्राणप्रदानजं त्वत्तो मम सौहृदमागतम् ||
१७८ ख
भीष्म उवाच:
धर्मज्ञोऽस्मि गुणज्ञोऽस्मि कृतज्ञोऽस्मि विशेषतः |
१७९ क
भीष्म उवाच:
मित्रेषु वत्सलश्चास्मि त्वद्विधेषु विशेषतः ||
१७९ ख
भीष्म उवाच:
तन्मामेवङ्गते साधो न यावय़ितुमर्हसि |
१८० क
भीष्म उवाच:
त्वय़ा हि याव्यमानोऽहं प्राणाञ्जह्यां सवान्धवः ||
१८० ख
भीष्म उवाच:
धिक्षव्दो हि वुधैर्दृष्टो मद्विधेषु मनस्विषु |
१८१ क
भीष्म उवाच:
मरणं धर्मतत्त्वज्ञ न मां शङ्कितुमर्हसि ||
१८१ ख
भीष्म उवाच:
इति संस्तूय़मानो हि मार्जारेण स मूषकः |
१८२ क
भीष्म उवाच:
मनसा भावगम्भीरं मार्जारं वाक्यमव्रवीत् ||
१८२ ख
भीष्म उवाच:
साधुर्भवाञ्श्रुतार्थोऽस्मि प्रीय़ते न च विश्वसे |
१८३ क
भीष्म उवाच:
संस्तवैर्वा धनौघैर्वा नाहं शक्यः पुनस्त्वय़ा ||
१८३ ख
भीष्म उवाच:
न ह्यमित्रवशं यान्ति प्राज्ञा निष्कारणं सखे |
१८४ क
भीष्म उवाच:
अस्मिन्नर्थे च गाथे द्वे निवोधोशनसा कृते ||
१८४ ख
भीष्म उवाच:
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा सन्धिं वलीय़सा |
१८५ क
भीष्म उवाच:
समाहितश्चरेद्युक्त्या कृतार्थश्च न विश्वसेत् ||
१८५ ख
भीष्म उवाच:
तस्मात्सर्वास्ववस्थासु रक्षेज्जीवितमात्मनः |
१८६ क
भीष्म उवाच:
द्रव्याणि सन्ततिश्चैव सर्वं भवति जीवतः ||
१८६ ख
भीष्म उवाच:
सङ्क्षेपो नीतिशास्त्राणामविश्वासः परो मतः |
१८७ क
भीष्म उवाच:
नृषु तस्मादविश्वासः पुष्कलं हितमात्मनः ||
१८७ ख
भीष्म उवाच:
वध्यन्ते न ह्यविश्वस्ताः शत्रुभिर्दुर्वला अपि |
१८८ क
भीष्म उवाच:
विश्वस्तास्त्वाशु वध्यन्ते वलवन्तोऽपि दुर्वलैः ||
१८८ ख
भीष्म उवाच:
त्वद्विधेभ्यो मय़ा ह्यात्मा रक्ष्यो मार्जार सर्वदा |
१८९ क
भीष्म उवाच:
रक्ष त्वमपि चात्मानं चण्डालाज्जातिकिल्विषात् ||
१८९ ख
भीष्म उवाच:
स तस्य व्रुवतस्त्वेवं सन्त्रासाज्जातसाध्वसः |
१९० क
भीष्म उवाच:
स्वविलं हि जवेनाशु मार्जारः प्रय़यौ ततः ||
१९० ख
भीष्म उवाच:
ततः शास्त्रार्थतत्त्वज्ञो वुद्धिसामर्थ्यमात्मनः |
१९१ क
भीष्म उवाच:
विश्राव्य पलितः प्राज्ञो विलमन्यज्जगाम ह ||
१९१ ख
भीष्म उवाच:
एवं प्रज्ञावता वुद्ध्या दुर्वलेन महावलाः |
१९२ क
भीष्म उवाच:
एकेन वहवोऽमित्राः पलितेनाभिसन्धिताः ||
१९२ ख
भीष्म उवाच:
अरिणापि समर्थेन सन्धिं कुर्वीत पण्डितः |
१९३ क
भीष्म उवाच:
मूषकश्च विडालश्च मुक्तावन्योन्यसंश्रय़ात् ||
१९३ ख
भीष्म उवाच:
इत्येष क्षत्रधर्मस्य मय़ा मार्गोऽनुदर्शितः |
१९४ क
भीष्म उवाच:
विस्तरेण महीपाल सङ्क्षेपेण पुनः शृणु ||
१९४ ख
भीष्म उवाच:
अन्योन्यकृतवैरौ तु चक्रतुः प्रीतिमुत्तमाम् |
१९५ क
भीष्म उवाच:
अन्योन्यमभिसन्धातुमभूच्चैव तय़ोर्मतिः ||
१९५ ख
भीष्म उवाच:
तत्र प्राज्ञोऽभिसन्धत्ते सम्यग्वुद्धिवलाश्रय़ात् |
१९६ क
भीष्म उवाच:
अभिसन्धीय़ते प्राज्ञः प्रमादादपि चावुधैः ||
१९६ ख
भीष्म उवाच:
तस्मादभीतवद्भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् |
१९७ क
भीष्म उवाच:
न ह्यप्रमत्तश्चलति चलितो वा विनश्यति ||
१९७ ख
भीष्म उवाच:
कालेन रिपुणा सन्धिः काले मित्रेण विग्रहः |
१९८ क
भीष्म उवाच:
कार्य इत्येव तत्त्वज्ञाः प्राहुर्नित्यं युधिष्ठिर ||
१९८ ख
भीष्म उवाच:
एवं मत्वा महाराज शास्त्रार्थमभिगम्य च |
१९९ क
भीष्म उवाच:
अभिय़ुक्तोऽप्रमत्तश्च प्राग्भय़ाद्भीतवच्चरेत् ||
१९९ ख