chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १३६
भीष्म उवाच:
भीतवत्संविधिः कार्यः प्रतिसन्धिस्तथैव च |
२०० क
भीष्म उवाच:
भय़ादुत्पद्यते वुद्धिरप्रमत्ताभिय़ोगजा ||
२०० ख
भीष्म उवाच:
न भय़ं विद्यते राजन्भीतस्यानागते भय़े |
२०१ क
भीष्म उवाच:
अभीतस्य तु विस्रम्भात्सुमहज्जाय़ते भय़म् ||
२०१ ख
भीष्म उवाच:
न भीरुरिति चात्यन्तं मन्त्रोऽदेय़ः कथञ्चन |
२०२ क
भीष्म उवाच:
अविज्ञानाद्धि विज्ञाते गच्छेदास्पददर्शिषु ||
२०२ ख
भीष्म उवाच:
तस्मादभीतवद्भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् |
२०३ क
भीष्म उवाच:
कार्याणां गुरुतां वुद्ध्वा नानृतं किञ्चिदाचरेत् ||
२०३ ख
भीष्म उवाच:
एवमेतन्मय़ा प्रोक्तमितिहासं युधिष्ठिर |
२०४ क
भीष्म उवाच:
श्रुत्वा त्वं सुहृदां मध्ये यथावत्समुपाचर ||
२०४ ख
भीष्म उवाच:
उपलभ्य मतिं चाग्र्यामरिमित्रान्तरं तथा |
२०५ क
भीष्म उवाच:
सन्धिविग्रहकालं च मोक्षोपाय़ं तथापदि ||
२०५ ख
भीष्म उवाच:
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा सन्धिं वलीय़सा |
२०६ क
भीष्म उवाच:
समागमं चरेद्युक्त्या कृतार्थो न च विश्वसेत् ||
२०६ ख
भीष्म उवाच:
अविरुद्धां त्रिवर्गेण नीतिमेतां युधिष्ठिर |
२०७ क
भीष्म उवाच:
अभ्युत्तिष्ठ श्रुतादस्माद्भूय़स्त्वं रञ्जय़न्प्रजाः ||
२०७ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणैश्चापि ते सार्धं यात्रा भवतु पाण्डव |
२०८ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणा हि परं श्रेय़ो दिवि चेह च भारत ||
२०८ ख
भीष्म उवाच:
एते धर्मस्य वेत्तारः कृतज्ञाः सततं प्रभो |
२०९ क
भीष्म उवाच:
पूजिताः शुभकर्माणः पूर्वजित्या नराधिप ||
२०९ ख
भीष्म उवाच:
राज्यं श्रेय़ः परं राजन्यशः कीर्तिं च लप्स्यसे |
२१० क
भीष्म उवाच:
कुलस्य सन्ततिं चैव यथान्याय़ं यथाक्रमम् ||
२१० ख
भीष्म उवाच:
द्वय़ोरिमं भारत सन्धिविग्रहं; सुभाषितं वुद्धिविशेषकारितम् |
२११ क
भीष्म उवाच:
तथान्ववेक्ष्य क्षितिपेन सर्वदा; निषेवितव्यं नृप शत्रुमण्डले ||
२११ ख