chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच:
एवमुक्तस्तु विमनास्तिर्यग्दृष्टिरधोमुखः |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
संहत्य च भ्रुवोर्मध्यं न किञ्चिद्व्याजहार ह ||
१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तं वै विमनसं दृष्ट्वा सम्प्रेक्ष्यान्योन्यमन्तिकात् |
२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
पुनरेवोत्तरं वाक्यमुक्तवन्तौ नरर्षभौ ||
२ ख
भीष्म उवाच:
शुश्रूषुमनसूय़ं च व्रह्मण्यं सत्यसङ्गरम् |
३ क
भीष्म उवाच:
प्रतिय़ोत्स्यामहे पार्थमतो दुःखतरं नु किम् ||
३ ख
द्रोण उवाच:
अश्वत्थाम्नि यथा पुत्रे भूय़ो मम धनञ्जय़े |
४ क
द्रोण उवाच:
वहुमानः परो राजन्संनतिश्च कपिध्वजे ||
४ ख
द्रोण उवाच:
तं चेत्पुत्रात्प्रिय़तरं प्रतिय़ोत्स्ये धनञ्जय़म् |
५ क
द्रोण उवाच:
क्षत्रधर्ममनुष्ठाय़ धिगस्तु क्षत्रजीविकाम् ||
५ ख
द्रोण उवाच:
यस्य लोके समो नास्ति कश्चिदन्यो धनुर्धरः |
६ क
द्रोण उवाच:
मत्प्रसादात्स वीभत्सुः श्रेय़ानन्यैर्धनुर्धरैः ||
६ ख
द्रोण उवाच:
मित्रध्रुग्दुष्टभावश्च नास्तिकोऽथानृजुः शठः |
७ क
द्रोण उवाच:
न सत्सु लभते पूजां यज्ञे मूर्ख इवागतः ||
७ ख
द्रोण उवाच:
वार्यमाणोऽपि पापेभ्यः पापात्मा पापमिच्छति |
८ क
द्रोण उवाच:
चोद्यमानोऽपि पापेन शुभात्मा शुभमिच्छति ||
८ ख
द्रोण उवाच:
मिथ्योपचरिता ह्येते वर्तमाना ह्यनु प्रिय़े |
९ क
द्रोण उवाच:
अहितत्वाय़ कल्पन्ते दोषा भरतसत्तम ||
९ ख
द्रोण उवाच:
त्वमुक्तः कुरुवृद्धेन मय़ा च विदुरेण च |
१० क
द्रोण उवाच:
वासुदेवेन च तथा श्रेय़ो नैवाभिपद्यसे ||
१० ख
द्रोण उवाच:
अस्ति मे वलमित्येव सहसा त्वं तितीर्षसि |
११ क
द्रोण उवाच:
सग्राहनक्रमकरं गङ्गावेगमिवोष्णगे ||
११ ख
द्रोण उवाच:
वास एव यथा हि त्वं प्रावृण्वानोऽद्य मन्यसे |
१२ क
द्रोण उवाच:
स्रजं त्यक्तामिव प्राप्य लोभाद्यौधिष्ठिरीं श्रिय़म् ||
१२ ख
द्रोण उवाच:
द्रौपदीसहितं पार्थं साय़ुधैर्भ्रातृभिर्वृतम् |
१३ क
द्रोण उवाच:
वनस्थमपि राज्यस्थः पाण्डवं कोऽतिजीवति ||
१३ ख
द्रोण उवाच:
निदेशे यस्य राजानः सर्वे तिष्ठन्ति किङ्कराः |
१४ क
द्रोण उवाच:
तमैलविलमासाद्य धर्मराजो व्यराजत ||
१४ ख
द्रोण उवाच:
कुवेरसदनं प्राप्य ततो रत्नान्यवाप्य च |
१५ क
द्रोण उवाच:
स्फीतमाक्रम्य ते राष्ट्रं राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः ||
१५ ख
द्रोण उवाच:
दत्तं हुतमधीतं च व्राह्मणास्तर्पिता धनैः |
१६ क
द्रोण उवाच:
आवय़ोर्गतमाय़ुश्च कृतकृत्यौ च विद्धि नौ ||
१६ ख
द्रोण उवाच:
त्वं तु हित्वा सुखं राज्यं मित्राणि च धनानि च |
१७ क
द्रोण उवाच:
विग्रहं पाण्डवैः कृत्वा महद्व्यसनमाप्स्यसि ||
१७ ख
द्रोण उवाच:
द्रौपदी यस्य चाशास्ते विजय़ं सत्यवादिनी |
१८ क
द्रोण उवाच:
तपोघोरव्रता देवी न त्वं जेष्यसि पाण्डवम् ||
१८ ख
द्रोण उवाच:
मन्त्री जनार्दनो यस्य भ्राता यस्य धनञ्जय़ः |
१९ क
द्रोण उवाच:
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं कथं जेष्यसि पाण्डवम् ||
१९ ख
द्रोण उवाच:
सहाय़ा व्राह्मणा यस्य धृतिमन्तो जितेन्द्रिय़ाः |
२० क
द्रोण उवाच:
तमुग्रतपसं वीरं कथं जेष्यसि पाण्डवम् ||
२० ख
द्रोण उवाच:
पुनरुक्तं च वक्ष्यामि यत्कार्यं भूतिमिच्छता |
२१ क
द्रोण उवाच:
सुहृदा मज्जमानेषु सुहृत्सु व्यसनार्णवे ||
२१ ख
द्रोण उवाच:
अलं युद्धेन तैर्वीरैः शाम्य त्वं कुरुवृद्धय़े |
२२ क
द्रोण उवाच:
मा गमः ससुतामात्यः सवलश्च पराभवम् ||
२२ ख