कर्ण उवाच:
हतेश्वरा हतसुता हतनाथाश्च केशव ||
५० ख
कर्ण उवाच:
गान्धार्या सह रोदन्त्यः श्वगृध्रकुरराकुले |
५१ क
कर्ण उवाच:
स यज्ञेऽस्मिन्नवभृथो भविष्यति जनार्दन ||
५१ ख
कर्ण उवाच:
विद्यावृद्धा वय़ोवृद्धाः क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभ |
५२ क
कर्ण उवाच:
वृथामृत्युं न कुर्वीरंस्त्वत्कृते मधुसूदन ||
५२ ख
कर्ण उवाच:
शस्त्रेण निधनं गच्छेत्समृद्धं क्षत्रमण्डलम् |
५३ क
कर्ण उवाच:
कुरुक्षेत्रे पुण्यतमे त्रैलोक्यस्यापि केशव ||
५३ ख
कर्ण उवाच:
तदत्र पुण्डरीकाक्ष विधत्स्व यदभीप्सितम् |
५४ क
कर्ण उवाच:
यथा कार्त्स्न्येन वार्ष्णेय़ क्षत्रं स्वर्गमवाप्नुय़ात् ||
५४ ख
कर्ण उवाच:
यावत्स्थास्यन्ति गिरय़ः सरितश्च जनार्दन |
५५ क
कर्ण उवाच:
तावत्कीर्तिभवः शव्दः शाश्वतोऽय़ं भविष्यति ||
५५ ख
कर्ण उवाच:
व्राह्मणाः कथय़िष्यन्ति महाभारतमाहवम् |
५६ क
कर्ण उवाच:
समागमेषु वार्ष्णेय़ क्षत्रिय़ाणां यशोधरम् ||
५६ ख
कर्ण उवाच:
समुपानय़ कौन्तेय़ं युद्धाय़ मम केशव |
५७ क
कर्ण उवाच:
मन्त्रसंवरणं कुर्वन्नित्यमेव परन्तप ||
५७ ख