chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १३९
युधिष्ठिर उवाच:
हीने परमके धर्मे सर्वलोकातिलङ्घिनि |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
अधर्मे धर्मतां नीते धर्मे चाधर्मतां गते ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
मर्यादासु प्रभिन्नासु क्षुभिते धर्मनिश्चय़े |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
राजभिः पीडिते लोके चोरैर्वापि विशां पते ||
२ ख
युधिष्ठिर उवाच:
सर्वाश्रमेषु मूढेषु कर्मसूपहतेषु च |
३ क
युधिष्ठिर उवाच:
कामान्मोहाच्च लोभाच्च भय़ं पश्यत्सु भारत ||
३ ख
युधिष्ठिर उवाच:
अविश्वस्तेषु सर्वेषु नित्यभीतेषु पार्थिव |
४ क
युधिष्ठिर उवाच:
निकृत्या हन्यमानेषु वञ्चय़त्सु परस्परम् ||
४ ख
युधिष्ठिर उवाच:
सम्प्रदीप्तेषु देशेषु व्राह्मण्ये चाभिपीडिते |
५ क
युधिष्ठिर उवाच:
अवर्षति च पर्जन्ये मिथो भेदे समुत्थिते ||
५ ख
युधिष्ठिर उवाच:
सर्वस्मिन्दस्युसाद्भूते पृथिव्यामुपजीवने |
६ क
युधिष्ठिर उवाच:
केन स्विद्व्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते ||
६ ख
युधिष्ठिर उवाच:
अतित्यक्षुः पुत्रपौत्राननुक्रोशान्नराधिप |
७ क
युधिष्ठिर उवाच:
कथमापत्सु वर्तेत तन्मे व्रूहि पितामह ||
७ ख
युधिष्ठिर उवाच:
कथं च राजा वर्तेत लोके कलुषतां गते |
८ क
युधिष्ठिर उवाच:
कथमर्थाच्च धर्माच्च न हीय़ेत परन्तप ||
८ ख
भीष्म उवाच:
राजमूला महाराज योगक्षेमसुवृष्टय़ः |
९ क
भीष्म उवाच:
प्रजासु व्याधय़श्चैव मरणं च भय़ानि च ||
९ ख
भीष्म उवाच:
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्च भरतर्षभ |
१० क
भीष्म उवाच:
राजमूलानि सर्वाणि मम नास्त्यत्र संशय़ः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
तस्मिंस्त्वभ्यागते काले प्रजानां दोषकारके |
११ क
भीष्म उवाच:
विज्ञानवलमास्थाय़ जीवितव्यं तदा भवेत् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
विश्वामित्रस्य संवादं चण्डालस्य च पक्कणे ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
त्रेताद्वापरय़ोः सन्धौ पुरा दैवविधिक्रमात् |
१३ क
भीष्म उवाच:
अनावृष्टिरभूद्घोरा राजन्द्वादशवार्षिकी ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
प्रजानामभिवृद्धानां युगान्ते पर्युपस्थिते |
१४ क
भीष्म उवाच:
त्रेतानिर्मोक्षसमय़े द्वापरप्रतिपादने ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
न ववर्ष सहस्राक्षः प्रतिलोमोऽभवद्गुरुः |
१५ क
भीष्म उवाच:
जगाम दक्षिणं मार्गं सोमो व्यावृत्तलक्षणः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
नावश्याय़ोऽपि रात्र्यन्ते कुत एवाभ्रराजय़ः |
१६ क
भीष्म उवाच:
नद्यः सङ्क्षिप्ततोय़ौघाः क्वचिदन्तर्गताभवन् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
सरांसि सरितश्चैव कूपाः प्रस्रवणानि च |
१७ क
भीष्म उवाच:
हतत्विट्कान्यलक्ष्यन्त निसर्गाद्दैवकारितात् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
उपशुष्कजलस्थाय़ा विनिवृत्तसभाप्रपा |
१८ क
भीष्म उवाच:
निवृत्तय़ज्ञस्वाध्याय़ा निर्वषट्कारमङ्गला ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
उत्सन्नकृषिगोरक्ष्या निवृत्तविपणापणा |
१९ क
भीष्म उवाच:
निवृत्तपूगसमय़ा सम्प्रनष्टमहोत्सवा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
अस्थिकङ्कालसङ्कीर्णा हाहाभूतजनाकुला |
२० क
भीष्म उवाच:
शून्यभूय़िष्ठनगरा दग्धग्रामनिवेशना ||
२० ख
भीष्म उवाच:
क्वचिच्चोरैः क्वचिच्छस्त्रैः क्वचिद्राजभिरातुरैः |
२१ क
भीष्म उवाच:
परस्परभय़ाच्चैव शून्यभूय़िष्ठनिर्जना ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
गतदैवतसङ्कल्पा वृद्धवालविनाकृता |
२२ क
भीष्म उवाच:
गोजाविमहिषैर्हीना परस्परहराहरा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
हतविप्रा हतारक्षा प्रनष्टौषधिसञ्चय़ा |
२३ क
भीष्म उवाच:
श्यावभूतनरप्राय़ा वभूव वसुधा तदा ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
तस्मिन्प्रतिभय़े काले क्षीणे धर्मे युधिष्ठिर |
२४ क
भीष्म उवाच:
वभ्रमुः क्षुधिता मर्त्याः खादन्तः स्म परस्परम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
ऋषय़ो निय़मांस्त्यक्त्वा परित्यक्ताग्निदैवताः |
२५ क
भीष्म उवाच:
आश्रमान्सम्परित्यज्य पर्यधावन्नितस्ततः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
विश्वामित्रोऽथ भगवान्महर्षिरनिकेतनः |
२६ क
भीष्म उवाच:
क्षुधा परिगतो धीमान्समन्तात्पर्यधावत ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
स कदाचित्परिपतञ्श्वपचानां निवेशनम् |
२७ क
भीष्म उवाच:
हिंस्राणां प्राणिहन्तॄणामाससाद वने क्वचित् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
विभिन्नकलशाकीर्णं श्वचर्माच्छादनाय़ुतम् |
२८ क
भीष्म उवाच:
वराहखरभग्नास्थिकपालघटसङ्कुलम् ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
मृतचेलपरिस्तीर्णं निर्माल्यकृतभूषणम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
सर्पनिर्मोकमालाभिः कृतचिह्नकुटीमठम् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
उलूकपक्षध्वजिभिर्देवताय़तनैर्वृतम् |
३० क
भीष्म उवाच:
लोहघण्टापरिष्कारं श्वय़ूथपरिवारितम् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
तत्प्रविश्य क्षुधाविष्टो गाधेः पुत्रो महानृषिः |
३१ क
भीष्म उवाच:
आहारान्वेषणे युक्तः परं यत्नं समास्थितः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
न च क्वचिदविन्दत्स भिक्षमाणोऽपि कौशिकः |
३२ क
भीष्म उवाच:
मांसमन्नं मूलफलमन्यद्वा तत्र किञ्चन ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
अहो कृच्छ्रं मय़ा प्राप्तमिति निश्चित्य कौशिकः |
३३ क
भीष्म उवाच:
पपात भूमौ दौर्वल्यात्तस्मिंश्चण्डालपक्कणे ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
चिन्तय़ामास स मुनिः किं नु मे सुकृतं भवेत् |
३४ क
भीष्म उवाच:
कथं वृथा न मृत्युः स्यादिति पार्थिवसत्तम ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
स ददर्श श्वमांसस्य कुतन्तीं विततां मुनिः |
३५ क
भीष्म उवाच:
चण्डालस्य गृहे राजन्सद्यः शस्त्रहतस्य च ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
स चिन्तय़ामास तदा स्तेय़ं कार्यमितो मय़ा |
३६ क
भीष्म उवाच:
न हीदानीमुपाय़ोऽन्यो विद्यते प्राणधारणे ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
आपत्सु विहितं स्तेय़ं विशिष्टसमहीनतः |
३७ क
भीष्म उवाच:
परं परं भवेत्पूर्वमस्तेय़मिति निश्चय़ः ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
हीनादादेय़मादौ स्यात्समानात्तदनन्तरम् |
३८ क
भीष्म उवाच:
असम्भवादाददीत विशिष्टादपि धार्मिकात् ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
सोऽहमन्तावसानानां हरमाणः परिग्रहात् |
३९ क
भीष्म उवाच:
न स्तेय़दोषं पश्यामि हरिष्याम्येतदामिषम् ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
एतां वुद्धिं समास्थाय़ विश्वामित्रो महामुनिः |
४० क
भीष्म उवाच:
तस्मिन्देशे प्रसुष्वाप पतितो यत्र भारत ||
४० ख
भीष्म उवाच:
स विगाढां निशां दृष्ट्वा सुप्ते चण्डालपक्कणे |
४१ क
भीष्म उवाच:
शनैरुत्थाय़ भगवान्प्रविवेश कुटीमठम् ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
स सुप्त एव चण्डालः श्लेष्मापिहितलोचनः |
४२ क
भीष्म उवाच:
परिभिन्नस्वरो रूक्ष उवाचाप्रिय़दर्शनः ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
कः कुतन्तीं घट्टय़ति सुप्ते चण्डालपक्कणे |
४३ क
भीष्म उवाच:
जागर्मि नावसुप्तोऽस्मि हतोऽसीति च दारुणः ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
विश्वामित्रोऽहमित्येव सहसा तमुवाच सः |
४४ क
भीष्म उवाच:
सहसाभ्यागतभय़ः सोद्वेगस्तेन कर्मणा ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
चण्डालस्तद्वचः श्रुत्वा महर्षेर्भावितात्मनः |
४५ क
भीष्म उवाच:
शय़नादुपसम्भ्रान्त इय़ेषोत्पतितुं ततः ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
स विसृज्याश्रु नेत्राभ्यां वहुमानात्कृताञ्जलिः |
४६ क
भीष्म उवाच:
उवाच कौशिकं रात्रौ व्रह्मन्किं ते चिकीर्षितम् ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
विश्वामित्रस्तु मातङ्गमुवाच परिसान्त्वय़न् |
४७ क
भीष्म उवाच:
क्षुधितोऽहं गतप्राणो हरिष्यामि श्वजाघनीम् ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
अवसीदन्ति मे प्राणाः स्मृतिर्मे नश्यति क्षुधा |
४८ क
भीष्म उवाच:
स्वधर्मं वुध्यमानोऽपि हरिष्यामि श्वजाघनीम् ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
अटन्भैक्षं न विन्दामि यदा युष्माकमालय़े |
४९ क
भीष्म उवाच:
तदा वुद्धिः कृता पापे हरिष्यामि श्वजाघनीम् ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
तृषितः कलुषं पाता नास्ति ह्रीरशनार्थिनः |
५० क
भीष्म उवाच:
क्षुद्धर्मं दूषय़त्यत्र हरिष्यामि श्वजाघनीम् ||
५० ख