कर्ण उवाच:
असंशय़ं सौहृदान्मे प्रणय़ाच्चात्थ केशव |
१ क
कर्ण उवाच:
सख्येन चैव वार्ष्णेय़ श्रेय़स्कामतय़ैव च ||
१ ख
कर्ण उवाच:
सर्वं चैवाभिजानामि पाण्डोः पुत्रोऽस्मि धर्मतः |
२ क
कर्ण उवाच:
निग्रहाद्धर्मशास्त्राणां यथा त्वं कृष्ण मन्यसे ||
२ ख
कर्ण उवाच:
कन्या गर्भं समाधत्त भास्करान्मां जनार्दन |
३ क
कर्ण उवाच:
आदित्यवचनाच्चैव जातं मां सा व्यसर्जय़त् ||
३ ख
कर्ण उवाच:
सोऽस्मि कृष्ण तथा जातः पाण्डोः पुत्रोऽस्मि धर्मतः |
४ क
कर्ण उवाच:
कुन्त्या त्वहमपाकीर्णो यथा न कुशलं तथा ||
४ ख
कर्ण उवाच:
सूतो हि मामधिरथो दृष्ट्वैव अनय़द्गृहान् |
५ क
कर्ण उवाच:
राधाय़ाश्चैव मां प्रादात्सौहार्दान्मधुसूदन ||
५ ख
कर्ण उवाच:
मत्स्नेहाच्चैव राधाय़ाः सद्यः क्षीरमवातरत् |
६ क
कर्ण उवाच:
सा मे मूत्रं पुरीषं च प्रतिजग्राह माधव ||
६ ख
कर्ण उवाच:
तस्याः पिण्डव्यपनय़ं कुर्यादस्मद्विधः कथम् |
७ क
कर्ण उवाच:
धर्मविद्धर्मशास्त्राणां श्रवणे सततं रतः ||
७ ख
कर्ण उवाच:
तथा मामभिजानाति सूतश्चाधिरथः सुतम् |
८ क
कर्ण उवाच:
पितरं चाभिजानामि तमहं सौहृदात्सदा ||
८ ख
कर्ण उवाच:
स हि मे जातकर्मादि कारय़ामास माधव |
९ क
कर्ण उवाच:
शास्त्रदृष्टेन विधिना पुत्रप्रीत्या जनार्दन ||
९ ख
कर्ण उवाच:
नाम मे वसुषेणेति कारय़ामास वै द्विजैः |
१० क
कर्ण उवाच:
भार्याश्चोढा मम प्राप्ते यौवने तेन केशव ||
१० ख
कर्ण उवाच:
तासु पुत्राश्च पौत्राश्च मम जाता जनार्दन |
११ क
कर्ण उवाच:
तासु मे हृदय़ं कृष्ण सञ्जातं कामवन्धनम् ||
११ ख
कर्ण उवाच:
न पृथिव्या सकलय़ा न सुवर्णस्य राशिभिः |
१२ क
कर्ण उवाच:
हर्षाद्भय़ाद्वा गोविन्द अनृतं वक्तुमुत्सहे ||
१२ ख
कर्ण उवाच:
धृतराष्ट्रकुले कृष्ण दुर्योधनसमाश्रय़ात् |
१३ क
कर्ण उवाच:
मय़ा त्रय़ोदश समा भुक्तं राज्यमकण्टकम् ||
१३ ख
कर्ण उवाच:
इष्टं च वहुभिर्यज्ञैः सह सूतैर्मय़ासकृत् |
१४ क
कर्ण उवाच:
आवाहाश्च विवाहाश्च सह सूतैः कृता मय़ा ||
१४ ख
कर्ण उवाच:
मां च कृष्ण समाश्रित्य कृतः शस्त्रसमुद्यमः |
१५ क
कर्ण उवाच:
दुर्योधनेन वार्ष्णेय़ विग्रहश्चापि पाण्डवैः ||
१५ ख
कर्ण उवाच:
तस्माद्रणे द्वैरथे मां प्रत्युद्यातारमच्युत |
१६ क
कर्ण उवाच:
वृतवान्परमं हृष्टः प्रतीपं सव्यसाचिनः ||
१६ ख
कर्ण उवाच:
वधाद्वन्धाद्भय़ाद्वापि लोभाद्वापि जनार्दन |
१७ क
कर्ण उवाच:
अनृतं नोत्सहे कर्तुं धार्तराष्ट्रस्य धीमतः ||
१७ ख
कर्ण उवाच:
यदि ह्यद्य न गच्छेय़ं द्वैरथं सव्यसाचिना |
१८ क
कर्ण उवाच:
अकीर्तिः स्याद्धृषीकेश मम पार्थस्य चोभय़ोः ||
१८ ख
कर्ण उवाच:
असंशय़ं हितार्थाय़ व्रूय़ास्त्वं मधुसूदन |
१९ क
कर्ण उवाच:
सर्वं च पाण्डवाः कुर्युस्त्वद्वशित्वान्न संशय़ः ||
१९ ख
कर्ण उवाच:
मन्त्रस्य निय़मं कुर्यास्त्वमत्र पुरुषोत्तम |
२० क
कर्ण उवाच:
एतदत्र हितं मन्ये सर्वय़ादवनन्दन ||
२० ख
कर्ण उवाच:
यदि जानाति मां राजा धर्मात्मा संशितव्रतः |
२१ क
कर्ण उवाच:
कुन्त्याः प्रथमजं पुत्रं न स राज्यं ग्रहीष्यति ||
२१ ख
कर्ण उवाच:
प्राप्य चापि महद्राज्यं तदहं मधुसूदन |
२२ क
कर्ण उवाच:
स्फीतं दुर्योधनाय़ैव सम्प्रदद्यामरिन्दम ||
२२ ख
कर्ण उवाच:
स एव राजा धर्मात्मा शाश्वतोऽस्तु युधिष्ठिरः |
२३ क
कर्ण उवाच:
नेता यस्य हृषीकेशो योद्धा यस्य धनञ्जय़ः ||
२३ ख
कर्ण उवाच:
पृथिवी तस्य राष्ट्रं च यस्य भीमो महारथः |
२४ क
कर्ण उवाच:
नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेय़ाश्च माधव ||
२४ ख
कर्ण उवाच:
उत्तमौजा युधामन्युः सत्यधर्मा च सोमकिः |
२५ क
कर्ण उवाच:
चैद्यश्च चेकितानश्च शिखण्डी चापराजितः ||
२५ ख
कर्ण उवाच:
इन्द्रगोपकवर्णाश्च केकय़ा भ्रातरस्तथा |
२६ क
कर्ण उवाच:
इन्द्राय़ुधसवर्णश्च कुन्तिभोजो महारथः ||
२६ ख
कर्ण उवाच:
मातुलो भीमसेनस्य सेनजिच्च महारथः |
२७ क
कर्ण उवाच:
शङ्खः पुत्रो विराटस्य निधिस्त्वं च जनार्दन ||
२७ ख
कर्ण उवाच:
महानय़ं कृष्ण कृतः क्षत्रस्य समुदानय़ः |
२८ क
कर्ण उवाच:
राज्यं प्राप्तमिदं दीप्तं प्रथितं सर्वराजसु ||
२८ ख
कर्ण उवाच:
धार्तराष्ट्रस्य वार्ष्णेय़ शस्त्रय़ज्ञो भविष्यति |
२९ क
कर्ण उवाच:
अस्य यज्ञस्य वेत्ता त्वं भविष्यसि जनार्दन |
२९ ख
कर्ण उवाच:
आध्वर्यवं च ते कृष्ण क्रतावस्मिन्भविष्यति ||
२९ ग
कर्ण उवाच:
होता चैवात्र वीभत्सुः संनद्धः स कपिध्वजः |
३० क
कर्ण उवाच:
गाण्डीवं स्रुक्तथाज्यं च वीर्यं पुंसां भविष्यति ||
३० ख
कर्ण उवाच:
ऐन्द्रं पाशुपतं व्राह्मं स्थूणाकर्णं च माधव |
३१ क
कर्ण उवाच:
मन्त्रास्तत्र भविष्यन्ति प्रय़ुक्ताः सव्यसाचिना ||
३१ ख
कर्ण उवाच:
अनुय़ातश्च पितरमधिको वा पराक्रमे |
३२ क
कर्ण उवाच:
ग्रावस्तोत्रं स सौभद्रः सम्यक्तत्र करिष्यति ||
३२ ख
कर्ण उवाच:
उद्गातात्र पुनर्भीमः प्रस्तोता सुमहावलः |
३३ क
कर्ण उवाच:
विनदन्स नरव्याघ्रो नागानीकान्तकृद्रणे ||
३३ ख
कर्ण उवाच:
स चैव तत्र धर्मात्मा शश्वद्राजा युधिष्ठिरः |
३४ क
कर्ण उवाच:
जपैर्होमैश्च संय़ुक्तो व्रह्मत्वं कारय़िष्यति ||
३४ ख
कर्ण उवाच:
शङ्खशव्दाः समुरजा भेर्यश्च मधुसूदन |
३५ क
कर्ण उवाच:
उत्कृष्टसिंहनादाश्च सुव्रह्मण्यो भविष्यति ||
३५ ख
कर्ण उवाच:
नकुलः सहदेवश्च माद्रीपुत्रौ यशस्विनौ |
३६ क
कर्ण उवाच:
शामित्रं तौ महावीर्यौ सम्यक्तत्र करिष्यतः ||
३६ ख
कर्ण उवाच:
कल्माषदण्डा गोविन्द विमला रथशक्तय़ः |
३७ क
कर्ण उवाच:
यूपाः समुपकल्पन्तामस्मिन्यज्ञे जनार्दन ||
३७ ख
कर्ण उवाच:
कर्णिनालीकनाराचा वत्सदन्तोपवृंहणाः |
३८ क
कर्ण उवाच:
तोमराः सोमकलशाः पवित्राणि धनूंषि च ||
३८ ख
कर्ण उवाच:
असय़ोऽत्र कपालानि पुरोडाशाः शिरांसि च |
३९ क
कर्ण उवाच:
हविस्तु रुधिरं कृष्ण अस्मिन्यज्ञे भविष्यति ||
३९ ख
कर्ण उवाच:
इध्माः परिधय़श्चैव शक्त्योऽथ विमला गदाः |
४० क
कर्ण उवाच:
सदस्या द्रोणशिष्याश्च कृपस्य च शरद्वतः ||
४० ख
कर्ण उवाच:
इषवोऽत्र परिस्तोमा मुक्ता गाण्डीवधन्वना |
४१ क
कर्ण उवाच:
महारथप्रय़ुक्ताश्च द्रोणद्रौणिप्रचोदिताः ||
४१ ख
कर्ण उवाच:
प्रातिप्रस्थानिकं कर्म सात्यकिः स करिष्यति |
४२ क
कर्ण उवाच:
दीक्षितो धार्तराष्ट्रोऽत्र पत्नी चास्य महाचमूः ||
४२ ख
कर्ण उवाच:
घटोत्कचोऽत्र शामित्रं करिष्यति महावलः |
४३ क
कर्ण उवाच:
अतिरात्रे महावाहो वितते यज्ञकर्मणि ||
४३ ख
कर्ण उवाच:
दक्षिणा त्वस्य यज्ञस्य धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् |
४४ क
कर्ण उवाच:
वैताने कर्मणि तते जातो यः कृष्ण पावकात् ||
४४ ख
कर्ण उवाच:
यदव्रुवमहं कृष्ण कटुकानि स्म पाण्डवान् |
४५ क
कर्ण उवाच:
प्रिय़ार्थं धार्तराष्ट्रस्य तेन तप्येऽद्य कर्मणा ||
४५ ख
कर्ण उवाच:
यदा द्रक्ष्यसि मां कृष्ण निहतं सव्यसाचिना |
४६ क
कर्ण उवाच:
पुनश्चितिस्तदा चास्य यज्ञस्याथ भविष्यति ||
४६ ख
कर्ण उवाच:
दुःशासनस्य रुधिरं यदा पास्यति पाण्डवः |
४७ क
कर्ण उवाच:
आनर्दं नर्दतः सम्यक्तदा सुत्यं भविष्यति ||
४७ ख
कर्ण उवाच:
यदा द्रोणं च भीष्मं च पाञ्चाल्यौ पातय़िष्यतः |
४८ क
कर्ण उवाच:
तदा यज्ञावसानं तद्भविष्यति जनार्दन ||
४८ ख
कर्ण उवाच:
दुर्योधनं यदा हन्ता भीमसेनो महावलः |
४९ क
कर्ण उवाच:
तदा समाप्स्यते यज्ञो धार्तराष्ट्रस्य माधव ||
४९ ख
कर्ण उवाच:
स्नुषाश्च प्रस्नुषाश्चैव धृतराष्ट्रस्य सङ्गताः |
५० क