chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १४०
युधिष्ठिर उवाच:
यदिदं घोरमुद्दिष्टमश्रद्धेय़मिवानृतम् |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
अस्ति स्विद्दस्युमर्यादा यामहं परिवर्जय़े ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
संमुह्यामि विषीदामि धर्मो मे शिथिलीकृतः |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
उद्यमं नाधिगच्छामि कुतश्चित्परिचिन्तय़न् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
नैतच्छुद्धागमादेव तव धर्मानुशासनम् |
३ क
भीष्म उवाच:
प्रज्ञासमवतारोऽय़ं कविभिः सम्भृतं मधु ||
३ ख
भीष्म उवाच:
वह्व्यः प्रतिविधातव्याः प्रज्ञा राज्ञा ततस्ततः |
४ क
भीष्म उवाच:
नैकशाखेन धर्मेण यात्रैषा सम्प्रवर्तते ||
४ ख
भीष्म उवाच:
वुद्धिसञ्जननं राज्ञां धर्ममाचरतां सदा |
५ क
भीष्म उवाच:
जय़ो भवति कौरव्य तदा तद्विद्धि मे वचः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
वुद्धिश्रेष्ठा हि राजानो जय़न्ति विजय़ैषिणः |
६ क
भीष्म उवाच:
धर्मः प्रतिविधातव्यो वुद्ध्या राज्ञा ततस्ततः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
नैकशाखेन धर्मेण राज्ञां धर्मो विधीय़ते |
७ क
भीष्म उवाच:
दुर्वलस्य कुतः प्रज्ञा पुरस्तादनुदाहृता ||
७ ख
भीष्म उवाच:
अद्वैधज्ञः पथि द्वैधे संशय़ं प्राप्तुमर्हति |
८ क
भीष्म उवाच:
वुद्धिद्वैधं वेदितव्यं पुरस्तादेव भारत ||
८ ख
भीष्म उवाच:
पार्श्वतःकरणं प्रज्ञा विषूची त्वापगा इव |
९ क
भीष्म उवाच:
जनस्तूच्चारितं धर्मं विजानात्यन्यथान्यथा ||
९ ख
भीष्म उवाच:
सम्यग्विज्ञानिनः केचिन्मिथ्याविज्ञानिनोऽपरे |
१० क
भीष्म उवाच:
तद्वै यथातथं वुद्ध्वा ज्ञानमाददते सताम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
परिमुष्णन्ति शास्त्राणि धर्मस्य परिपन्थिनः |
११ क
भीष्म उवाच:
वैषम्यमर्थविद्यानां नैरर्थ्यात्ख्यापय़न्ति ते ||
११ ख
भीष्म उवाच:
आजिजीविषवो विद्यां यशस्कामाः समन्ततः |
१२ क
भीष्म उवाच:
ते सर्वे नरपापिष्ठा धर्मस्य परिपन्थिनः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
अपक्वमतय़ो मन्दा न जानन्ति यथातथम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
सदा ह्यशास्त्रकुशलाः सर्वत्रापरिनिष्ठिताः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
परिमुष्णन्ति शास्त्राणि शास्त्रदोषानुदर्शिनः |
१४ क
भीष्म उवाच:
विज्ञानमथ विद्यानां न सम्यगिति वर्तते ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
निन्दय़ा परविद्यानां स्वां विद्यां ख्यापय़न्ति ये |
१५ क
भीष्म उवाच:
वागस्त्रा वाक्छुरीमत्त्वा दुग्धविद्याफला इव |
१५ ख
भीष्म उवाच:
तान्विद्यावणिजो विद्धि राक्षसानिव भारत ||
१५ ग
भीष्म उवाच:
व्याजेन कृत्स्नो विदितो धर्मस्ते परिहास्यते |
१६ क
भीष्म उवाच:
न धर्मवचनं वाचा न वुद्ध्या चेति नः श्रुतम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
इति वार्हस्पतं ज्ञानं प्रोवाच मघवा स्वय़म् |
१७ क
भीष्म उवाच:
न त्वेव वचनं किञ्चिदनिमित्तादिहोच्यते ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
स्वविनीतेन शास्त्रेण व्यवस्यन्ति तथापरे |
१८ क
भीष्म उवाच:
लोकय़ात्रामिहैके तु धर्ममाहुर्मनीषिणः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
समुद्दिष्टं सतां धर्मं स्वय़मूहेन्न पण्डितः |
१९ क
भीष्म उवाच:
अमर्षाच्छास्त्रसंमोहादविज्ञानाच्च भारत ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
शास्त्रं प्राज्ञस्य वदतः समूहे यात्यदर्शनम् |
२० क
भीष्म उवाच:
आगतागमय़ा वुद्ध्या वचनेन प्रशस्यते ||
२० ख
भीष्म उवाच:
अज्ञानाज्ज्ञानहेतुत्वाद्वचनं साधु मन्यते |
२१ क
भीष्म उवाच:
अनपाहतमेवेदं नेदं शास्त्रमपार्थकम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
दैतेय़ानुशनाः प्राह संशय़च्छेदने पुरा |
२२ क
भीष्म उवाच:
ज्ञानमव्यपदेश्यं हि यथा नास्ति तथैव तत् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
तेन त्वं छिन्नमूलेन कं तोषय़ितुमर्हसि |
२३ क
भीष्म उवाच:
अतथ्यविहितं यो वा नेदं वाक्यमुपाश्नुय़ात् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
उग्राय़ैव हि सृष्टोऽसि कर्मणे न त्ववेक्षसे |
२४ क
भीष्म उवाच:
अङ्गेमामन्ववेक्षस्व राजनीतिं वुभूषितुम् |
२४ ख
भीष्म उवाच:
यय़ा प्रमुच्यते त्वन्यो यदर्थं च प्रमोदते ||
२४ ग
भीष्म उवाच:
अजोऽश्वः क्षत्रमित्येतत्सदृशं व्रह्मणा कृतम् |
२५ क
भीष्म उवाच:
तस्मान्नतीक्ष्णभूतानां यात्रा काचित्प्रसिध्यति ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
यस्त्ववध्यवधे दोषः स वध्यस्यावधे स्मृतः |
२६ क
भीष्म उवाच:
एषैव खलु मर्यादा यामय़ं परिवर्जय़ेत् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
तस्मात्तीक्ष्णः प्रजा राजा स्वधर्मे स्थापय़ेदुत |
२७ क
भीष्म उवाच:
अन्योन्यं भक्षय़न्तो हि प्रचरेय़ुर्वृका इव ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
यस्य दस्युगणा राष्ट्रे ध्वाङ्क्षा मत्स्याञ्जलादिव |
२८ क
भीष्म उवाच:
विहरन्ति परस्वानि स वै क्षत्रिय़पांसनः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
कुलीनान्सचिवान्कृत्वा वेदविद्यासमन्वितान् |
२९ क
भीष्म उवाच:
प्रशाधि पृथिवीं राजन्प्रजा धर्मेण पालय़न् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
विहीनजमकर्माणं यः प्रगृह्णाति भूमिपः |
३० क
भीष्म उवाच:
उभय़स्याविशेषज्ञस्तद्वै क्षत्रं नपुंसकम् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
नैवोग्रं नैव चानुग्रं धर्मेणेह प्रशस्यते |
३१ क
भीष्म उवाच:
उभय़ं न व्यतिक्रामेदुग्रो भूत्वा मृदुर्भव ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
कष्टः क्षत्रिय़धर्मोऽय़ं सौहृदं त्वय़ि यत्स्थितम् |
३२ क
भीष्म उवाच:
उग्रे कर्मणि सृष्टोऽसि तस्माद्राज्यं प्रशाधि वै ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
अशिष्टनिग्रहो नित्यं शिष्टस्य परिपालनम् |
३३ क
भीष्म उवाच:
इति शक्रोऽव्रवीद्धीमानापत्सु भरतर्षभ ||
३३ ख
युधिष्ठिर उवाच:
अस्ति स्विद्दस्युमर्यादा यामन्यो नातिलङ्घय़ेत् |
३४ क
युधिष्ठिर उवाच:
पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे व्रूहि पितामह ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणानेव सेवेत विद्यावृद्धांस्तपस्विनः |
३५ क
भीष्म उवाच:
श्रुतचारित्रवृत्ताढ्यान्पवित्रं ह्येतदुत्तमम् ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
या देवतासु वृत्तिस्ते सास्तु विप्रेषु सर्वदा |
३६ क
भीष्म उवाच:
क्रुद्धैर्हि विप्रैः कर्माणि कृतानि वहुधा नृप ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
तेषां प्रीत्या यशो मुख्यमप्रीत्या तु विपर्ययः |
३७ क
भीष्म उवाच:
प्रीत्या ह्यमृतवद्विप्राः क्रुद्धाश्चैव यथा विषम् ||
३७ ख