chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १४२
भीष्म उवाच:
अथ वृक्षस्य शाखाय़ां विहङ्गः ससुहृज्जनः |
१ क
भीष्म उवाच:
दीर्घकालोषितो राजंस्तत्र चित्रतनूरुहः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
तस्य काल्यं गता भार्या चरितुं नाभ्यवर्तत |
२ क
भीष्म उवाच:
प्राप्तां च रजनीं दृष्ट्वा स पक्षी पर्यतप्यत ||
२ ख
भीष्म उवाच:
वातवर्षं महच्चासीन्न चागच्छति मे प्रिय़ा |
३ क
भीष्म उवाच:
किं नु तत्कारणं येन साद्यापि न निवर्तते ||
३ ख
भीष्म उवाच:
अपि स्वस्ति भवेत्तस्याः प्रिय़ाय़ा मम कानने |
४ क
भीष्म उवाच:
तय़ा विरहितं हीदं शून्यमद्य गृहं मम ||
४ ख
भीष्म उवाच:
यदि सा रक्तनेत्रान्ता चित्राङ्गी मधुरस्वरा |
५ क
भीष्म उवाच:
अद्य नाभ्येति मे कान्ता न कार्यं जीवितेन मे ||
५ ख
भीष्म उवाच:
पतिधर्मरता साध्वी प्राणेभ्योऽपि गरीय़सी |
६ क
भीष्म उवाच:
सा हि श्रान्तं क्षुधार्तं च जानीते मां तपस्विनी ||
६ ख
भीष्म उवाच:
अनुरक्ता हिता चैव स्निग्धा चैव पतिव्रता |
७ क
भीष्म उवाच:
यस्य वै तादृशी भार्या धन्यः स मनुजो भुवि ||
७ ख
भीष्म उवाच:
भार्या हि परमो नाथः पुरुषस्येह पठ्यते |
८ क
भीष्म उवाच:
असहाय़स्य लोकेऽस्मिँल्लोकय़ात्रासहाय़िनी ||
८ ख
भीष्म उवाच:
तथा रोगाभिभूतस्य नित्यं कृच्छ्रगतस्य च |
९ क
भीष्म उवाच:
नास्ति भार्यासमं किञ्चिन्नरस्यार्तस्य भेषजम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
नास्ति भार्यासमो वन्धुर्नास्ति भार्यासमा गतिः |
१० क
भीष्म उवाच:
नास्ति भार्यासमो लोके सहाय़ो धर्मसाधनः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
एवं विलपतस्तस्य द्विजस्यार्तस्य तत्र वै |
११ क
भीष्म उवाच:
गृहीता शकुनघ्नेन भार्या शुश्राव भारतीम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
न सा स्त्रीत्यभिभाषा स्याद्यस्या भर्ता न तुष्यति |
१२ क
भीष्म उवाच:
अग्निसाक्षिकमप्येतद्भर्ता हि शरणं स्त्रिय़ः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
इति सञ्चिन्त्य दुःखार्ता भर्तारं दुःखितं तदा |
१३ क
भीष्म उवाच:
कपोती लुव्धकेनाथ यत्ता वचनमव्रवीत् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
हन्त वक्ष्यामि ते श्रेय़ः श्रुत्वा च कुरु तत्तथा |
१४ क
भीष्म उवाच:
शरणागतसन्त्राता भव कान्त विशेषतः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
एष शाकुनिकः शेते तव वासं समाश्रितः |
१५ क
भीष्म उवाच:
शीतार्तश्च क्षुधार्तश्च पूजामस्मै प्रय़ोजय़ ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
यो हि कश्चिद्द्विजं हन्याद्गां वा लोकस्य मातरम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
शरणागतं च यो हन्यात्तुल्यं तेषां च पातकम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
यास्माकं विहिता वृत्तिः कापोती जातिधर्मतः |
१७ क
भीष्म उवाच:
सा न्याय़्यात्मवता नित्यं त्वद्विधेनाभिवर्तितुम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
यस्तु धर्मं यथाशक्ति गृहस्थो ह्यनुवर्तते |
१८ क
भीष्म उवाच:
स प्रेत्य लभते लोकानक्षय़ानिति शुश्रुम ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
स त्वं सन्तानवानद्य पुत्रवानपि च द्विज |
१९ क
भीष्म उवाच:
तत्स्वदेहे दय़ां त्यक्त्वा धर्मार्थौ परिगृह्य वै |
१९ ख
भीष्म उवाच:
पूजामस्मै प्रय़ुङ्क्ष्व त्वं प्रीय़ेतास्य मनो यथा ||
१९ ग
भीष्म उवाच:
इति सा शकुनी वाक्यं क्षारकस्था तपस्विनी |
२० क
भीष्म उवाच:
अतिदुःखान्विता प्रोच्य भर्तारं समुदैक्षत ||
२० ख
भीष्म उवाच:
स पत्न्या वचनं श्रुत्वा धर्मय़ुक्तिसमन्वितम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
हर्षेण महता युक्तो वाष्पव्याकुललोचनः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
तं वै शाकुनिकं दृष्ट्वा विधिदृष्टेन कर्मणा |
२२ क
भीष्म उवाच:
पूजय़ामास यत्नेन स पक्षी पक्षिजीविनम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
उवाच च स्वागतं ते व्रूहि किं करवाण्यहम् |
२३ क
भीष्म उवाच:
सन्तापश्च न कर्तव्यः स्वगृहे वर्तते भवान् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
तद्व्रवीतु भवान्क्षिप्रं किं करोमि किमिच्छसि |
२४ क
भीष्म उवाच:
प्रणय़ेन व्रवीमि त्वां त्वं हि नः शरणागतः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
शरणागतस्य कर्तव्यमातिथ्यमिह यत्नतः |
२५ क
भीष्म उवाच:
पञ्चय़ज्ञप्रवृत्तेन गृहस्थेन विशेषतः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
पञ्चय़ज्ञांस्तु यो मोहान्न करोति गृहाश्रमी |
२६ क
भीष्म उवाच:
तस्य नाय़ं न च परो लोको भवति धर्मतः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
तद्व्रूहि त्वं सुविस्रव्धो यत्त्वं वाचा वदिष्यसि |
२७ क
भीष्म उवाच:
तत्करिष्याम्यहं सर्वं मा त्वं शोके मनः कृथाः ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शकुनेर्लुव्धकोऽव्रवीत् |
२८ क
भीष्म उवाच:
वाधते खलु मा शीतं हिमत्राणं विधीय़ताम् ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तस्ततः पक्षी पर्णान्यास्तीर्य भूतले |
२९ क
भीष्म उवाच:
यथाशुष्काणि यत्नेन ज्वलनार्थं द्रुतं यय़ौ ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
स गत्वाङ्गारकर्मान्तं गृहीत्वाग्निमथागमत् |
३० क
भीष्म उवाच:
ततः शुष्केषु पर्णेषु पावकं सोऽभ्यदीदिपत् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
सुसन्दीप्तं महत्कृत्वा तमाह शरणागतम् |
३१ क
भीष्म उवाच:
प्रतापय़ सुविस्रव्धं स्वगात्राण्यकुतोभय़ः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा लुव्धो गात्राण्यतापय़त् |
३२ क
भीष्म उवाच:
अग्निप्रत्यागतप्राणस्ततः प्राह विहङ्गमम् ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
दत्तमाहारमिच्छामि त्वय़ा क्षुद्वाधते हि माम् |
३३ क
भीष्म उवाच:
तद्वचः स प्रतिश्रुत्य वाक्यमाह विहङ्गमः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
न मेऽस्ति विभवो येन नाशय़ामि तव क्षुधाम् |
३४ क
भीष्म उवाच:
उत्पन्नेन हि जीवामो वय़ं नित्यं वनौकसः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
सञ्चय़ो नास्ति चास्माकं मुनीनामिव कानने |
३५ क
भीष्म उवाच:
इत्युक्त्वा स तदा तत्र विवर्णवदनोऽभवत् ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
कथं नु खलु कर्तव्यमिति चिन्तापरः सदा |
३६ क
भीष्म उवाच:
वभूव भरतश्रेष्ठ गर्हय़न्वृत्तिमात्मनः ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
मुहूर्ताल्लव्धसञ्ज्ञस्तु स पक्षी पक्षिघातकम् |
३७ क
भीष्म उवाच:
उवाच तर्पय़िष्ये त्वां मुहूर्तं प्रतिपालय़ ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्त्वा शुष्कपर्णैः स सम्प्रज्वाल्य हुताशनम् |
३८ क
भीष्म उवाच:
हर्षेण महता युक्तः कपोतः पुनरव्रवीत् ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
देवानां च मुनीनां च पितॄणां च महात्मनाम् |
३९ क
भीष्म उवाच:
श्रुतपूर्वो मय़ा धर्मो महानतिथिपूजने ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
कुरुष्वानुग्रहं मेऽद्य सत्यमेतद्व्रवीमि ते |
४० क
भीष्म उवाच:
निश्चिता खलु मे वुद्धिरतिथिप्रतिपूजने ||
४० ख
भीष्म उवाच:
ततः सत्यप्रतिज्ञो वै स पक्षी प्रहसन्निव |
४१ क
भीष्म उवाच:
तमग्निं त्रिः परिक्रम्य प्रविवेश महीपते ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
अग्निमध्यं प्रविष्टं तं लुव्धो दृष्ट्वाथ पक्षिणम् |
४२ क
भीष्म उवाच:
चिन्तय़ामास मनसा किमिदं नु कृतं मय़ा ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
अहो मम नृशंसस्य गर्हितस्य स्वकर्मणा |
४३ क
भीष्म उवाच:
अधर्मः सुमहान्घोरो भविष्यति न संशय़ः ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
एवं वहुविधं भूरि विललाप स लुव्धकः |
४४ क
भीष्म उवाच:
गर्हय़न्स्वानि कर्माणि द्विजं दृष्ट्वा तथागतम् ||
४४ ख