chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १४३
भीष्म उवाच:
ततस्तं लुव्धकः पश्यन्कृपय़ाभिपरिप्लुतः |
१ क
भीष्म उवाच:
कपोतमग्नौ पतितं वाक्यं पुनरुवाच ह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
किमीदृशं नृशंसेन मय़ा कृतमवुद्धिना |
२ क
भीष्म उवाच:
भविष्यति हि मे नित्यं पातकं हृदि जीवतः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
स विनिन्दन्नथात्मानं पुनः पुनरुवाच ह |
३ क
भीष्म उवाच:
धिङ्मामस्तु सुदुर्वुद्धिं सदा निकृतिनिश्चय़म् |
३ ख
भीष्म उवाच:
शुभं कर्म परित्यज्य योऽहं शकुनिलुव्धकः ||
३ ग
भीष्म उवाच:
नृशंसस्य ममाद्याय़ं प्रत्यादेशो न संशय़ः |
४ क
भीष्म उवाच:
दत्तः स्वमांसं ददता कपोतेन महात्मना ||
४ ख
भीष्म उवाच:
सोऽहं त्यक्ष्ये प्रिय़ान्प्राणान्पुत्रदारं विसृज्य च |
५ क
भीष्म उवाच:
उपदिष्टो हि मे धर्मः कपोतेनातिधर्मिणा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
अद्य प्रभृति देहं स्वं सर्वभोगैर्विवर्जितम् |
६ क
भीष्म उवाच:
यथा स्वल्पं जलं ग्रीष्मे शोषय़िष्याम्यहं तथा ||
६ ख
भीष्म उवाच:
क्षुत्पिपासातपसहः कृशो धमनिसन्ततः |
७ क
भीष्म उवाच:
उपवासैर्वहुविधैश्चरिष्ये पारलौकिकम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
अहो देहप्रदानेन दर्शितातिथिपूजना |
८ क
भीष्म उवाच:
तस्माद्धर्मं चरिष्यामि धर्मो हि परमा गतिः |
८ ख
भीष्म उवाच:
दृष्टो हि धर्मो धर्मिष्ठैर्यादृशो विहगोत्तमे ||
८ ग
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा विनिश्चित्य रौद्रकर्मा स लुव्धकः |
९ क
भीष्म उवाच:
महाप्रस्थानमाश्रित्य प्रय़यौ संशितव्रतः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
ततो यष्टिं शलाकाश्च क्षारकं पञ्जरं तथा |
१० क
भीष्म उवाच:
तांश्च वद्धा कपोतान्स सम्प्रमुच्योत्ससर्ज ह ||
१० ख