भीष्म उवाच:
ततो गते शाकुनिके कपोती प्राह दुःखिता |
१ क
भीष्म उवाच:
संस्मृत्य भर्तारमथो रुदती शोकमूर्छिता ||
१ ख
भीष्म उवाच:
नाहं ते विप्रिय़ं कान्त कदाचिदपि संस्मरे |
२ क
भीष्म उवाच:
सर्वा वै विधवा नारी वहुपुत्रापि खेचर |
२ ख
भीष्म उवाच:
शोच्या भवति वन्धूनां पतिहीना मनस्विनी ||
२ ग
भीष्म उवाच:
लालिताहं त्वय़ा नित्यं वहुमानाच्च सान्त्विता |
३ क
भीष्म उवाच:
वचनैर्मधुरैः स्निग्धैरसकृत्सुमनोहरैः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्झरेषु च |
४ क
भीष्म उवाच:
द्रुमाग्रेषु च रम्येषु रमिताहं त्वय़ा प्रिय़ ||
४ ख
भीष्म उवाच:
आकाशगमने चैव सुखिताहं त्वय़ा सुखम् |
५ क
भीष्म उवाच:
विहृतास्मि त्वय़ा कान्त तन्मे नाद्यास्ति किञ्चन ||
५ ख
भीष्म उवाच:
मितं ददाति हि पिता मितं माता मितं सुतः |
६ क
भीष्म उवाच:
अमितस्य तु दातारं भर्तारं का न पूजय़ेत् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
नास्ति भर्तृसमो नाथो न च भर्तृसमं सुखम् |
७ क
भीष्म उवाच:
विसृज्य धनसर्वस्वं भर्ता वै शरणं स्त्रिय़ाः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
न कार्यमिह मे नाथ जीवितेन त्वय़ा विना |
८ क
भीष्म उवाच:
पतिहीनापि का नारी सती जीवितुमुत्सहेत् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
एवं विलप्य वहुधा करुणं सा सुदुःखिता |
९ क
भीष्म उवाच:
पतिव्रता सम्प्रदीप्तं प्रविवेश हुताशनम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
ततश्चित्राम्वरधरं भर्तारं सान्वपश्यत |
१० क
भीष्म उवाच:
विमानस्थं सुकृतिभिः पूज्यमानं महात्मभिः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
चित्रमाल्याम्वरधरं सर्वाभरणभूषितम् |
११ क
भीष्म उवाच:
विमानशतकोटीभिरावृतं पुण्यकीर्तिभिः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततः स्वर्गगतः पक्षी भार्यया सह सङ्गतः |
१२ क
भीष्म उवाच:
कर्मणा पूजितस्तेन रेमे तत्र स भार्यया ||
१२ ख