वैशम्पाय़न उवाच:
ततः सूर्यान्निश्चरितां कर्णः शुश्राव भारतीम् |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
दुरत्ययां प्रणय़िनीं पितृवद्भास्करेरिताम् ||
१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सत्यमाह पृथा वाक्यं कर्ण मातृवचः कुरु |
२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
श्रेय़स्ते स्यान्नरव्याघ्र सर्वमाचरतस्तथा ||
२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवमुक्तस्य मात्रा च स्वय़ं पित्रा च भानुना |
३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
चचाल नैव कर्णस्य मतिः सत्यधृतेस्तदा ||
३ ख
कर्ण उवाच:
न ते न श्रद्दधे वाक्यं क्षत्रिय़े भाषितं त्वय़ा |
४ क
कर्ण उवाच:
धर्मद्वारं ममैतत्स्यान्निय़ोगकरणं तव ||
४ ख
कर्ण उवाच:
अकरोन्मय़ि यत्पापं भवती सुमहात्ययम् |
५ क
कर्ण उवाच:
अवकीर्णोऽस्मि ते तेन तद्यशःकीर्तिनाशनम् ||
५ ख
कर्ण उवाच:
अहं च क्षत्रिय़ो जातो न प्राप्तः क्षत्रसत्क्रिय़ाम् |
६ क
कर्ण उवाच:
त्वत्कृते किं नु पापीय़ः शत्रुः कुर्यान्ममाहितम् ||
६ ख
कर्ण उवाच:
क्रिय़ाकाले त्वनुक्रोशमकृत्वा त्वमिमं मम |
७ क
कर्ण उवाच:
हीनसंस्कारसमय़मद्य मां समचूचुदः ||
७ ख
कर्ण उवाच:
न वै मम हितं पूर्वं मातृवच्चेष्टितं त्वय़ा |
८ क
कर्ण उवाच:
सा मां सम्वोधय़स्यद्य केवलात्महितैषिणी ||
८ ख
कर्ण उवाच:
कृष्णेन सहितात्को वै न व्यथेत धनञ्जय़ात् |
९ क
कर्ण उवाच:
कोऽद्य भीतं न मां विद्यात्पार्थानां समितिं गतम् ||
९ ख
कर्ण उवाच:
अभ्राता विदितः पूर्वं युद्धकाले प्रकाशितः |
१० क
कर्ण उवाच:
पाण्डवान्यदि गच्छामि किं मां क्षत्रं वदिष्यति ||
१० ख
कर्ण उवाच:
सर्वकामैः संविभक्तः पूजितश्च सदा भृशम् |
११ क
कर्ण उवाच:
अहं वै धार्तराष्ट्राणां कुर्यां तदफलं कथम् ||
११ ख
कर्ण उवाच:
उपनह्य परैर्वैरं ये मां नित्यमुपासते |
१२ क
कर्ण उवाच:
नमस्कुर्वन्ति च सदा वसवो वासवं यथा ||
१२ ख
कर्ण उवाच:
मम प्राणेन ये शत्रूञ्शक्ताः प्रतिसमासितुम् |
१३ क
कर्ण उवाच:
मन्यन्तेऽद्य कथं तेषामहं भिन्द्यां मनोरथम् ||
१३ ख
कर्ण उवाच:
मय़ा प्लवेन सङ्ग्रामं तितीर्षन्ति दुरत्ययम् |
१४ क
कर्ण उवाच:
अपारे पारकामा ये त्यजेय़ं तानहं कथम् ||
१४ ख
कर्ण उवाच:
अय़ं हि कालः सम्प्राप्तो धार्तराष्ट्रोपजीविनाम् |
१५ क
कर्ण उवाच:
निर्वेष्टव्यं मय़ा तत्र प्राणानपरिरक्षता ||
१५ ख
कर्ण उवाच:
कृतार्थाः सुभृता ये हि कृत्यकाल उपस्थिते |
१६ क
कर्ण उवाच:
अनवेक्ष्य कृतं पापा विकुर्वन्त्यनवस्थिताः ||
१६ ख
कर्ण उवाच:
राजकिल्विषिणां तेषां भर्तृपिण्डापहारिणाम् |
१७ क
कर्ण उवाच:
नैवाय़ं न परो लोको विद्यते पापकर्मणाम् ||
१७ ख
कर्ण उवाच:
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामर्थे योत्स्यामि ते सुतैः |
१८ क
कर्ण उवाच:
वलं च शक्तिं चास्थाय़ न वै त्वय़्यनृतं वदे ||
१८ ख
कर्ण उवाच:
आनृशंस्यमथो वृत्तं रक्षन्सत्पुरुषोचितम् |
१९ क
कर्ण उवाच:
अतोऽर्थकरमप्येतन्न करोम्यद्य ते वचः ||
१९ ख
कर्ण उवाच:
न तु तेऽय़ं समारम्भो मय़ि मोघो भविष्यति |
२० क
कर्ण उवाच:
वध्यान्विषह्यान्सङ्ग्रामे न हनिष्यामि ते सुतान् |
२० ख
कर्ण उवाच:
युधिष्ठिरं च भीमं च यमौ चैवार्जुनादृते ||
२० ग
कर्ण उवाच:
अर्जुनेन समं युद्धं मम यौधिष्ठिरे वले |
२१ क
कर्ण उवाच:
अर्जुनं हि निहत्याजौ सम्प्राप्तं स्यात्फलं मय़ा |
२१ ख
कर्ण उवाच:
यशसा चापि युज्येय़ं निहतः सव्यसाचिना ||
२१ ग
कर्ण उवाच:
न ते जातु नशिष्यन्ति पुत्राः पञ्च यशस्विनि |
२२ क
कर्ण उवाच:
निरर्जुनाः सकर्णा वा सार्जुना वा हते मय़ि ||
२२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
इति कर्णवचः श्रुत्वा कुन्ती दुःखात्प्रवेपती |
२३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
उवाच पुत्रमाश्लिष्य कर्णं धैर्यादकम्पितम् ||
२३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवं वै भाव्यमेतेन क्षय़ं यास्यन्ति कौरवाः |
२४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
यथा त्वं भाषसे कर्ण दैवं तु वलवत्तरम् ||
२४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
त्वय़ा चतुर्णां भ्रातॄणामभय़ं शत्रुकर्शन |
२५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
दत्तं तत्प्रतिजानीहि सङ्गरप्रतिमोचनम् ||
२५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अनामय़ं स्वस्ति चेति पृथाथो कर्णमव्रवीत् |
२६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तां कर्णोऽभ्यवदत्प्रीतस्ततस्तौ जग्मतुः पृथक् ||
२६ ख