भीष्म उवाच:
विमानस्थौ तु तौ राजँल्लुव्धको वै ददर्श ह |
१ क
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा तौ दम्पती दुःखादचिन्तय़त सद्गतिम् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
कीदृशेनेह तपसा गच्छेय़ं परमां गतिम् |
२ क
भीष्म उवाच:
इति वुद्ध्या विनिश्चित्य गमनाय़ोपचक्रमे ||
२ ख
भीष्म उवाच:
महाप्रस्थानमाश्रित्य लुव्धकः पक्षिजीवनः |
३ क
भीष्म उवाच:
निश्चेष्टो मारुताहारो निर्ममः स्वर्गकाङ्क्षय़ा ||
३ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽपश्यत्सुविस्तीर्णं हृद्यं पद्मविभूषितम् |
४ क
भीष्म उवाच:
नानाद्विजगणाकीर्णं सरः शीतजलं शुभम् |
४ ख
भीष्म उवाच:
पिपासार्तोऽपि तद्दृष्ट्वा तृप्तः स्यान्नात्र संशय़ः ||
४ ग
भीष्म उवाच:
उपवासकृशोऽत्यर्थं स तु पार्थिव लुव्धकः |
५ क
भीष्म उवाच:
उपसर्पत संहृष्टः श्वापदाध्युषितं वनम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
महान्तं निश्चय़ं कृत्वा लुव्धकः प्रविवेश ह |
६ क
भीष्म उवाच:
प्रविशन्नेव च वनं निगृहीतः स कण्टकैः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
स कण्टकविभुग्नाङ्गो लोहितार्द्रीकृतच्छविः |
७ क
भीष्म उवाच:
वभ्राम तस्मिन्विजने नानामृगसमाकुले ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ततो द्रुमाणां महतां पवनेन वने तदा |
८ क
भीष्म उवाच:
उदतिष्ठत सङ्घर्षात्सुमहान्हव्यवाहनः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
तद्वनं वृक्षसङ्कीर्णं लताविटपसङ्कुलम् |
९ क
भीष्म उवाच:
ददाह पावकः क्रुद्धो युगान्ताग्निसमप्रभः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
सज्वालैः पवनोद्धूतैर्विस्फुलिङ्गैः समन्वितः |
१० क
भीष्म उवाच:
ददाह तद्वनं घोरं मृगपक्षिसमाकुलम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ततः स देहमोक्षार्थं सम्प्रहृष्टेन चेतसा |
११ क
भीष्म उवाच:
अभ्यधावत संवृद्धं पावकं लुव्धकस्तदा ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तेनाग्निना दग्धो लुव्धको नष्टकिल्विषः |
१२ क
भीष्म उवाच:
जगाम परमां सिद्धिं तदा भरतसत्तम ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
ततः स्वर्गस्थमात्मानं सोऽपश्यद्विगतज्वरः |
१३ क
भीष्म उवाच:
यक्षगन्धर्वसिद्धानां मध्ये भ्राजन्तमिन्द्रवत् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
एवं खलु कपोतश्च कपोती च पतिव्रता |
१४ क
भीष्म उवाच:
लुव्धकेन सह स्वर्गं गताः पुण्येन कर्मणा ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
यापि चैवंविधा नारी भर्तारमनुवर्तते |
१५ क
भीष्म उवाच:
विराजते हि सा क्षिप्रं कपोतीव दिवि स्थिता ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
एवमेतत्पुरा वृत्तं लुव्धकस्य महात्मनः |
१६ क
भीष्म उवाच:
कपोतस्य च धर्मिष्ठा गतिः पुण्येन कर्मणा ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
यश्चेदं शृणुय़ान्नित्यं यश्चेदं परिकीर्तय़ेत् |
१७ क
भीष्म उवाच:
नाशुभं विद्यते तस्य मनसापि प्रमाद्यतः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
युधिष्ठिर महानेष धर्मो धर्मभृतां वर |
१८ क
भीष्म उवाच:
गोघ्नेष्वपि भवेदस्मिन्निष्कृतिः पापकर्मणः |
१८ ख
भीष्म उवाच:
निष्कृतिर्न भवेत्तस्मिन्यो हन्याच्छरणागतम् ||
१८ ग