chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १४६
युधिष्ठिर उवाच:
अवुद्धिपूर्वं यः पापं कुर्याद्भरतसत्तम |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
मुच्यते स कथं तस्मादेनसस्तद्वदस्व मे ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अत्र ते वर्णय़िष्येऽहमितिहासं पुरातनम् |
२ क
भीष्म उवाच:
इन्द्रोतः शौनको विप्रो यदाह जनमेजय़म् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
आसीद्राजा महावीर्यः पारिक्षिज्जनमेजय़ः |
३ क
भीष्म उवाच:
अवुद्धिपूर्वं व्रह्महत्या तमागच्छन्महीपतिम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
तं व्राह्मणाः सर्व एव तत्यजुः सपुरोहिताः |
४ क
भीष्म उवाच:
जगाम स वनं राजा दह्यमानो दिवानिशम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
स प्रजाभिः परित्यक्तश्चकार कुशलं महत् |
५ क
भीष्म उवाच:
अतिवेलं तपस्तेपे दह्यमानः स मन्युना ||
५ ख
भीष्म उवाच:
तत्रेतिहासं वक्ष्यामि धर्मस्यास्योपवृंहणम् |
६ क
भीष्म उवाच:
दह्यमानः पापकृत्या जगाम जनमेजय़ः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
वरिष्यमाण इन्द्रोतं शौनकं संशितव्रतम् |
७ क
भीष्म उवाच:
समासाद्योपजग्राह पादय़ोः परिपीडय़न् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ततो भीतो महाप्राज्ञो जगर्हे सुभृशं तदा |
८ क
भीष्म उवाच:
कर्ता पापस्य महतो भ्रूणहा किमिहागतः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
किं तवास्मासु कर्तव्यं मा मा स्प्राक्षीः कथञ्चन |
९ क
भीष्म उवाच:
गच्छ गच्छ न ते स्थानं प्रीणात्यस्मानिह ध्रुवम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
रुधिरस्येव ते गन्धः शवस्येव च दर्शनम् |
१० क
भीष्म उवाच:
अशिवः शिवसङ्काशो मृतो जीवन्निवाटसि ||
१० ख
भीष्म उवाच:
अन्तर्मृत्युरशुद्धात्मा पापमेवानुचिन्तय़न् |
११ क
भीष्म उवाच:
प्रवुध्यसे प्रस्वपिषि वर्तसे चरसे सुखी ||
११ ख
भीष्म उवाच:
मोघं ते जीवितं राजन्परिक्लिष्टं च जीवसि |
१२ क
भीष्म उवाच:
पापाय़ेव च सृष्टोऽसि कर्मणे ह यवीय़से ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
वहु कल्याणमिच्छन्त ईहन्ते पितरः सुतान् |
१३ क
भीष्म उवाच:
तपसा देवतेज्याभिर्वन्दनेन तितिक्षय़ा ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
पितृवंशमिमं पश्य त्वत्कृते नरकं गतम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
निरर्थाः सर्व एवैषामाशावन्धास्त्वदाश्रय़ाः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
यान्पूजय़न्तो विन्दन्ति स्वर्गमाय़ुर्यशः सुखम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
तेषु ते सततं द्वेषो व्राह्मणेषु निरर्थकः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
इमं लोकं विमुच्य त्वमवाङ्मूर्धा पतिष्यसि |
१६ क
भीष्म उवाच:
अशाश्वतीः शाश्वतीश्च समाः पापेन कर्मणा ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अद्यमानो जन्तुगृध्रैः शितिकण्ठैरय़ोमुखैः |
१७ क
भीष्म उवाच:
ततोऽपि पुनरावृत्तः पापय़ोनिं गमिष्यसि ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
यदिदं मन्यसे राजन्नाय़मस्ति परः कुतः |
१८ क
भीष्म उवाच:
प्रतिस्मारय़ितारस्त्वां यमदूता यमक्षय़े ||
१८ ख