दमय़न्त्यु उवाच:
न मामर्हसि कल्याण पापेन परिशङ्कितुम् |
१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
मय़ा हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप ||
१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तवाभिगमनार्थं तु सर्वतो व्राह्मणा गताः |
२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
वाक्यानि मम गाथाभिर्गाय़माना दिशो दश ||
२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
ततस्त्वां व्राह्मणो विद्वान्पर्णादो नाम पार्थिव |
३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अभ्यगच्छत्कोसलाय़ामृतुपर्णनिवेशने ||
३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तेन वाक्ये हृते सम्यक्प्रतिवाक्ये तथाहृते |
४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
उपाय़ोऽय़ं मय़ा दृष्टो नैषधानय़ने तव ||
४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
त्वामृते न हि लोकेऽन्य एकाह्ना पृथिवीपते |
५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
समर्थो योजनशतं गन्तुमश्वैर्नराधिप ||
५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तथा चेमौ महीपाल भजेऽहं चरणौ तव |
६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
यथा नासत्कृतं किञ्चिन्मनसापि चराम्यहम् ||
६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
अय़ं चरति लोकेऽस्मिन्भूतसाक्षी सदागतिः |
७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
एष मुञ्चतु मे प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ||
७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तथा चरति तिग्मांशुः परेण भुवनं सदा |
८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
स विमुञ्चतु मे प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ||
८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
चन्द्रमाः सर्वभूतानामन्तश्चरति साक्षिवत् |
९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
स विमुञ्चतु मे प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ||
९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
एते देवास्त्रय़ः कृत्स्नं त्रैलोक्यं धारय़न्ति वै |
१० क
दमय़न्त्यु उवाच:
विव्रुवन्तु यथासत्यमेते वाद्य त्यजन्तु माम् ||
१० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
एवमुक्ते ततो वाय़ुरन्तरिक्षादभाषत |
११ क
दमय़न्त्यु उवाच:
नैषा कृतवती पापं नल सत्यं व्रवीमि ते ||
११ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
राजञ्शीलनिधिः स्फीतो दमय़न्त्या सुरक्षितः |
१२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
साक्षिणो रक्षिणश्चास्या वय़ं त्रीन्परिवत्सरान् ||
१२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
उपाय़ो विहितश्चाय़ं त्वदर्थमतुलोऽनय़ा |
१३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
न ह्येकाह्ना शतं गन्ता त्वदृतेऽन्यः पुमानिह ||
१३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
उपपन्ना त्वय़ा भैमी त्वं च भैम्या महीपते |
१४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
नात्र शङ्का त्वय़ा कार्या सङ्गच्छ सह भार्यया ||
१४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तथा व्रुवति वाय़ौ तु पुष्पवृष्टिः पपात ह |
१५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
देवदुन्दुभय़ो नेदुर्ववौ च पवनः शिवः ||
१५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तदद्भुततमं दृष्ट्वा नलो राजाथ भारत |
१६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
दमय़न्त्यां विशङ्कां तां व्यपाकर्षदरिन्दमः ||
१६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
ततस्तद्वस्त्रमरजः प्रावृणोद्वसुधाधिपः |
१७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
संस्मृत्य नागराजानं ततो लेभे वपुः स्वकम् ||
१७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
स्वरूपिणं तु भर्तारं दृष्ट्वा भीमसुता तदा |
१८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
प्राक्रोशदुच्चैरालिङ्ग्य पुण्यश्लोकमनिन्दिता ||
१८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
भैमीमपि नलो राजा भ्राजमानो यथा पुरा |
१९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सस्वजे स्वसुतौ चापि यथावत्प्रत्यनन्दत ||
१९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
ततः स्वोरसि विन्यस्य वक्त्रं तस्य शुभानना |
२० क
दमय़न्त्यु उवाच:
परीता तेन दुःखेन निशश्वासाय़तेक्षणा ||
२० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तथैव मलदिग्धाङ्गी परिष्वज्य शुचिस्मिता |
२१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सुचिरं पुरुषव्याघ्रं तस्थौ साश्रुपरिप्लुता ||
२१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
ततः सर्वं यथावृत्तं दमय़न्त्या नलस्य च |
२२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
भीमाय़ाकथय़त्प्रीत्या वैदर्भ्या जननी नृप ||
२२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
ततोऽव्रवीन्महाराजः कृतशौचमहं नलम् |
२३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
दमय़न्त्या सहोपेतं काल्यं द्रष्टा सुखोषितम् ||
२३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
ततस्तौ सहितौ रात्रिं कथय़न्तौ पुरातनम् |
२४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
वने विचरितं सर्वमूषतुर्मुदितौ नृप ||
२४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
स चतुर्थे ततो वर्षे सङ्गम्य सह भार्यया |
२५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सर्वकामैः सुसिद्धार्थो लव्धवान्परमां मुदम् ||
२५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
दमय़न्त्यपि भर्तारमवाप्याप्याय़िता भृशम् |
२६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अर्धसञ्जातसस्येव तोय़ं प्राप्य वसुन्धरा ||
२६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सैवं समेत्य व्यपनीततन्द्री; शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्त्वा |
२७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
रराज भैमी समवाप्तकामा; शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ||
२७ ख