धृतराष्ट्र उवाच:
अगोपमिव चोद्भ्रान्तं गोकुलं तद्वलं मम ||
४९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पौरुषं सर्वलोकस्य परं यस्य महाहवे |
५० क
धृतराष्ट्र उवाच:
परासिक्ते च वस्तस्मिन्कथमासीन्मनस्तदा ||
५० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
जीवितेऽप्यद्य सामर्थ्यं किमिवास्मासु सञ्जय़ |
५१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
घातय़ित्वा महावीर्यं पितरं लोकधार्मिकम् ||
५१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अगाधे सलिले मग्नां नावं दृष्ट्वेव पारगाः |
५२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मे हते भृशं दुःखान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
५२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अद्रिसारमय़ं नूनं सुदृढं हृदय़ं मम |
५३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं भीष्मं न दीर्यते ||
५३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्मिन्नस्त्रं च मेधा च नीतिश्च भरतर्षभे |
५४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अप्रमेय़ाणि दुर्धर्षे कथं स निहतो युधि ||
५४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न चास्त्रेण न शौर्येण तपसा मेधय़ा न च |
५५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न धृत्या न पुनस्त्यागान्मृत्योः कश्चिद्विमुच्यते ||
५५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कालो नूनं महावीर्यः सर्वलोकदुरत्ययः |
५६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यत्र शान्तनवं भीष्मं हतं शंससि सञ्जय़ ||
५६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पुत्रशोकाभिसन्तप्तो महद्दुःखमचिन्तय़न् |
५७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आशंसेऽहं पुरा त्राणं भीष्माच्छन्तनुनन्दनात् ||
५७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यदादित्यमिवापश्यत्पतितं भुवि सञ्जय़ |
५८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधनः शान्तनवं किं तदा प्रत्यपद्यत ||
५८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नाहं स्वेषां परेषां वा वुद्ध्या सञ्जय़ चिन्तय़न् |
५९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शेषं किञ्चित्प्रपश्यामि प्रत्यनीके महीक्षिताम् ||
५९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दारुणः क्षत्रधर्मोऽय़मृषिभिः सम्प्रदर्शितः |
६० क
धृतराष्ट्र उवाच:
यत्र शान्तनवं हत्वा राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः ||
६० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वय़ं वा राज्यमिच्छामो घातय़ित्वा पितामहम् |
६१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
क्षत्रधर्मे स्थिताः पार्था नापराध्यन्ति पुत्रकाः ||
६१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एतदार्येण कर्तव्यं कृच्छ्रास्वापत्सु सञ्जय़ |
६२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पराक्रमः परं शक्त्या तच्च तस्मिन्प्रतिष्ठितम् ||
६२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अनीकानि विनिघ्नन्तं ह्रीमन्तमपराजितम् |
६३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं शान्तनवं तात पाण्डुपुत्रा न्यपातय़न् ||
६३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं युक्तान्यनीकानि कथं युद्धं महात्मभिः |
६४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं वा निहतो भीष्मः पिता सञ्जय़ मे परैः ||
६४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौवलः |
६५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दुःशासनश्च कितवो हते भीष्मे किमव्रुवन् ||
६५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यच्छरीरैरुपस्तीर्णां नरवारणवाजिनाम् |
६६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शरशक्तिगदाखड्गतोमराक्षां भय़ावहाम् ||
६६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्राविशन्कितवा मन्दाः सभां युधि दुरासदाम् |
६७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्राणद्यूते प्रतिभय़े केऽदीव्यन्त नरर्षभाः ||
६७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
केऽजय़न्के जितास्तत्र हृतलक्षा निपातिताः |
६८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अन्ये भीष्माच्छान्तनवात्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
६८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न हि मे शान्तिरस्तीह युधि देवव्रतं हतम् |
६९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पितरं भीमकर्माणं श्रुत्वा मे दुःखमाविशत् ||
६९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आर्तिं मे हृदय़े रूढां महतीं पुत्रकारिताम् |
७० क
धृतराष्ट्र उवाच:
त्वं सिञ्चन्सर्पिषेवाग्निमुद्दीपय़सि सञ्जय़ ||
७० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
महान्तं भारमुद्यम्य विश्रुतं सार्वलौकिकम् |
७१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दृष्ट्वा विनिहतं भीष्मं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
७१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
श्रोष्यामि तानि दुःखानि दुर्योधनकृतान्यहम् |
७२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यद्वृत्तं तत्र सञ्जय़ ||
७२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सङ्ग्रामे पृथिवीशानां मन्दस्यावुद्धिसम्भवम् |
७३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अपनीतं सुनीतं वा तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
७३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यत्कृतं तत्र भीष्मेण सङ्ग्रामे जय़मिच्छता |
७४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तेजोय़ुक्तं कृतास्त्रेण शंस तच्चाप्यशेषतः ||
७४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यथा तदभवद्युद्धं कुरुपाण्डवसेनय़ोः |
७५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
क्रमेण येन यस्मिंश्च काले यच्च यथा च तत् ||
७५ ख