chevron_left द्रोण पर्व अध्याय २३
धृतराष्ट्र उवाच:
व्यथय़ेय़ुरिमे सेनां देवानामपि संय़ुगे |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आहवे ये न्यवर्तन्त वृकोदरमुखा रथाः ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सम्प्रय़ुक्तः किलैवाय़ं दिष्टैर्भवति पूरुषः |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मिन्नेव तु सर्वार्था दृश्यन्ते वै पृथग्विधाः ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दीर्घं विप्रोषितः कालमरण्ये जटिलोऽजिनी |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अज्ञातश्चैव लोकस्य विजहार युधिष्ठिरः ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स एव महतीं सेनां समावर्तय़दाहवे |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
किमन्यद्दैवसंय़ोगान्मम पुत्रस्य चाभवत् ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
युक्त एव हि भाग्येन ध्रुवमुत्पद्यते नरः |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स तथाकृष्यते तेन न यथा स्वय़मिच्छति ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
द्यूतव्यसनमासाद्य क्लेशितो हि युधिष्ठिरः |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स पुनर्भागधेय़ेन सहाय़ानुपलव्धवान् ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अर्धं मे केकय़ा लव्धाः काशिकाः कोसलाश्च ये |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
चेदय़श्चापरे वङ्गा मामेव समुपाश्रिताः ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पृथिवी भूय़सी तात मम पार्थस्य नो तथा |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
इति मामव्रवीत्सूत मन्दो दुर्योधनस्तदा ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्य सेनासमूहस्य मध्ये द्रोणः सुरक्षितः |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
निहतः पार्षतेनाजौ किमन्यद्भागधेय़तः ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मध्ये राज्ञां महावाहुं सदा युद्धाभिनन्दिनम् |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वास्त्रपारगं द्रोणं कथं मृत्युरुपेय़िवान् ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
समनुप्राप्तकृच्छ्रोऽहं संमोहं परमं गतः |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नाहं जीवितुमुत्सहे ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यन्मा क्षत्ताव्रवीत्तात प्रपश्यन्पुत्रगृद्धिनम् |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधनेन तत्सर्वं प्राप्तं सूत मय़ा सह ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नृशंसं तु परं तत्स्यात्त्यक्त्वा दुर्योधनं यदि |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पुत्रशेषं चिकीर्षेय़ं कृच्छ्रं न मरणं भवेत् ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यो हि धर्मं परित्यज्य भवत्यर्थपरो नरः |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सोऽस्माच्च हीय़ते लोकात्क्षुद्रभावं च गच्छति ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अद्य चाप्यस्य राष्ट्रस्य हतोत्साहस्य सञ्जय़ |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं स्यादवशेषं हि धुर्ययोरभ्यतीतय़ोः |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यौ नित्यमनुजीवामः क्षमिणौ पुरुषर्षभौ ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्यक्तमेव च मे शंस यथा युद्धमवर्तत |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
केऽय़ुध्यन्के व्यपाकर्षन्के क्षुद्राः प्राद्रवन्भय़ात् ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
धनञ्जय़ं च मे शंस यद्यच्चक्रे रथर्षभः |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्माद्भय़ं नो भूय़िष्ठं भ्रातृव्याच्च विशेषतः ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यथासीच्च निवृत्तेषु पाण्डवेषु च सञ्जय़ |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मम सैन्यावशेषस्य संनिपातः सुदारुणः |
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मामकानां च ये शूराः कांस्तत्र समवारय़न् ||
१९ ग