chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १५३
युधिष्ठिर उवाच:
अनर्थानामधिष्ठानमुक्तो लोभः पितामह |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
अज्ञानमपि वै तात श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
करोति पापं योऽज्ञानान्नात्मनो वेत्ति च क्षमम् |
२ क
भीष्म उवाच:
प्रद्वेष्टि साधुवृत्तांश्च स लोकस्यैति वाच्यताम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
अज्ञानान्निरय़ं याति तथाज्ञानेन दुर्गतिम् |
३ क
भीष्म उवाच:
अज्ञानात्क्लेशमाप्नोति तथापत्सु निमज्जति ||
३ ख
युधिष्ठिर उवाच:
अज्ञानस्य प्रवृत्तिं च स्थानं वृद्धिं क्षय़ोदय़ौ |
४ क
युधिष्ठिर उवाच:
मूलं योगं गतिं कालं कारणं हेतुमेव च ||
४ ख
युधिष्ठिर उवाच:
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यथावदिह पार्थिव |
५ क
युधिष्ठिर उवाच:
अज्ञानप्रभवं हीदं यद्दुःखमुपलभ्यते ||
५ ख
भीष्म उवाच:
रागो द्वेषस्तथा मोहो हर्षः शोकोऽभिमानिता |
६ क
भीष्म उवाच:
कामः क्रोधश्च दर्पश्च तन्द्रीरालस्यमेव च ||
६ ख
भीष्म उवाच:
इच्छा द्वेषस्तथा तापः परवृद्ध्युपतापिता |
७ क
भीष्म उवाच:
अज्ञानमेतन्निर्दिष्टं पापानां चैव याः क्रिय़ाः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
एतय़ा या प्रवृत्तिश्च वृद्ध्यादीन्यांश्च पृच्छसि |
८ क
भीष्म उवाच:
विस्तरेण महावाहो शृणु तच्च विशां पते ||
८ ख
भीष्म उवाच:
उभावेतौ समफलौ समदोषौ च भारत |
९ क
भीष्म उवाच:
अज्ञानं चातिलोभश्चाप्येकं जानीहि पार्थिव ||
९ ख
भीष्म उवाच:
लोभप्रभवमज्ञानं वृद्धं भूय़ः प्रवर्धते |
१० क
भीष्म उवाच:
स्थाने स्थानं क्षय़े क्षैण्यमुपैति विविधां गतिम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
मूलं लोभस्य महतः कालात्मगतिरेव च |
११ क
भीष्म उवाच:
छिन्नेऽच्छिन्ने तथा लोभे कारणं काल एव हि ||
११ ख
भीष्म उवाच:
तस्याज्ञानात्तु लोभो हि लोभादज्ञानमेव च |
१२ क
भीष्म उवाच:
सर्वे दोषास्तथा लोभात्तस्माल्लोभं विवर्जय़ेत् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
जनको युवनाश्वश्च वृषादर्भिः प्रसेनजित् |
१३ क
भीष्म उवाच:
लोभक्षय़ाद्दिवं प्राप्तास्तथैवान्ये जनाधिपाः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
प्रत्यक्षं तु कुरुश्रेष्ठ त्यज लोभमिहात्मना |
१४ क
भीष्म उवाच:
त्यक्त्वा लोभं सुखं लोके प्रेत्य चानुचरिष्यसि ||
१४ ख