वैशम्पाय़न उवाच:
अभितर्जय़मानाश्च रुवन्तश्च महारवान् |
४९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
न मोहं भीमसेनस्य ददृशुः सर्वराक्षसाः ||
४९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ते शरैः क्षतसर्वाङ्गा भीमसेनभय़ार्दिताः |
५० क
वैशम्पाय़न उवाच:
भीममार्तस्वरं चक्रुर्विप्रकीर्णमहाय़ुधाः ||
५० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
उत्सृज्य ते गदाशूलानसिशक्तिपरश्वधान् |
५१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
दक्षिणां दिशमाजग्मुस्त्रासिता दृढधन्वना ||
५१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तत्र शूलगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः |
५२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सखा वैश्रवणस्यासीन्मणिमान्नाम राक्षसः ||
५२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अदर्शय़दधीकारं पौरुषं च महावलः |
५३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
स तान्दृष्ट्वा परावृत्तान्स्मय़मान इवाव्रवीत् ||
५३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एकेन वहवः सङ्ख्ये मानुषेण पराजिताः |
५४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्राप्य वैश्रवणावासं किं वक्ष्यथ धनेश्वरम् ||
५४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवमाभाष्य तान्सर्वान्न्यवर्तत स राक्षसः |
५५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
शक्तिशूलगदापाणिरभ्यधावच्च पाण्डवम् ||
५५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तमापतन्तं वेगेन प्रभिन्नमिव वारणम् |
५६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
वत्सदन्तैस्त्रिभिः पार्श्वे भीमसेनः समर्पय़त् ||
५६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
मणिमानपि सङ्क्रुद्धः प्रगृह्य महतीं गदाम् |
५७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्राहिणोद्भीमसेनाय़ परिक्षिप्य महावलः ||
५७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
विद्युद्रूपां महाघोरामाकाशे महतीं गदाम् |
५८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
शरैर्वहुभिरभ्यर्छद्भीमसेनः शिलाशितैः ||
५८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रत्यहन्यन्त ते सर्वे गदामासाद्य साय़काः |
५९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
न वेगं धारय़ामासुर्गदावेगस्य वेगिताः ||
५९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
गदाय़ुद्धसमाचारं वुध्यमानः स वीर्यवान् |
६० क
वैशम्पाय़न उवाच:
व्यंसय़ामास तं तस्य प्रहारं भीमविक्रमः ||
६० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततः शक्तिं महाघोरां रुक्मदण्डामय़स्मय़ीम् |
६१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तस्मिन्नेवान्तरे धीमान्प्रजहाराथ राक्षसः ||
६१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सा भुजं भीमनिर्ह्रादा भित्त्वा भीमस्य दक्षिणम् |
६२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
साग्निज्वाला महारौद्रा पपात सहसा भुवि ||
६२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सोऽतिविद्धो महेष्वासः शक्त्यामितपराक्रमः |
६३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
गदां जग्राह कौरव्यो गदाय़ुद्धविशारदः ||
६३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तां प्रगृह्योन्नदन्भीमः सर्वशैक्याय़सीं गदाम् |
६४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तरसा सोऽभिदुद्राव मणिमन्तं महावलम् ||
६४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
दीप्यमानं महाशूलं प्रगृह्य मणिमानपि |
६५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्राहिणोद्भीमसेनाय़ वेगेन महता नदन् ||
६५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
भङ्क्त्वा शूलं गदाग्रेण गदाय़ुद्धविशारदः |
६६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अभिदुद्राव तं तूर्णं गरुत्मानिव पन्नगम् ||
६६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सोऽन्तरिक्षमभिप्लुत्य विधूय़ सहसा गदाम् |
६७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रचिक्षेप महावाहुर्विनद्य रणमूर्धनि ||
६७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सेन्द्राशनिरिवेन्द्रेण विसृष्टा वातरंहसा |
६८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
हत्वा रक्षः क्षितिं प्राप्य कृत्येव निपपात ह ||
६८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तं राक्षसं भीमवलं भीमसेनेन पातितम् |
६९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
ददृशुः सर्वभूतानि सिंहेनेव गवां पतिम् ||
६९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तं प्रेक्ष्य निहतं भूमौ हतशेषा निशाचराः |
७० क
वैशम्पाय़न उवाच:
भीममार्तस्वरं कृत्वा जग्मुः प्राचीं दिशं प्रति ||
७० ख