धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते तत्र सञ्जय़ |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वन्नतः परम् ||
१ ख
सञ्जय़ उवाच:
तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वै |
२ क
सञ्जय़ उवाच:
कौरवेषु च भग्नेषु कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः ||
२ ख
सञ्जय़ उवाच:
दृष्ट्वा सुमहदाश्चर्यमात्मनो विजय़ावहम् |
३ क
सञ्जय़ उवाच:
यदृच्छय़ागतं व्यासं पप्रच्छ भरतर्षभ ||
३ ख
सञ्जय़ उवाच:
सङ्ग्रामे निघ्नतः शत्रूञ्शरौघैर्विमलैरहम् |
४ क
सञ्जय़ उवाच:
अग्रतो लक्षय़े यान्तं पुरुषं पावकप्रभम् ||
४ ख
सञ्जय़ उवाच:
ज्वलन्तं शूलमुद्यम्य यां दिशं प्रतिपद्यते |
५ क
सञ्जय़ उवाच:
तस्यां दिशि विशीर्यन्ते शत्रवो मे महामुने ||
५ ख
सञ्जय़ उवाच:
न पद्भ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुञ्चति |
६ क
सञ्जय़ उवाच:
शूलाच्छूलसहस्राणि निष्पेतुस्तस्य तेजसा ||
६ ख
सञ्जय़ उवाच:
तेन भग्नानरीन्सर्वान्मद्भग्नान्मन्यते जनः |
७ क
सञ्जय़ उवाच:
तेन दग्धानि सैन्यानि पृष्ठतोऽनुदहाम्यहम् ||
७ ख
सञ्जय़ उवाच:
भगवंस्तन्ममाचक्ष्व को वै स पुरुषोत्तमः |
८ क
सञ्जय़ उवाच:
शूलपाणिर्महान्कृष्ण तेजसा सूर्यसंनिभः ||
८ ख
व्यास उवाच:
प्रजापतीनां प्रथमं तैजसं पुरुषं विभुम् |
९ क
व्यास उवाच:
भुवनं भूर्भुवं देवं सर्वलोकेश्वरं प्रभुम् ||
९ ख
व्यास उवाच:
ईशानं वरदं पार्थ दृष्टवानसि शङ्करम् |
१० क
व्यास उवाच:
तं गच्छ शरणं देवं सर्वादिं भुवनेश्वरम् ||
१० ख
व्यास उवाच:
महादेवं महात्मानमीशानं जटिलं शिवम् |
११ क
व्यास उवाच:
त्र्यक्षं महाभुजं रुद्रं शिखिनं चीरवाससम् |
११ ख
व्यास उवाच:
दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान्वरान् ||
११ ग
व्यास उवाच:
तस्य ते पार्षदा दिव्या रूपैर्नानाविधैः विभोः |
१२ क
व्यास उवाच:
वामना जटिला मुण्डा ह्रस्वग्रीवा महोदराः ||
१२ ख
व्यास उवाच:
महाकाय़ा महोत्साहा महाकर्णास्तथापरे |
१३ क
व्यास उवाच:
आननैर्विकृतैः पादैः पार्थ वेषैश्च वैकृतैः ||
१३ ख
व्यास उवाच:
ईदृशैः स महादेवः पूज्यमानो महेश्वरः |
१४ क
व्यास उवाच:
स शिवस्तात तेजस्वी प्रसादाद्याति तेऽग्रतः |
१४ ख
व्यास उवाच:
तस्मिन्घोरे तदा पार्थ सङ्ग्रामे लोमहर्षणे ||
१४ ग
व्यास उवाच:
द्रोणकर्णकृपैर्गुप्तां महेष्वासैः प्रहारिभिः |
१५ क
व्यास उवाच:
कस्तां सेनां तदा पार्थ मनसापि प्रधर्षय़ेत् |
१५ ख
व्यास उवाच:
ऋते देवान्महेष्वासाद्वहुरूपान्महेश्वरात् ||
१५ ग
व्यास उवाच:
स्थातुमुत्सहते कश्चिन्न तस्मिन्नग्रतः स्थिते |
१६ क
व्यास उवाच:
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ||
१६ ख
व्यास उवाच:
गन्धेनापि हि सङ्ग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः |
१७ क
व्यास उवाच:
विसञ्ज्ञा हतभूय़िष्ठा वेपन्ति च पतन्ति च ||
१७ ख
व्यास उवाच:
तस्मै नमस्तु कुर्वन्तो देवास्तिष्ठन्ति वै दिवि |
१८ क
व्यास उवाच:
ये चान्ये मानवा लोके ये च स्वर्गजितो नराः ||
१८ ख
व्यास उवाच:
ये भक्ता वरदं देवं शिवं रुद्रमुमापतिम् |
१९ क
व्यास उवाच:
इह लोके सुखं प्राप्य ते यान्ति परमां गतिम् ||
१९ ख
व्यास उवाच:
नमस्कुरुष्व कौन्तेय़ तस्मै शान्ताय़ वै सदा |
२० क
व्यास उवाच:
रुद्राय़ शितिकण्ठाय़ कनिष्ठाय़ सुवर्चसे ||
२० ख
व्यास उवाच:
कपर्दिने करालाय़ हर्यक्ष्णे वरदाय़ च |
२१ क
व्यास उवाच:
याम्याय़ाव्यक्तकेशाय़ सद्वृत्ते शङ्कराय़ च ||
२१ ख
व्यास उवाच:
काम्याय़ हरिनेत्राय़ स्थाणवे पुरुषाय़ च |
२२ क
व्यास उवाच:
हरिकेशाय़ मुण्डाय़ कृशाय़ोत्तरणाय़ च ||
२२ ख
व्यास उवाच:
भास्कराय़ सुतीर्थाय़ देवदेवाय़ रंहसे |
२३ क
व्यास उवाच:
वहुरूपाय़ शर्वाय़ प्रिय़ाय़ प्रिय़वाससे ||
२३ ख
व्यास उवाच:
उष्णीषिणे सुवक्त्राय़ सहस्राक्षाय़ मीढुषे |
२४ क
व्यास उवाच:
गिरिशाय़ प्रशान्ताय़ पतय़े चीरवाससे ||
२४ ख
व्यास उवाच:
हिरण्यवाहवे चैव उग्राय़ पतय़े दिशाम् |
२५ क
व्यास उवाच:
पर्जन्यपतय़े चैव भूतानां पतय़े नमः ||
२५ ख
व्यास उवाच:
वृक्षाणां पतय़े चैव अपां च पतय़े तथा |
२६ क
व्यास उवाच:
वृक्षैरावृतकाय़ाय़ सेनान्ये मध्यमाय़ च ||
२६ ख
व्यास उवाच:
स्रुवहस्ताय़ देवाय़ धन्विने भार्गवाय़ च |
२७ क
व्यास उवाच:
वहुरूपाय़ विश्वस्य पतय़े चीरवाससे ||
२७ ख
व्यास उवाच:
सहस्रशिरसे चैव सहस्रनय़नाय़ च |
२८ क
व्यास उवाच:
सहस्रवाहवे चैव सहस्रचरणाय़ च ||
२८ ख
व्यास उवाच:
शरणं प्राप्य कौन्तेय़ वरदं भुवनेश्वरम् |
२९ क
व्यास उवाच:
उमापतिं विरूपाक्षं दक्षय़ज्ञनिवर्हणम् |
२९ ख
व्यास उवाच:
प्रजानां पतिमव्यग्रं भूतानां पतिमव्ययम् ||
२९ ग
व्यास उवाच:
कपर्दिनं वृषावर्तं वृषनाभं वृषध्वजम् |
३० क
व्यास उवाच:
वृषदर्पं वृषपतिं वृषशृङ्गं वृषर्षभम् ||
३० ख
व्यास उवाच:
वृषाङ्कं वृषभोदारं वृषभं वृषभेक्षणम् |
३१ क
व्यास उवाच:
वृषाय़ुधं वृषशरं वृषभूतं महेश्वरम् ||
३१ ख
व्यास उवाच:
महोदरं महाकाय़ं द्वीपिचर्मनिवासिनम् |
३२ क
व्यास उवाच:
लोकेशं वरदं मुण्डं व्रह्मण्यं व्राह्मणप्रिय़म् ||
३२ ख
व्यास उवाच:
त्रिशूलपाणिं वरदं खड्गचर्मधरं प्रभुम् |
३३ क
व्यास उवाच:
पिनाकिनं खण्डपरशुं लोकानां पतिमीश्वरम् |
३३ ख
व्यास उवाच:
प्रपद्ये शरणं देवं शरण्यं चीरवाससम् ||
३३ ग
व्यास उवाच:
नमस्तस्मै सुरेशाय़ यस्य वैश्रवणः सखा |
३४ क
व्यास उवाच:
सुवाससे नमो नित्यं सुव्रताय़ सुधन्विने ||
३४ ख
व्यास उवाच:
स्रुवहस्ताय़ देवाय़ सुखधन्वाय़ धन्विने |
३५ क
व्यास उवाच:
धन्वन्तराय़ धनुषे धन्वाचार्याय़ धन्विने ||
३५ ख
व्यास उवाच:
उग्राय़ुधाय़ देवाय़ नमः सुरवराय़ च |
३६ क
व्यास उवाच:
नमोऽस्तु वहुरूपाय़ नमश्च वहुधन्विने ||
३६ ख
व्यास उवाच:
नमोऽस्तु स्थाणवे नित्यं सुव्रताय़ सुधन्विने |
३७ क
व्यास उवाच:
नमोऽस्तु त्रिपुरघ्नाय़ भगघ्नाय़ च वै नमः ||
३७ ख
व्यास उवाच:
वनस्पतीनां पतय़े नराणां पतय़े नमः |
३८ क
व्यास उवाच:
अपां च पतय़े नित्यं यज्ञानां पतय़े नमः ||
३८ ख
व्यास उवाच:
पूष्णो दन्तविनाशाय़ त्र्यक्षाय़ वरदाय़ च |
३९ क
व्यास उवाच:
नीलकण्ठाय़ पिङ्गाय़ स्वर्णकेशाय़ वै नमः ||
३९ ख
व्यास उवाच:
कर्माणि चैव दिव्यानि महादेवस्य धीमतः |
४० क
व्यास उवाच:
तानि ते कीर्तय़िष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ||
४० ख
व्यास उवाच:
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न राक्षसाः |
४१ क
व्यास उवाच:
सुखमेधन्ति कुपिते तस्मिन्नपि गुहागताः ||
४१ ख
व्यास उवाच:
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भय़स्तु भवस्तदा |
४२ क
व्यास उवाच:
धनुषा वाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च ||
४२ ख
व्यास उवाच:
ते न शर्म कुतः शान्तिं लेभिरे स्म सुरास्तदा |
४३ क
व्यास उवाच:
विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ||
४३ ख
व्यास उवाच:
तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः |
४४ क
व्यास उवाच:
वभूवुर्वशगाः पार्थ निपेतुश्च सुरासुराः ||
४४ ख
व्यास उवाच:
आपश्चुक्षुभिरे सर्वाश्चकम्पे च वसुन्धरा |
४५ क
व्यास उवाच:
पर्वताश्च व्यशीर्यन्त दिशो नागाश्च मोहिताः ||
४५ ख
व्यास उवाच:
अन्धाश्च तमसा लोका न प्रकाशन्त संवृताः |
४६ क
व्यास उवाच:
जघ्निवान्सह सूर्येण सर्वेषां ज्योतिषां प्रभाः ||
४६ ख
व्यास उवाच:
चुक्रुशुर्भय़भीताश्च शान्तिं चक्रुस्तथैव च |
४७ क
व्यास उवाच:
ऋषय़ः सर्वभूतानामात्मनश्च सुखैषिणः ||
४७ ख
व्यास उवाच:
पूषाणमभ्यद्रवत शङ्करः प्रहसन्निव |
४८ क