chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ६८
भीष्म उवाच:
तस्य सर्वाणि रक्ष्याणि दूरतः परिवर्जय़ेत् |
५१ क
भीष्म उवाच:
मृत्योरिव जुगुप्सेत राजस्वहरणान्नरः ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
नश्येदभिमृशन्सद्यो मृगः कूटमिव स्पृशन् |
५२ क
भीष्म उवाच:
आत्मस्वमिव संरक्षेद्राजस्वमिह वुद्धिमान् ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
महान्तं नरकं घोरमप्रतिष्ठमचेतसः |
५३ क
भीष्म उवाच:
पतन्ति चिररात्राय़ राजवित्तापहारिणः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
राजा भोजो विराट्सम्राट्क्षत्रिय़ो भूपतिर्नृपः |
५४ क
भीष्म उवाच:
य एवं स्तूय़ते शव्दैः कस्तं नार्चितुमिच्छति ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
तस्माद्वुभूषुर्निय़तो जितात्मा संय़तेन्द्रिय़ः |
५५ क
भीष्म उवाच:
मेधावी स्मृतिमान्दक्षः संश्रय़ेत महीपतिम् ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
कृतज्ञं प्राज्ञमक्षुद्रं दृढभक्तिं जितेन्द्रिय़म् |
५६ क
भीष्म उवाच:
धर्मनित्यं स्थितं स्थित्यां मन्त्रिणं पूजय़ेन्नृपः ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
दृढभक्तिं कृतप्रज्ञं धर्मज्ञं संय़तेन्द्रिय़म् |
५७ क
भीष्म उवाच:
शूरमक्षुद्रकर्माणं निषिद्धजनमाश्रय़ेत् ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
राजा प्रगल्भं पुरुषं करोति; राजा कृशं वृंहय़ते मनुष्यम् |
५८ क
भीष्म उवाच:
राजाभिपन्नस्य कुतः सुखानि; राजाभ्युपेतं सुखिनं करोति ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
राजा प्रजानां हृदय़ं गरीय़ो; गतिः प्रतिष्ठा सुखमुत्तमं च |
५९ क
भीष्म उवाच:
यमाश्रिता लोकमिमं परं च; जय़न्ति सम्यक्पुरुषा नरेन्द्रम् ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
नराधिपश्चाप्यनुशिष्य मेदिनीं; दमेन सत्येन च सौहृदेन |
६० क
भीष्म उवाच:
महद्भिरिष्ट्वा क्रतुभिर्महाय़शा; स्त्रिविष्टपे स्थानमुपैति सत्कृतम् ||
६० ख
भीष्म उवाच:
स एवमुक्तो गुरुणा कौसल्यो राजसत्तमः |
६१ क
भीष्म उवाच:
प्रय़त्नात्कृतवान्वीरः प्रजानां परिपालनम् ||
६१ ख