chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १६३
भीष्म उवाच:
तस्यां निशाय़ां व्युष्टाय़ां गते तस्मिन्द्विजोत्तमे |
१ क
भीष्म उवाच:
निष्क्रम्य गौतमोऽगच्छत्समुद्रं प्रति भारत ||
१ ख
भीष्म उवाच:
सामुद्रकान्स वणिजस्ततोऽपश्यत्स्थितान्पथि |
२ क
भीष्म उवाच:
स तेन सार्थेन सह प्रय़यौ सागरं प्रति ||
२ ख
भीष्म उवाच:
स तु सार्थो महाराज कस्मिंश्चिद्गिरिगह्वरे |
३ क
भीष्म उवाच:
मत्तेन द्विरदेनाथ निहतः प्राय़शोऽभवत् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
स कथञ्चित्ततस्तस्मात्सार्थान्मुक्तो द्विजस्तदा |
४ क
भीष्म उवाच:
कान्दिग्भूतो जीवितार्थी प्रदुद्रावोत्तरां दिशम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
स सर्वतः परिभ्रष्टः सार्थाद्देशात्तथार्थतः |
५ क
भीष्म उवाच:
एकाकी व्यद्रवत्तत्र वने किम्पुरुषो यथा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स पन्थानमथासाद्य समुद्राभिसरं तदा |
६ क
भीष्म उवाच:
आससाद वनं रम्यं महत्पुष्पितपादपम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
सर्वर्तुकैराम्रवनैः पुष्पितैरुपशोभितम् |
७ क
भीष्म उवाच:
नन्दनोद्देशसदृशं यक्षकिंनरसेवितम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
शालतालधवाश्वत्थत्वचागुरुवनैस्तथा |
८ क
भीष्म उवाच:
चन्दनस्य च मुख्यस्य पादपैरुपशोभितम् |
८ ख
भीष्म उवाच:
गिरिप्रस्थेषु रम्येषु शुभेषु सुसुगन्धिषु ||
८ ग
भीष्म उवाच:
समन्ततो द्विजश्रेष्ठा वल्गु कूजन्ति तत्र वै |
९ क
भीष्म उवाच:
मनुष्यवदनास्त्वन्ये भारुण्डा इति विश्रुताः |
९ ख
भीष्म उवाच:
भूलिङ्गशकुनाश्चान्ये समुद्रं सर्वतोऽभवन् ||
९ ग
भीष्म उवाच:
स तान्यतिमनोज्ञानि विहङ्गाभिरुतानि वै |
१० क
भीष्म उवाच:
शृण्वन्सुरमणीय़ानि विप्रोऽगच्छत गौतमः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ततोऽपश्यत्सुरम्ये स सुवर्णसिकताचिते |
११ क
भीष्म उवाच:
देशभागे समे चित्रे स्वर्गोद्देशसमप्रभे ||
११ ख
भीष्म उवाच:
श्रिय़ा जुष्टं महावृक्षं न्यग्रोधं परिमण्डलम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
शाखाभिरनुरूपाभिर्भूषितं छत्रसंनिभम् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
तस्य मूलं सुसंसिक्तं वरचन्दनवारिणा |
१३ क
भीष्म उवाच:
दिव्यपुष्पान्वितं श्रीमत्पितामहसदोपमम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
तं दृष्ट्वा गौतमः प्रीतो मुनिकान्तमनुत्तमम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
मेध्यं सुरगृहप्रख्यं पुष्पितैः पादपैर्वृतम् |
१४ ख
भीष्म उवाच:
तमागम्य मुदा युक्तस्तस्याधस्तादुपाविशत् ||
१४ ग
भीष्म उवाच:
तत्रासीनस्य कौरव्य गौतमस्य सुखः शिवः |
१५ क
भीष्म उवाच:
पुष्पाणि समुपस्पृश्य प्रववावनिलः शुचिः |
१५ ख
भीष्म उवाच:
ह्लादय़न्सर्वगात्राणि गौतमस्य तदा नृप ||
१५ ग
भीष्म उवाच:
स तु विप्रः परिश्रान्तः स्पृष्टः पुण्येन वाय़ुना |
१६ क
भीष्म उवाच:
सुखमासाद्य सुष्वाप भास्करश्चास्तमभ्यगात् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽस्तं भास्करे याते सन्ध्याकाल उपस्थिते |
१७ क
भीष्म उवाच:
आजगाम स्वभवनं व्रह्मलोकात्खगोत्तमः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
नाडीजङ्घ इति ख्यातो दय़ितो व्रह्मणः सखा |
१८ क
भीष्म उवाच:
वकराजो महाप्राज्ञः कश्यपस्यात्मसम्भवः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
राजधर्मेति विख्यातो वभूवाप्रतिमो भुवि |
१९ क
भीष्म उवाच:
देवकन्यासुतः श्रीमान्विद्वान्देवपतिप्रभः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
मृष्टहाटकसञ्छन्नो भूषणैरर्कसंनिभैः |
२० क
भीष्म उवाच:
भूषितः सर्वगात्रेषु देवगर्भः श्रिय़ा ज्वलन् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
तमागतं द्विजं दृष्ट्वा विस्मितो गौतमोऽभवत् |
२१ क
भीष्म उवाच:
क्षुत्पिपासापरीतात्मा हिंसार्थी चाप्यवैक्षत ||
२१ ख
राजधर्मो उवाच:
स्वागतं भवते विप्र दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मे गृहम् |
२२ क
राजधर्मो उवाच:
अस्तं च सविता यातः सन्ध्येय़ं समुपस्थिता ||
२२ ख
राजधर्मो उवाच:
मम त्वं निलय़ं प्राप्तः प्रिय़ातिथिरनिन्दितः |
२३ क
राजधर्मो उवाच:
पूजितो यास्यसि प्रातर्विधिदृष्टेन कर्मणा ||
२३ ख