chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १६३
भीष्म उवाच:
सुदक्षिणस्तु काम्वोजो रथ एकगुणो मतः |
१ क
भीष्म उवाच:
तवार्थसिद्धिमाकाङ्क्षन्योत्स्यते समरे परैः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
एतस्य रथसिंहस्य तवार्थे राजसत्तम |
२ क
भीष्म उवाच:
पराक्रमं यथेन्द्रस्य द्रक्ष्यन्ति कुरवो युधि ||
२ ख
भीष्म उवाच:
एतस्य रथवंशो हि तिग्मवेगप्रहारिणाम् |
३ क
भीष्म उवाच:
काम्वोजानां महाराज शलभानामिवाय़तिः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
नीलो माहिष्मतीवासी नीलवर्मधरस्तव |
४ क
भीष्म उवाच:
रथवंशेन शत्रूणां कदनं वै करिष्यति ||
४ ख
भीष्म उवाच:
कृतवैरः पुरा चैव सहदेवेन पार्थिवः |
५ क
भीष्म उवाच:
योत्स्यते सततं राजंस्तवार्थे कुरुसत्तम ||
५ ख
भीष्म उवाच:
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ समेतौ रथसत्तमौ |
६ क
भीष्म उवाच:
कृतिनौ समरे तात दृढवीर्यपराक्रमौ ||
६ ख
भीष्म उवाच:
एतौ तौ पुरुषव्याघ्रौ रिपुसैन्यं प्रधक्ष्यतः |
७ क
भीष्म उवाच:
गदाप्रासासिनाराचैस्तोमरैश्च भुजच्युतैः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
युद्धाभिकामौ समरे क्रीडन्ताविव यूथपौ |
८ क
भीष्म उवाच:
यूथमध्ये महाराज विचरन्तौ कृतान्तवत् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
त्रिगर्ता भ्रातरः पञ्च रथोदारा मता मम |
९ क
भीष्म उवाच:
कृतवैराश्च पार्थेन विराटनगरे तदा ||
९ ख
भीष्म उवाच:
मकरा इव राजेन्द्र समुद्धततरङ्गिणीम् |
१० क
भीष्म उवाच:
गङ्गां विक्षोभय़िष्यन्ति पार्थानां युधि वाहिनीम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ते रथाः पञ्च राजेन्द्र येषां सत्यरथो मुखम् |
११ क
भीष्म उवाच:
एते योत्स्यन्ति समरे संस्मरन्तः पुरा कृतम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
व्यलीकं पाण्डवेय़ेन भीमसेनानुजेन ह |
१२ क
भीष्म उवाच:
दिशो विजय़ता राजञ्श्वेतवाहेन भारत ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
ते हनिष्यन्ति पार्थानां समासाद्य महारथान् |
१३ क
भीष्म उवाच:
वरान्वरान्महेष्वासान्क्षत्रिय़ाणां धुरन्धराः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
लक्ष्मणस्तव पुत्रस्तु तथा दुःशासनस्य च |
१४ क
भीष्म उवाच:
उभौ तौ पुरुषव्याघ्रौ सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिनौ ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
तरुणौ सुकुमारौ च राजपुत्रौ तरस्विनौ |
१५ क
भीष्म उवाच:
युद्धानां च विशेषज्ञौ प्रणेतारौ च सर्वशः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
रथौ तौ रथशार्दूल मतौ मे रथसत्तमौ |
१६ क
भीष्म उवाच:
क्षत्रधर्मरतौ वीरौ महत्कर्म करिष्यतः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
दण्डधारो महाराज रथ एको नरर्षभः |
१७ क
भीष्म उवाच:
योत्स्यते समरं प्राप्य स्वेन सैन्येन पालितः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
वृहद्वलस्तथा राजा कौसल्यो रथसत्तमः |
१८ क
भीष्म उवाच:
रथो मम मतस्तात दृढवेगपराक्रमः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
एष योत्स्यति सङ्ग्रामे स्वां चमूं सम्प्रहर्षय़न् |
१९ क
भीष्म उवाच:
उग्राय़ुधो महेष्वासो धार्तराष्ट्रहिते रतः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
कृपः शारद्वतो राजन्रथय़ूथपय़ूथपः |
२० क
भीष्म उवाच:
प्रिय़ान्प्राणान्परित्यज्य प्रधक्ष्यति रिपूंस्तव ||
२० ख
भीष्म उवाच:
गौतमस्य महर्षेर्य आचार्यस्य शरद्वतः |
२१ क
भीष्म उवाच:
कार्त्तिकेय़ इवाजेय़ः शरस्तम्वात्सुतोऽभवत् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
एष सेनां वहुविधां विविधाय़ुधकार्मुकाम् |
२२ क
भीष्म उवाच:
अग्निवत्समरे तात चरिष्यति विमर्दय़न् ||
२२ ख