chevron_left वन पर्व अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रभूतान्नोदके तस्मिन्वहुमूलफले वने |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सेनां निवेश्य काकुत्स्थो विधिवत्पर्यरक्षत ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणश्च विधिं चक्रे लङ्काय़ां शास्त्रनिर्मितम् |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रकृत्यैव दुराधर्षा दृढप्राकारतोरणा ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अगाधतोय़ाः परिखा मीननक्रसमाकुलाः |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वभूवुः सप्त दुर्धर्षाः खादिरैः शङ्कुभिश्चिताः ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कर्णाट्टय़न्त्रदुर्धर्षा वभूवुः सहुडोपलाः |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
साशीविषघटाय़ोधाः ससर्जरसपांसवः ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मुसलालातनाराचतोमरासिपरश्वधैः |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्विताश्च शतघ्नीभिः समधूच्छिष्टमुद्गराः ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुरद्वारेषु सर्वेषु गुल्माः स्थावरजङ्गमाः |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वभूवुः पत्तिवहुलाः प्रभूतगजवाजिनः ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अङ्गदस्त्वथ लङ्काय़ा द्वारदेशमुपागतः |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विदितो राक्षसेन्द्रस्य प्रविवेश गतव्यथः ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मध्ये राक्षसकोटीनां वह्वीनां सुमहावलः |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शुशुभे मेघमालाभिरादित्य इव संवृतः ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स समासाद्य पौलस्त्यममात्यैरभिसंवृतम् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामसन्देशमामन्त्र्य वाग्मी वक्तुं प्रचक्रमे ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आह त्वां राघवो राजन्कोसलेन्द्रो महाय़शाः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राप्तकालमिदं वाक्यं तदादत्स्व कुरुष्व च ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अकृतात्मानमासाद्य राजानमनय़े रतम् |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विनश्यन्त्यनय़ाविष्टा देशाश्च नगराणि च ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वय़ैकेनापराद्धं मे सीतामाहरता वलात् |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वधाय़ानपराद्धानामन्येषां तद्भविष्यति ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ये त्वय़ा वलदर्पाभ्यामाविष्टेन वनेचराः |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ऋषय़ो हिंसिताः पूर्वं देवाश्चाप्यवमानिताः ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
राजर्षय़श्च निहता रुदन्त्यश्चाहृताः स्त्रिय़ः |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तदिदं समनुप्राप्तं फलं तस्यानय़स्य ते ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हन्तास्मि त्वां सहामात्यं युध्यस्व पुरुषो भव |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पश्य मे धनुषो वीर्यं मानुषस्य निशाचर ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मुच्यतां जानकी सीता न मे मोक्ष्यसि कर्हिचित् |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अराक्षसमिमं लोकं कर्तास्मि निशितैः शरैः ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इति तस्य व्रुवाणस्य दूतस्य परुषं वचः |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रुत्वा न ममृषे राजा रावणः क्रोधमूर्छितः ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इङ्गितज्ञास्ततो भर्तुश्चत्वारो रजनीचराः |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चतुर्ष्वङ्गेषु जगृहुः शार्दूलमिव पक्षिणः ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तांस्तथाङ्गेषु संसक्तानङ्गदो रजनीचरान् |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आदाय़ैव खमुत्पत्य प्रासादतलमाविशत् ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वेगेनोत्पततस्तस्य पेतुस्ते रजनीचराः |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भुवि सम्भिन्नहृदय़ाः प्रहारपरिपीडिताः ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स मुक्तो हर्म्यशिखरात्तस्मात्पुनरवापतत् |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
लङ्घय़ित्वा पुरीं लङ्कां स्ववलस्य समीपतः ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कोसलेन्द्रमथाभ्येत्य सर्वमावेद्य चाङ्गदः |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विशश्राम स तेजस्वी राघवेणाभिनन्दितः ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः सर्वाभिसारेण हरीणां वातरंहसाम् |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भेदय़ामास लङ्काय़ाः प्राकारं रघुनन्दनः ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विभीषणर्क्षाधिपती पुरस्कृत्याथ लक्ष्मणः |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दक्षिणं नगरद्वारमवामृद्नाद्दुरासदम् ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
करभारुणगात्राणां हरीणां युद्धशालिनाम् |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कोटीशतसहस्रेण लङ्कामभ्यपतत्तदा ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उत्पतद्भिः पतद्भिश्च निपतद्भिश्च वानरैः |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नादृश्यत तदा सूर्यो रजसा नाशितप्रभः ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शालिप्रसूनसदृशैः शिरीषकुसुमप्रभैः |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तरुणादित्यसदृशैः शरगौरैश्च वानरैः ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राकारं ददृशुस्ते तु समन्तात्कपिलीकृतम् |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
राक्षसा विस्मिता राजन्सस्त्रीवृद्धाः समन्ततः ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विभिदुस्ते मणिस्तम्भान्कर्णाट्टशिखराणि च |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भग्नोन्मथितवेगानि यन्त्राणि च विचिक्षिपुः ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
परिगृह्य शतघ्नीश्च सचक्राः सहुडोपलाः |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चिक्षिपुर्भुजवेगेन लङ्कामध्ये महावलाः ||
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राकारस्थाश्च ये केचिन्निशाचरगणास्तदा |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रदुद्रुवुस्ते शतशः कपिभिः समभिद्रुताः ||
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तु राजवचनाद्राक्षसाः कामरूपिणः |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निर्ययुर्विकृताकाराः सहस्रशतसङ्घशः ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शस्त्रवर्षाणि वर्षन्तो द्रावय़न्तो वनौकसः |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राकारं शोधय़न्तस्ते परं विक्रममास्थिताः ||
३३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स माषराशिसदृशैर्वभूव क्षणदाचरैः |
३४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कृतो निर्वानरो भूय़ः प्राकारो भीमदर्शनैः ||
३४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पेतुः शूलविभिन्नाङ्गा वहवो वानरर्षभाः |
३५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्तम्भतोरणभग्नाश्च पेतुस्तत्र निशाचराः ||
३५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
केशाकेश्यभवद्युद्धं रक्षसां वानरैः सह |
३६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नखैर्दन्तैश्च वीराणां खादतां वै परस्परम् ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निष्टनन्तो ह्युभय़तस्तत्र वानरराक्षसाः |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हता निपतिता भूमौ न मुञ्चन्ति परस्परम् ||
३७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामस्तु शरजालानि ववर्ष जलदो यथा |
३८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तानि लङ्कां समासाद्य जघ्नुस्तान्रजनीचरान् ||
३८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सौमित्रिरपि नाराचैर्दृढधन्वा जितक्लमः |
३९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आदिश्यादिश्य दुर्गस्थान्पातय़ामास राक्षसान् ||
३९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः प्रत्यवहारोऽभूत्सैन्यानां राघवाज्ञय़ा |
४० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कृते विमर्दे लङ्काय़ां लव्धलक्षो जय़ोत्तरः ||
४० ख