chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १६६
भीष्म उवाच:
अथ तत्र महार्चिष्माननलो वातसारथिः |
१ क
भीष्म उवाच:
तस्याविदूरे रक्षार्थं खगेन्द्रेण कृतोऽभवत् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
स चापि पार्श्वे सुष्वाप विश्वस्तो वकराट्तदा |
२ क
भीष्म उवाच:
कृतघ्नस्तु स दुष्टात्मा तं जिघांसुरजागरत् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽलातेन दीप्तेन विश्वस्तं निजघान तम् |
३ क
भीष्म उवाच:
निहत्य च मुदा युक्तः सोऽनुवन्धं न दृष्टवान् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
स तं विपक्षरोमाणं कृत्वाग्नावपचत्तदा |
४ क
भीष्म उवाच:
तं गृहीत्वा सुवर्णं च यय़ौ द्रुततरं द्विजः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽन्यस्मिन्गते चाह्नि विरूपाक्षोऽव्रवीत्सुतम् |
५ क
भीष्म उवाच:
न प्रेक्षे राजधर्माणमद्य पुत्र खगोत्तमम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स पूर्वसन्ध्यां व्रह्माणं वन्दितुं याति सर्वदा |
६ क
भीष्म उवाच:
मां चादृष्ट्वा कदाचित्स न गच्छति गृहान्खगः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
उभे द्विरात्रं सन्ध्ये वै नाभ्यगात्स ममालय़म् |
७ क
भीष्म उवाच:
तस्मान्न शुध्यते भावो मम स ज्ञाय़तां सुहृत् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
स्वाध्याय़ेन विय़ुक्तो हि व्रह्मवर्चसवर्जितः |
८ क
भीष्म उवाच:
तं गतस्तत्र मे शङ्का हन्यात्तं स द्विजाधमः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
दुराचारस्तु दुर्वुद्धिरिङ्गितैर्लक्षितो मय़ा |
९ क
भीष्म उवाच:
निष्क्रिय़ो दारुणाकारः कृष्णो दस्युरिवाधमः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
गौतमः स गतस्तत्र तेनोद्विग्नं मनो मम |
१० क
भीष्म उवाच:
पुत्र शीघ्रमितो गत्वा राजधर्मनिवेशनम् |
१० ख
भीष्म उवाच:
ज्ञाय़तां स विशुद्धात्मा यदि जीवति माचिरम् ||
१० ग
भीष्म उवाच:
स एवमुक्तस्त्वरितो रक्षोभिः सहितो यय़ौ |
११ क
भीष्म उवाच:
न्यग्रोधं तत्र चापश्यत्कङ्कालं राजधर्मणः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
स रुदन्नगमत्पुत्रो राक्षसेन्द्रस्य धीमतः |
१२ क
भीष्म उवाच:
त्वरमाणः परं शक्त्या गौतमग्रहणाय़ वै ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽविदूरे जगृहुर्गौतमं राक्षसास्तदा |
१३ क
भीष्म उवाच:
राजधर्मशरीरं च पक्षास्थिचरणोज्झितम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
तमादाय़ाथ रक्षांसि द्रुतं मेरुव्रजं यय़ुः |
१४ क
भीष्म उवाच:
राज्ञश्च दर्शय़ामासुः शरीरं राजधर्मणः |
१४ ख
भीष्म उवाच:
कृतघ्नं पुरुषं तं च गौतमं पापचेतसम् ||
१४ ग
भीष्म उवाच:
रुरोद राजा तं दृष्ट्वा सामात्यः सपुरोहितः |
१५ क
भीष्म उवाच:
आर्तनादश्च सुमहानभूत्तस्य निवेशने ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
सस्त्रीकुमारं च पुरं वभूवास्वस्थमानसम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
अथाव्रवीन्नृपः पुत्रं पापोऽय़ं वध्यतामिति ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अस्य मांसैरिमे सर्वे विहरन्तु यथेष्टतः |
१७ क
भीष्म उवाच:
पापाचारः पापकर्मा पापात्मा पापनिश्चय़ः |
१७ ख
भीष्म उवाच:
हन्तव्योऽय़ं मम मतिर्भवद्भिरिति राक्षसाः ||
१७ ग
भीष्म उवाच:
इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसा घोरविक्रमाः |
१८ क
भीष्म उवाच:
नैच्छन्त तं भक्षय़ितुं पापकर्माय़मित्युत ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
दस्यूनां दीय़तामेष साध्वद्य पुरुषाधमः |
१९ क
भीष्म उवाच:
इत्यूचुस्तं महाराज राक्षसेन्द्रं निशाचराः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
शिरोभिश्च गता भूमिमूचू रक्षोगणाधिपम् |
२० क
भीष्म उवाच:
न दातुमर्हसि त्वं नो भक्षणाय़ास्य किल्विषम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
एवमस्त्विति तानाह राक्षसेन्द्रो निशाचरान् |
२१ क
भीष्म उवाच:
दस्यूनां दीय़तामेष कृतघ्नोऽद्यैव राक्षसाः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्ते तस्य ते दासाः शूलमुद्गरपाणय़ः |
२२ क
भीष्म उवाच:
छित्त्वा तं खण्डशः पापं दस्युभ्यः प्रददुस्तदा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
दस्यवश्चापि नैच्छन्त तमत्तुं पापकारिणम् |
२३ क
भीष्म उवाच:
क्रव्यादा अपि राजेन्द्र कृतघ्नं नोपभुञ्जते ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मघ्ने च सुरापे च चोरे भग्नव्रते तथा |
२४ क
भीष्म उवाच:
निष्कृतिर्विहिता राजन्कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
मित्रद्रोही नृशंसश्च कृतघ्नश्च नराधमः |
२५ क
भीष्म उवाच:
क्रव्यादैः कृमिभिश्चान्यैर्न भुज्यन्ते हि तादृशाः ||
२५ ख