chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १६७
भीष्म उवाच:
द्रौपदेय़ा महाराज सर्वे पञ्च महारथाः |
१ क
भीष्म उवाच:
वैराटिरुत्तरश्चैव रथो मम महान्मतः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अभिमन्युर्महाराज रथय़ूथपय़ूथपः |
२ क
भीष्म उवाच:
समः पार्थेन समरे वासुदेवेन वा भवेत् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
लघ्वस्त्रश्चित्रय़ोधी च मनस्वी दृढविक्रमः |
३ क
भीष्म उवाच:
संस्मरन्वै परिक्लेशं स्वपितुर्विक्रमिष्यति ||
३ ख
भीष्म उवाच:
सात्यकिर्माधवः शूरो रथय़ूथपय़ूथपः |
४ क
भीष्म उवाच:
एष वृष्णिप्रवीराणाममर्षी जितसाध्वसः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
उत्तमौजास्तथा राजन्रथो मम महान्मतः |
५ क
भीष्म उवाच:
युधामन्युश्च विक्रान्तो रथोदारो नरर्षभः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
एतेषां वहुसाहस्रा रथा नागा हय़ास्तथा |
६ क
भीष्म उवाच:
योत्स्यन्ते ते तनुं त्यक्त्वा कुन्तीपुत्रप्रिय़ेप्सय़ा ||
६ ख
भीष्म उवाच:
पाण्डवैः सह राजेन्द्र तव सेनासु भारत |
७ क
भीष्म उवाच:
अग्निमारुतवद्राजन्नाह्वय़न्तः परस्परम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
अजेय़ौ समरे वृद्धौ विराटद्रुपदावुभौ |
८ क
भीष्म उवाच:
महारथौ महावीर्यौ मतौ मे पुरुषर्षभौ ||
८ ख
भीष्म उवाच:
वय़ोवृद्धावपि तु तौ क्षत्रधर्मपराय़णौ |
९ क
भीष्म उवाच:
यतिष्येते परं शक्त्या स्थितौ वीरगते पथि ||
९ ख
भीष्म उवाच:
सम्वन्धकेन राजेन्द्र तौ तु वीर्यवलान्वय़ात् |
१० क
भीष्म उवाच:
आर्यवृत्तौ महेष्वासौ स्नेहपाशसितावुभौ ||
१० ख
भीष्म उवाच:
कारणं प्राप्य तु नराः सर्व एव महाभुजाः |
११ क
भीष्म उवाच:
शूरा वा कातरा वापि भवन्ति नरपुङ्गव ||
११ ख
भीष्म उवाच:
एकाय़नगतावेतौ पार्थेन दृढभक्तिकौ |
१२ क
भीष्म उवाच:
त्यक्त्वा प्राणान्परं शक्त्या घटितारौ नराधिप ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
पृथगक्षौहिणीभ्यां तावुभौ संय़ति दारुणौ |
१३ क
भीष्म उवाच:
सम्वन्धिभावं रक्षन्तौ महत्कर्म करिष्यतः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
लोकवीरौ महेष्वासौ त्यक्तात्मानौ च भारत |
१४ क
भीष्म उवाच:
प्रत्ययं परिरक्षन्तौ महत्कर्म करिष्यतः ||
१४ ख