chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १६८
भीष्म उवाच:
पाञ्चालराजस्य सुतो राजन्परपुरञ्जय़ः |
१ क
भीष्म उवाच:
शिखण्डी रथमुख्यो मे मतः पार्थस्य भारत ||
१ ख
भीष्म उवाच:
एष योत्स्यति सङ्ग्रामे नाशय़न्पूर्वसंस्थितिम् |
२ क
भीष्म उवाच:
परं यशो विप्रथय़ंस्तव सेनासु भारत ||
२ ख
भीष्म उवाच:
एतस्य वहुलाः सेनाः पाञ्चालाश्च प्रभद्रकाः |
३ क
भीष्म उवाच:
तेनासौ रथवंशेन महत्कर्म करिष्यति ||
३ ख
भीष्म उवाच:
धृष्टद्युम्नश्च सेनानीः सर्वसेनासु भारत |
४ क
भीष्म उवाच:
मतो मेऽतिरथो राजन्द्रोणशिष्यो महारथः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
एष योत्स्यति सङ्ग्रामे सूदय़न्वै परान्रणे |
५ क
भीष्म उवाच:
भगवानिव सङ्क्रुद्धः पिनाकी युगसङ्क्षय़े ||
५ ख
भीष्म उवाच:
एतस्य तद्रथानीकं कथय़न्ति रणप्रिय़ाः |
६ क
भीष्म उवाच:
वहुत्वात्सागरप्रख्यं देवानामिव संय़ुगे ||
६ ख
भीष्म उवाच:
क्षत्रधर्मा तु राजेन्द्र मतो मेऽर्धरथो नृप |
७ क
भीष्म उवाच:
धृष्टद्युम्नस्य तनय़ो वाल्यान्नातिकृतश्रमः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
शिशुपालसुतो वीरश्चेदिराजो महारथः |
८ क
भीष्म उवाच:
धृष्टकेतुर्महेष्वासः सम्वन्धी पाण्डवस्य ह ||
८ ख
भीष्म उवाच:
एष चेदिपतिः शूरः सह पुत्रेण भारत |
९ क
भीष्म उवाच:
महारथेनासुकरं महत्कर्म करिष्यति ||
९ ख
भीष्म उवाच:
क्षत्रधर्मरतो मह्यं मतः परपुरञ्जय़ः |
१० क
भीष्म उवाच:
क्षत्रदेवस्तु राजेन्द्र पाण्डवेषु रथोत्तमः |
१० ख
भीष्म उवाच:
जय़न्तश्चामितौजाश्च सत्यजिच्च महारथः ||
१० ग
भीष्म उवाच:
महारथा महात्मानः सर्वे पाञ्चालसत्तमाः |
११ क
भीष्म उवाच:
योत्स्यन्ते समरे तात संरव्धा इव कुञ्जराः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
अजो भोजश्च विक्रान्तौ पाण्डवेषु महारथौ |
१२ क
भीष्म उवाच:
पाण्डवानां सहाय़ार्थे परं शक्त्या यतिष्यतः |
१२ ख
भीष्म उवाच:
शीघ्रास्त्रौ चित्रय़ोद्धारौ कृतिनौ दृढविक्रमौ ||
१२ ग
भीष्म उवाच:
केकय़ाः पञ्च राजेन्द्र भ्रातरो युद्धदुर्मदाः |
१३ क
भीष्म उवाच:
सर्व एते रथोदाराः सर्वे लोहितकध्वजाः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
काशिकः सुकुमारश्च नीलो यश्चापरो नृपः |
१४ क
भीष्म उवाच:
सूर्यदत्तश्च शङ्खश्च मदिराश्वश्च नामतः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
सर्व एते रथोदाराः सर्वे चाहवलक्षणाः |
१५ क
भीष्म उवाच:
सर्वास्त्रविदुषः सर्वे महात्मानो मता मम ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
वार्धक्षेमिर्महाराज रथो मम महान्मतः |
१६ क
भीष्म उवाच:
चित्राय़ुधश्च नृपतिर्मतो मे रथसत्तमः |
१६ ख
भीष्म उवाच:
स हि सङ्ग्रामशोभी च भक्तश्चापि किरीटिनः ||
१६ ग
भीष्म उवाच:
चेकितानः सत्यधृतिः पाण्डवानां महारथौ |
१७ क
भीष्म उवाच:
द्वाविमौ पुरुषव्याघ्रौ रथोदारौ मतौ मम ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
व्याघ्रदत्तश्च राजेन्द्र चन्द्रसेनश्च भारत |
१८ क
भीष्म उवाच:
मतौ मम रथोदारौ पाण्डवानां न संशय़ः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
सेनाविन्दुश्च राजेन्द्र क्रोधहन्ता च नामतः |
१९ क
भीष्म उवाच:
यः समो वासुदेवेन भीमसेनेन चाभिभूः |
१९ ख
भीष्म उवाच:
स योत्स्यतीह विक्रम्य समरे तव सैनिकैः ||
१९ ग
भीष्म उवाच:
मां द्रोणं च कृपं चैव यथा संमन्यते भवान् |
२० क
भीष्म उवाच:
तथा स समरश्लाघी मन्तव्यो रथसत्तमः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
काश्यः परमशीघ्रास्त्रः श्लाघनीय़ो रथोत्तमः |
२१ क
भीष्म उवाच:
रथ एकगुणो मह्यं मतः परपुरञ्जय़ः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
अय़ं च युधि विक्रान्तो मन्तव्योऽष्टगुणो रथः |
२२ क
भीष्म उवाच:
सत्यजित्समरश्लाघी द्रुपदस्यात्मजो युवा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
गतः सोऽतिरथत्वं हि धृष्टद्युम्नेन संमितः |
२३ क
भीष्म उवाच:
पाण्डवानां यशस्कामः परं कर्म करिष्यति ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
अनुरक्तश्च शूरश्च रथोऽय़मपरो महान् |
२४ क
भीष्म उवाच:
पाण्ड्यराजो महावीर्यः पाण्डवानां धुरन्धरः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
दृढधन्वा महेष्वासः पाण्डवानां रथोत्तमः |
२५ क
भीष्म उवाच:
श्रेणिमान्कौरवश्रेष्ठ वसुदानश्च पार्थिवः |
२५ ख
भीष्म उवाच:
उभावेतावतिरथौ मतौ मम परन्तप ||
२५ ग