द्रौपद्यु उवाच:
अशोच्यं नु कुतस्तस्या यस्या भर्ता युधिष्ठिरः |
१ क
द्रौपद्यु उवाच:
जानन्सर्वाणि दुःखानि किं मां त्वं परिपृच्छसि ||
१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यन्मां दासीप्रवादेन प्रातिकामी तदानय़त् |
२ क
द्रौपद्यु उवाच:
सभाय़ां पार्षदो मध्ये तन्मां दहति भारत ||
२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
पार्थिवस्य सुता नाम का नु जीवेत मादृशी |
३ क
द्रौपद्यु उवाच:
अनुभूय़ भृशं दुःखमन्यत्र द्रौपदीं प्रभो ||
३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
वनवासगताय़ाश्च सैन्धवेन दुरात्मना |
४ क
द्रौपद्यु उवाच:
परामर्शं द्वितीय़ं च सोढुमुत्सहते नु का ||
४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
मत्स्यराज्ञः समक्षं च तस्य धूर्तस्य पश्यतः |
५ क
द्रौपद्यु उवाच:
कीचकेन पदा स्पृष्टा का नु जीवेत मादृशी ||
५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
एवं वहुविधैः क्लेशैः क्लिश्यमानां च भारत |
६ क
द्रौपद्यु उवाच:
न मां जानासि कौन्तेय़ किं फलं जीवितेन मे ||
६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
योऽय़ं राज्ञो विराटस्य कीचको नाम भारत |
७ क
द्रौपद्यु उवाच:
सेनानीः पुरुषव्याघ्र स्यालः परमदुर्मतिः ||
७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
स मां सैरन्ध्रिवेषेण वसन्तीं राजवेश्मनि |
८ क
द्रौपद्यु उवाच:
नित्यमेवाह दुष्टात्मा भार्या मम भवेति वै ||
८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तेनोपमन्त्र्यमाणाय़ा वधार्हेण सपत्नहन् |
९ क
द्रौपद्यु उवाच:
कालेनेव फलं पक्वं हृदय़ं मे विदीर्यते ||
९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
भ्रातरं च विगर्हस्व ज्येष्ठं दुर्द्यूतदेविनम् |
१० क
द्रौपद्यु उवाच:
यस्यास्मि कर्मणा प्राप्ता दुःखमेतदनन्तकम् ||
१० ख
द्रौपद्यु उवाच:
को हि राज्यं परित्यज्य सर्वस्वं चात्मना सह |
११ क
द्रौपद्यु उवाच:
प्रव्रज्याय़ैव दीव्येत विना दुर्द्यूतदेविनम् ||
११ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यदि निष्कसहस्रेण यच्चान्यत्सारवद्धनम् |
१२ क
द्रौपद्यु उवाच:
साय़म्प्रातरदेविष्यदपि संवत्सरान्वहून् ||
१२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
रुक्मं हिरण्यं वासांसि यानं युग्यमजाविकम् |
१३ क
द्रौपद्यु उवाच:
अश्वाश्वतरसङ्घांश्च न जातु क्षय़मावहेत् ||
१३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सोऽय़ं द्यूतप्रवादेन श्रिय़ा प्रत्यवरोपितः |
१४ क
द्रौपद्यु उवाच:
तूष्णीमास्ते यथा मूढः स्वानि कर्माणि चिन्तय़न् ||
१४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
दश नागसहस्राणि पद्मिनां हेममालिनाम् |
१५ क
द्रौपद्यु उवाच:
यं यान्तमनुय़ान्तीह सोऽय़ं द्यूतेन जीवति ||
१५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तथा शतसहस्राणि नृणाममिततेजसाम् |
१६ क
द्रौपद्यु उवाच:
उपासते महाराजमिन्द्रप्रस्थे युधिष्ठिरम् ||
१६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
शतं दासीसहस्राणि यस्य नित्यं महानसे |
१७ क
द्रौपद्यु उवाच:
पात्रीहस्तं दिवारात्रमतिथीन्भोजय़न्त्युत ||
१७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
एष निष्कसहस्राणि प्रदाय़ ददतां वरः |
१८ क
द्रौपद्यु उवाच:
द्यूतजेन ह्यनर्थेन महता समुपावृतः ||
१८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
एनं हि स्वरसम्पन्ना वहवः सूतमागधाः |
१९ क
द्रौपद्यु उवाच:
साय़म्प्रातरुपातिष्ठन्सुमृष्टमणिकुण्डलाः ||
१९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सहस्रमृषय़ो यस्य नित्यमासन्सभासदः |
२० क
द्रौपद्यु उवाच:
तपःश्रुतोपसम्पन्नाः सर्वकामैरुपस्थिताः ||
२० ख
द्रौपद्यु उवाच:
अन्धान्वृद्धांस्तथानाथान्सर्वान्राष्ट्रेषु दुर्गतान् |
२१ क
द्रौपद्यु उवाच:
विभर्त्यविमना नित्यमानृशंस्याद्युधिष्ठिरः ||
२१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
स एष निरय़ं प्राप्तो मत्स्यस्य परिचारकः |
२२ क
द्रौपद्यु उवाच:
सभाय़ां देविता राज्ञः कङ्को व्रूते युधिष्ठिरः ||
२२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
इन्द्रप्रस्थे निवसतः समय़े यस्य पार्थिवाः |
२३ क
द्रौपद्यु उवाच:
आसन्वलिभृतः सर्वे सोऽद्यान्यैर्भृतिमिच्छति ||
२३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
पार्थिवाः पृथिवीपाला यस्यासन्वशवर्तिनः |
२४ क
द्रौपद्यु उवाच:
स वशे विवशो राजा परेषामद्य वर्तते ||
२४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
प्रताप्य पृथिवीं सर्वां रश्मिवानिव तेजसा |
२५ क
द्रौपद्यु उवाच:
सोऽय़ं राज्ञो विराटस्य सभास्तारो युधिष्ठिरः ||
२५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यमुपासन्त राजानः सभाय़ामृषिभिः सह |
२६ क
द्रौपद्यु उवाच:
तमुपासीनमद्यान्यं पश्य पाण्डव पाण्डवम् ||
२६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अतदर्हं महाप्राज्ञं जीवितार्थेऽभिसंश्रितम् |
२७ क
द्रौपद्यु उवाच:
दृष्ट्वा कस्य न दुःखं स्याद्धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ||
२७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
उपास्ते स्म सभाय़ां यं कृत्स्ना वीर वसुन्धरा |
२८ क
द्रौपद्यु उवाच:
तमुपासीनमद्यान्यं पश्य भारत भारतम् ||
२८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
एवं वहुविधैर्दुःखैः पीड्यमानामनाथवत् |
२९ क
द्रौपद्यु उवाच:
शोकसागरमध्यस्थां किं मां भीम न पश्यसि ||
२९ ख