chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १७
शल्य उवाच:
अथ सञ्चिन्तय़ानस्य देवराजस्य धीमतः |
१ क
शल्य उवाच:
नहुषस्य वधोपाय़ं लोकपालैः सहैव तैः |
१ ख
शल्य उवाच:
तपस्वी तत्र भगवानगस्त्यः प्रत्यदृश्यत ||
१ ग
शल्य उवाच:
सोऽव्रवीदर्च्य देवेन्द्रं दिष्ट्या वै वर्धते भवान् |
२ क
शल्य उवाच:
विश्वरूपविनाशेन वृत्रासुरवधेन च ||
२ ख
शल्य उवाच:
दिष्ट्या च नहुषो भ्रष्टो देवराज्यात्पुरन्दर |
३ क
शल्य उवाच:
दिष्ट्या हतारिं पश्यामि भवन्तं वलसूदन ||
३ ख
इन्द्र उवाच:
स्वागतं ते महर्षेऽस्तु प्रीतोऽहं दर्शनात्तव |
४ क
इन्द्र उवाच:
पाद्यमाचमनीय़ं च गामर्घ्यं च प्रतीच्छ मे ||
४ ख
शल्य उवाच:
पूजितं चोपविष्टं तमासने मुनिसत्तमम् |
५ क
शल्य उवाच:
पर्यपृच्छत देवेशः प्रहृष्टो व्राह्मणर्षभम् ||
५ ख
शल्य उवाच:
एतदिच्छामि भगवन्कथ्यमानं द्विजोत्तम |
६ क
शल्य उवाच:
परिभ्रष्टः कथं स्वर्गान्नहुषः पापनिश्चय़ः ||
६ ख
अगस्त्य उवाच:
शृणु शक्र प्रिय़ं वाक्यं यथा राजा दुरात्मवान् |
७ क
अगस्त्य उवाच:
स्वर्गाद्भ्रष्टो दुराचारो नहुषो वलदर्पितः ||
७ ख
अगस्त्य उवाच:
श्रमार्तास्तु वहन्तस्तं नहुषं पापकारिणम् |
८ क
अगस्त्य उवाच:
देवर्षय़ो महाभागास्तथा व्रह्मर्षय़ोऽमलाः |
८ ख
अगस्त्य उवाच:
पप्रच्छुः संशय़ं देव नहुषं जय़तां वर ||
८ ग
अगस्त्य उवाच:
य इमे व्रह्मणा प्रोक्ता मन्त्रा वै प्रोक्षणे गवाम् |
९ क
अगस्त्य उवाच:
एते प्रमाणं भवत उताहो नेति वासव |
९ ख
अगस्त्य उवाच:
नहुषो नेति तानाह तमसा मूढचेतनः ||
९ ग
ऋषय़ ऊचुः:
अधर्मे सम्प्रवृत्तस्त्वं धर्मं न प्रतिपद्यसे |
१० क
ऋषय़ ऊचुः:
प्रमाणमेतदस्माकं पूर्वं प्रोक्तं महर्षिभिः ||
१० ख
अगस्त्य उवाच:
ततो विवदमानः स मुनिभिः सह वासव |
११ क
अगस्त्य उवाच:
अथ मामस्पृशन्मूर्ध्नि पादेनाधर्मपीडितः ||
११ ख
अगस्त्य उवाच:
तेनाभूद्धततेजाः स निःश्रीकश्च शचीपते |
१२ क
अगस्त्य उवाच:
ततस्तमहमाविग्नमवोचं भय़पीडितम् ||
१२ ख
अगस्त्य उवाच:
यस्मात्पूर्वैः कृतं व्रह्म व्रह्मर्षिभिरनुष्ठितम् |
१३ क
अगस्त्य उवाच:
अदुष्टं दूषय़सि वै यच्च मूर्ध्न्यस्पृशः पदा ||
१३ ख
अगस्त्य उवाच:
यच्चापि त्वमृषीन्मूढ व्रह्मकल्पान्दुरासदान् |
१४ क
अगस्त्य उवाच:
वाहान्कृत्वा वाहय़सि तेन स्वर्गाद्धतप्रभः ||
१४ ख
अगस्त्य उवाच:
ध्वंस पाप परिभ्रष्टः क्षीणपुण्यो महीतलम् |
१५ क
अगस्त्य उवाच:
दश वर्षसहस्राणि सर्परूपधरो महान् |
१५ ख
अगस्त्य उवाच:
विचरिष्यसि पूर्णेषु पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि ||
१५ ग
अगस्त्य उवाच:
एवं भ्रष्टो दुरात्मा स देवराज्यादरिन्दम |
१६ क
अगस्त्य उवाच:
दिष्ट्या वर्धामहे शक्र हतो व्राह्मणकण्टकः ||
१६ ख
अगस्त्य उवाच:
त्रिविष्टपं प्रपद्यस्व पाहि लोकाञ्शचीपते |
१७ क
अगस्त्य उवाच:
जितेन्द्रिय़ो जितामित्रः स्तूय़मानो महर्षिभिः ||
१७ ख
शल्य उवाच:
ततो देवा भृशं तुष्टा महर्षिगणसंवृताः |
१८ क
शल्य उवाच:
पितरश्चैव यक्षाश्च भुजगा राक्षसास्तथा ||
१८ ख
शल्य उवाच:
गन्धर्वा देवकन्याश्च सर्वे चाप्सरसां गणाः |
१९ क
शल्य उवाच:
सरांसि सरितः शैलाः सागराश्च विशां पते ||
१९ ख
शल्य उवाच:
उपगम्याव्रुवन्सर्वे दिष्ट्या वर्धसि शत्रुहन् |
२० क
शल्य उवाच:
हतश्च नहुषः पापो दिष्ट्यागस्त्येन धीमता |
२० ख
शल्य उवाच:
दिष्ट्या पापसमाचारः कृतः सर्पो महीतले ||
२० ग