दुर्योधन उवाच:
किमर्थं भरतश्रेष्ठ न हन्यास्त्वं शिखण्डिनम् |
१ क
दुर्योधन उवाच:
उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा समरेष्वातताय़िनम् ||
१ ख
दुर्योधन उवाच:
पूर्वमुक्त्वा महावाहो पाण्डवान्सह सोमकैः |
२ क
दुर्योधन उवाच:
वधिष्यामीति गाङ्गेय़ तन्मे व्रूहि पितामह ||
२ ख
भीष्म उवाच:
शृणु दुर्योधन कथां सहैभिर्वसुधाधिपैः |
३ क
भीष्म उवाच:
यदर्थं युधि सम्प्रेक्ष्य नाहं हन्यां शिखण्डिनम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
महाराजो मम पिता शन्तनुर्भरतर्षभः |
४ क
भीष्म उवाच:
दिष्टान्तं प्राप धर्मात्मा समय़े पुरुषर्षभ ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रतिज्ञां परिपालय़न् |
५ क
भीष्म उवाच:
चित्राङ्गदं भ्रातरं वै महाराज्येऽभ्यषेचय़म् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
तस्मिंश्च निधनं प्राप्ते सत्यवत्या मते स्थितः |
६ क
भीष्म उवाच:
विचित्रवीर्यं राजानमभ्यषिञ्चं यथाविधि ||
६ ख
भीष्म उवाच:
मय़ाभिषिक्तो राजेन्द्र यवीय़ानपि धर्मतः |
७ क
भीष्म उवाच:
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा मामेव समुदैक्षत ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तस्य दारक्रिय़ां तात चिकीर्षुरहमप्युत |
८ क
भीष्म उवाच:
अनुरूपादिव कुलादिति चिन्त्य मनो दधे ||
८ ख
भीष्म उवाच:
तथाश्रौषं महावाहो तिस्रः कन्याः स्वय़ंवरे |
९ क
भीष्म उवाच:
रूपेणाप्रतिमाः सर्वाः काशिराजसुतास्तदा |
९ ख
भीष्म उवाच:
अम्वा चैवाम्विका चैव तथैवाम्वालिकापरा ||
९ ग
भीष्म उवाच:
राजानश्च समाहूताः पृथिव्यां भरतर्षभ |
१० क
भीष्म उवाच:
अम्वा ज्येष्ठाभवत्तासामम्विका त्वथ मध्यमा |
१० ख
भीष्म उवाच:
अम्वालिका च राजेन्द्र राजकन्या यवीय़सी ||
१० ग
भीष्म उवाच:
सोऽहमेकरथेनैव गतः काशिपतेः पुरीम् |
११ क
भीष्म उवाच:
अपश्यं ता महावाहो तिस्रः कन्याः स्वलङ्कृताः |
११ ख
भीष्म उवाच:
राज्ञश्चैव समावृत्तान्पार्थिवान्पृथिवीपते ||
११ ग
भीष्म उवाच:
ततोऽहं तान्नृपान्सर्वानाहूय़ समरे स्थितान् |
१२ क
भीष्म उवाच:
रथमारोपय़ां चक्रे कन्यास्ता भरतर्षभ ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
वीर्यशुल्काश्च ता ज्ञात्वा समारोप्य रथं तदा |
१३ क
भीष्म उवाच:
अवोचं पार्थिवान्सर्वानहं तत्र समागतान् |
१३ ख
भीष्म उवाच:
भीष्मः शान्तनवः कन्या हरतीति पुनः पुनः ||
१३ ग
भीष्म उवाच:
ते यतध्वं परं शक्त्या सर्वे मोक्षाय़ पार्थिवाः |
१४ क
भीष्म उवाच:
प्रसह्य हि नय़ाम्येष मिषतां वो नराधिपाः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
ततस्ते पृथिवीपालाः समुत्पेतुरुदाय़ुधाः |
१५ क
भीष्म उवाच:
योगो योग इति क्रुद्धाः सारथींश्चाप्यचोदय़न् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ते रथैर्मेघसङ्काशैर्गजैश्च गजय़ोधिनः |
१६ क
भीष्म उवाच:
पृष्ठ्यैश्चाश्वैर्महीपालाः समुत्पेतुरुदाय़ुधाः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ततस्ते मां महीपालाः सर्व एव विशां पते |
१७ क
भीष्म उवाच:
रथव्रातेन महता सर्वतः पर्यवारय़न् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
तानहं शरवर्षेण महता प्रत्यवारय़म् |
१८ क
भीष्म उवाच:
सर्वान्नृपांश्चाप्यजय़ं देवराडिव दानवान् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
तेषामापततां चित्रान्ध्वजान्हेमपरिष्कृतान् |
१९ क
भीष्म उवाच:
एकैकेन हि वाणेन भूमौ पातितवानहम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
हय़ांश्चैषां गजांश्चैव सारथींश्चाप्यहं रणे |
२० क
भीष्म उवाच:
अपातय़ं शरैर्दीप्तैः प्रहसन्पुरुषर्षभ ||
२० ख
भीष्म उवाच:
ते निवृत्ताश्च भग्नाश्च दृष्ट्वा तल्लाघवं मम |
२१ क
भीष्म उवाच:
अथाहं हास्तिनपुरमाय़ां जित्वा महीक्षितः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
अतोऽहं ताश्च कन्या वै भ्रातुरर्थाय़ भारत |
२२ क
भीष्म उवाच:
तच्च कर्म महावाहो सत्यवत्यै न्यवेदय़म् ||
२२ ख