chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १७१
भीष्म उवाच:
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् |
५१ क
भीष्म उवाच:
तृष्णाक्षय़सुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
आत्मना सप्तमं कामं हत्वा शत्रुमिवोत्तमम् |
५२ क
भीष्म उवाच:
प्राप्यावध्यं व्रह्मपुरं राजेव स्यामहं सुखी ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
एतां वुद्धिं समास्थाय़ मङ्किर्निर्वेदमागतः |
५३ क
भीष्म उवाच:
सर्वान्कामान्परित्यज्य प्राप्य व्रह्म महत्सुखम् ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
दम्यनाशकृते मङ्किरमरत्वं किलागमत् |
५४ क
भीष्म उवाच:
अच्छिनत्काममूलं स तेन प्राप महत्सुखम् ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
५५ क
भीष्म उवाच:
गीतं विदेहराजेन जनकेन प्रशाम्यता ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
अनन्तं वत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किञ्चन |
५६ क
भीष्म उवाच:
मिथिलाय़ां प्रदीप्ताय़ां न मे दह्यति किञ्चन ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
अत्रैवोदाहरन्तीमं वोध्यस्य पदसञ्चय़म् |
५७ क
भीष्म उवाच:
निर्वेदं प्रति विन्यस्तं प्रतिवोध युधिष्ठिर ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
वोध्यं दान्तमृषिं राजा नहुषः पर्यपृच्छत |
५८ क
भीष्म उवाच:
निर्वेदाच्छान्तिमापन्नं शान्तं प्रज्ञानतर्पितम् ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
उपदेशं महाप्राज्ञ शमस्योपदिशस्व मे |
५९ क
भीष्म उवाच:
कां वुद्धिं समनुध्याय़ शान्तश्चरसि निर्वृतः ||
५९ ख
वोध्य उवाच:
उपदेशेन वर्तामि नानुशास्मीह कञ्चन |
६० क
वोध्य उवाच:
लक्षणं तस्य वक्ष्येऽहं तत्स्वय़ं प्रविमृश्यताम् ||
६० ख
वोध्य उवाच:
पिङ्गला कुररः सर्पः सारङ्गान्वेषणं वने |
६१ क
वोध्य उवाच:
इषुकारः कुमारी च षडेते गुरवो मम ||
६१ ख