chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १७१
युधिष्ठिर उवाच:
ईहमानः समारम्भान्यदि नासादय़ेद्धनम् |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
धनतृष्णाभिभूतश्च किं कुर्वन्सुखमाप्नुय़ात् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
सर्वसाम्यमनाय़ासः सत्यवाक्यं च भारत |
२ क
भीष्म उवाच:
निर्वेदश्चाविवित्सा च यस्य स्यात्स सुखी नरः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
एतान्येव पदान्याहुः पञ्च वृद्धाः प्रशान्तय़े |
३ क
भीष्म उवाच:
एष स्वर्गश्च धर्मश्च सुखं चानुत्तमं सताम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
४ क
भीष्म उवाच:
निर्वेदान्मङ्किना गीतं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ईहमानो धनं मङ्किर्भग्नेहश्च पुनः पुनः |
५ क
भीष्म उवाच:
केनचिद्धनशेषेण क्रीतवान्दम्यगोय़ुगम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
सुसम्वद्धौ तु तौ दम्यौ दमनाय़ाभिनिःसृतौ |
६ क
भीष्म उवाच:
आसीनमुष्ट्रं मध्येन सहसैवाभ्यधावताम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
तय़ोः सम्प्राप्तय़ोरुष्ट्रः स्कन्धदेशममर्षणः |
७ क
भीष्म उवाच:
उत्थाय़ोत्क्षिप्य तौ दम्यौ प्रससार महाजवः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ह्रिय़माणौ तु तौ दम्यौ तेनोष्ट्रेण प्रमाथिना |
८ क
भीष्म उवाच:
म्रिय़माणौ च सम्प्रेक्ष्य मङ्किस्तत्राव्रवीदिदम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
न चैवाविहितं शक्यं दक्षेणापीहितुं धनम् |
९ क
भीष्म उवाच:
युक्तेन श्रद्धय़ा सम्यगीहां समनुतिष्ठता ||
९ ख
भीष्म उवाच:
कृतस्य पूर्वं चानर्थैर्युक्तस्याप्यनुतिष्ठतः |
१० क
भीष्म उवाच:
इमं पश्यत सङ्गत्या मम दैवमुपप्लवम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
उद्यम्योद्यम्य मे दम्यौ विषमेणेव गच्छति |
११ क
भीष्म उवाच:
उत्क्षिप्य काकतालीय़मुन्माथेनेव जम्वुकः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
मणी वोष्ट्रस्य लम्वेते प्रिय़ौ वत्सतरौ मम |
१२ क
भीष्म उवाच:
शुद्धं हि दैवमेवेदमतो नैवास्ति पौरुषम् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
यदि वाप्युपपद्येत पौरुषं नाम कर्हिचित् |
१३ क
भीष्म उवाच:
अन्विष्यमाणं तदपि दैवमेवावतिष्ठते ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
तस्मान्निर्वेद एवेह गन्तव्यः सुखमीप्सता |
१४ क
भीष्म उवाच:
सुखं स्वपिति निर्विण्णो निराशश्चार्थसाधने ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
अहो सम्यक्षुकेनोक्तं सर्वतः परिमुच्यता |
१५ क
भीष्म उवाच:
प्रतिष्ठता महारण्यं जनकस्य निवेशनात् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
यः कामान्प्राप्नुय़ात्सर्वान्यश्चैनान्केवलांस्त्यजेत् |
१६ क
भीष्म उवाच:
प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
नान्तं सर्वविवित्सानां गतपूर्वोऽस्ति कश्चन |
१७ क
भीष्म उवाच:
शरीरे जीविते चैव तृष्णा मन्दस्य वर्धते ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
निवर्तस्व विवित्साभ्यः शाम्य निर्विद्य मामक |
१८ क
भीष्म उवाच:
असकृच्चासि निकृतो न च निर्विद्यसे तनो ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
यदि नाहं विनाश्यस्ते यद्येवं रमसे मय़ा |
१९ क
भीष्म उवाच:
मा मां योजय़ लोभेन वृथा त्वं वित्तकामुक ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
सञ्चितं सञ्चितं द्रव्यं नष्टं तव पुनः पुनः |
२० क
भीष्म उवाच:
कदा विमोक्ष्यसे मूढ धनेहां धनकामुक ||
२० ख
भीष्म उवाच:
अहो नु मम वालिश्यं योऽहं क्रीडनकस्तव |
२१ क
भीष्म उवाच:
किं नैव जातु पुरुषः परेषां प्रेष्यतामिय़ात् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
न पूर्वे नापरे जातु कामानामन्तमाप्नुवन् |
२२ क
भीष्म उवाच:
त्यक्त्वा सर्वसमारम्भान्प्रतिवुद्धोऽस्मि जागृमि ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
नूनं ते हृदय़ं काम वज्रसारमय़ं दृधम् |
२३ क
भीष्म उवाच:
यदनर्थशताविष्टं शतधा न विदीर्यते ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
त्यजामि काम त्वां चैव यच्च किञ्चित्प्रिय़ं तव |
२४ क
भीष्म उवाच:
तवाहं सुखमन्विच्छन्नात्मन्युपलभे सुखम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
काम जानामि ते मूलं सङ्कल्पात्किल जाय़से |
२५ क
भीष्म उवाच:
न त्वां सङ्कल्पय़िष्यामि समूलो न भविष्यसि ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
ईहा धनस्य न सुखा लव्ध्वा चिन्ता च भूय़सी |
२६ क
भीष्म उवाच:
लव्धनाशो यथा मृत्युर्लव्धं भवति वा न वा ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
परेत्य यो न लभते ततो दुःखतरं नु किम् |
२७ क
भीष्म उवाच:
न च तुष्यति लव्धेन भूय़ एव च मार्गति ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
अनुतर्षुल एवार्थः स्वादु गाङ्गमिवोदकम् |
२८ क
भीष्म उवाच:
मद्विलापनमेतत्तु प्रतिवुद्धोऽस्मि सन्त्यज ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
य इमं मामकं देहं भूतग्रामः समाश्रितः |
२९ क
भीष्म उवाच:
स यात्वितो यथाकामं वसतां वा यथासुखम् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
न युष्मास्विह मे प्रीतिः कामलोभानुसारिषु |
३० क
भीष्म उवाच:
तस्मादुत्सृज्य सर्वान्वः सत्यमेवाश्रय़ाम्यहम् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
सर्वभूतान्यहं देहे पश्यन्मनसि चात्मनः |
३१ क
भीष्म उवाच:
योगे वुद्धिं श्रुते सत्त्वं मनो व्रह्मणि धारय़न् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
विहरिष्याम्यनासक्तः सुखी लोकान्निरामय़ः |
३२ क
भीष्म उवाच:
यथा मा त्वं पुनर्नैवं दुःखेषु प्रणिधास्यसि ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
त्वय़ा हि मे प्रणुन्नस्य गतिरन्या न विद्यते |
३३ क
भीष्म उवाच:
तृष्णाशोकश्रमाणां हि त्वं काम प्रभवः सदा ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
धननाशोऽधिकं दुःखं मन्ये सर्वमहत्तरम् |
३४ क
भीष्म उवाच:
ज्ञातय़ो ह्यवमन्यन्ते मित्राणि च धनच्युतम् ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
अवज्ञानसहस्रैस्तु दोषाः कष्टतराधने |
३५ क
भीष्म उवाच:
धने सुखकला या च सापि दुःखैर्विधीय़ते ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
धनमस्येति पुरुषं पुरा निघ्नन्ति दस्यवः |
३६ क
भीष्म उवाच:
क्लिश्यन्ति विविधैर्दण्डैर्नित्यमुद्वेजय़न्ति च ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
मन्दलोलुपता दुःखमिति वुद्धं चिरान्मय़ा |
३७ क
भीष्म उवाच:
यद्यदालम्वसे काम तत्तदेवानुरुध्यसे ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
अतत्त्वज्ञोऽसि वालश्च दुस्तोषोऽपूरणोऽनलः |
३८ क
भीष्म उवाच:
नैव त्वं वेत्थ सुलभं नैव त्वं वेत्थ दुर्लभम् ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
पातालमिव दुष्पूरो मां दुःखैर्योक्तुमिच्छसि |
३९ क
भीष्म उवाच:
नाहमद्य समावेष्टुं शक्यः काम पुनस्त्वय़ा ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
निर्वेदमहमासाद्य द्रव्यनाशाद्यदृच्छय़ा |
४० क
भीष्म उवाच:
निर्वृतिं परमां प्राप्य नाद्य कामान्विचिन्तय़े ||
४० ख
भीष्म उवाच:
अतिक्लेशान्सहामीह नाहं वुध्याम्यवुद्धिमान् |
४१ क
भीष्म उवाच:
निकृतो धननाशेन शय़े सर्वाङ्गविज्वरः ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
परित्यजामि काम त्वां हित्वा सर्वमनोगतीः |
४२ क
भीष्म उवाच:
न त्वं मय़ा पुनः काम नस्योतेनेव रंस्यसे ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
क्षमिष्येऽक्षममाणानां न हिंसिष्ये च हिंसितः |
४३ क
भीष्म उवाच:
द्वेष्यमुक्तः प्रिय़ं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रिय़म् ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
तृप्तः स्वस्थेन्द्रिय़ो नित्यं यथालव्धेन वर्तय़न् |
४४ क
भीष्म उवाच:
न सकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मनः ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
निर्वेदं निर्वृतिं तृप्तिं शान्तिं सत्यं दमं क्षमाम् |
४५ क
भीष्म उवाच:
सर्वभूतदय़ां चैव विद्धि मां शरणागतम् ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
तस्मात्कामश्च लोभश्च तृष्णा कार्पण्यमेव च |
४६ क
भीष्म उवाच:
त्यजन्तु मां प्रतिष्ठन्तं सत्त्वस्थो ह्यस्मि साम्प्रतम् ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
प्रहाय़ कामं लोभं च क्रोधं पारुष्यमेव च |
४७ क
भीष्म उवाच:
नाद्य लोभवशं प्राप्तो दुःखं प्राप्स्याम्यनात्मवान् ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
यद्यत्त्यजति कामानां तत्सुखस्याभिपूर्यते |
४८ क
भीष्म उवाच:
कामस्य वशगो नित्यं दुःखमेव प्रपद्यते ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
कामान्व्युदस्य धुनुते यत्किञ्चित्पुरुषो रजः |
४९ क
भीष्म उवाच:
कामक्रोधोद्भवं दुःखमह्रीररतिरेव च ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
एष व्रह्मप्रविष्टोऽहं ग्रीष्मे शीतमिव ह्रदम् |
५० क
भीष्म उवाच:
शाम्यामि परिनिर्वामि सुखमासे च केवलम् ||
५० ख