chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १७१
भीष्म उवाच:
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ मातरं वीरमातरम् |
१ क
भीष्म उवाच:
अभिगम्योपसङ्गृह्य दाशेय़ीमिदमव्रुवम् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
इमाः काशिपतेः कन्या मय़ा निर्जित्य पार्थिवान् |
२ क
भीष्म उवाच:
विचित्रवीर्यस्य कृते वीर्यशुल्का उपार्जिताः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
ततो मूर्धन्युपाघ्राय़ पर्यश्रुनय़ना नृप |
३ क
भीष्म उवाच:
आह सत्यवती हृष्टा दिष्ट्या पुत्र जितं त्वय़ा ||
३ ख
भीष्म उवाच:
सत्यवत्यास्त्वनुमते विवाहे समुपस्थिते |
४ क
भीष्म उवाच:
उवाच वाक्यं सव्रीडा ज्येष्ठा काशिपतेः सुता ||
४ ख
भीष्म उवाच:
भीष्म त्वमसि धर्मज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः |
५ क
भीष्म उवाच:
श्रुत्वा च धर्म्यं वचनं मह्यं कर्तुमिहार्हसि ||
५ ख
भीष्म उवाच:
मय़ा शाल्वपतिः पूर्वं मनसाभिवृतो वरः |
६ क
भीष्म उवाच:
तेन चास्मि वृता पूर्वं रहस्यविदिते पितुः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
कथं मामन्यकामां त्वं राजञ्शास्त्रमधीत्य वै |
७ क
भीष्म उवाच:
वासय़ेथा गृहे भीष्म कौरवः सन्विशेषतः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
एतद्वुद्ध्या विनिश्चित्य मनसा भरतर्षभ |
८ क
भीष्म उवाच:
यत्क्षमं ते महावाहो तदिहारव्धुमर्हसि ||
८ ख
भीष्म उवाच:
स मां प्रतीक्षते व्यक्तं शाल्वराजो विशां पते |
९ क
भीष्म उवाच:
कृपां कुरु महावाहो मय़ि धर्मभृतां वर |
९ ख
भीष्म उवाच:
त्वं हि सत्यव्रतो वीर पृथिव्यामिति नः श्रुतम् ||
९ ग